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नेता और अबला...............शर्म है की बस "आती नहीं"

Posted On: 31 Dec, 2012 Others,लोकल टिकेट में

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“नया साल आता है फिर चला जाता है……..किंतु जो चले गएँ उनकी भी याद रहे”

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कहते हैं वो अकड़ – अकड़, तन ढका – ढका ही रहने दो,

हम नहीं सुरक्षा कर सकते, चलो रहने दो, चलो रहने दो,

तू अबला है, हम रक्षक हैं, सच कहें  तो हमहीं भक्षक हैं,

शून्य  है अपनी  नैतिकता, फिरभी कहते हम तक्षक हैं,

किस बात की तेरी मर्यादा, किस बात पे तू चिल्लाती है,

सबसे ज्यादा हम भोग रहें, यह समझ कहाँ तू पाती है,

हम निर्लज हैं, हम पापी हैं, हमें काम देव ने श्राप दिया,

अपनी पुत्री को छलने का, हमने भयावह परिणाम दिया,

नियति सुन तेरी कहता हूँ, तुझे घर में भी सब सहना है,

तू जान रही सब सच्चाई, पर कहाँ तुझे  कुछ कहना है,

सुन अंतिम यह पैगाम मेरा, मैं रावण हूँ, तू सीता है,

अब गंगा भी मैली हो गई, अब सुख चुकी वो सरिता है

अब सुख चुकी वो सरिता है…………………………..

मैं आस लगाय बैठी थी, कुछ नई गति तुम लाओगे,

जो भार तुम्हें हमनें दिया, उसका न्याय कर पाओगे,

पर दुष्ट तनों से आस ही कैसी, जो बस प्यासे से दीखते हैं,

करते रहते कुकर्म ही बस, पर न्याय की बाते लिखते हैं,

हूँ बड़ी ही पीड़ा में मैं अब, कुछ कहने को मन ना करता है,

मुझे हिंद की बेटी ना कहना, अब “यह अपमान सा लगता है”

…….

जो भी हुआ उसके लिए मानवीय सोच शर्मिंदा है किन्तु मैं दोष अपने तंत्र को दूँगा क्योंकि  आज उसकी कुव्यवस्था हमें रुला रही है”

नववर्ष सभी को एक नई उर्जा प्रदान करे किंतु , सबसे अहम् सदा भूलने की प्रवृति से बचाए“……….

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

January 6, 2013

दोगली मानसिकता की धज्जियाँ उड़ाती हुई रचना…………………मित्र मजा आ गया ……………..पुरुषों का असली चेहरा लाकर तूने आज अपने मित्र का सीना चौड़ा कर दिया………………यार आँख से आंसू छलक पड़े…………..अबे कहाँ है तू आज तुझे साइन से लगाने को दिल चाहता है…. …………..दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया…………….लगता है अब इस बाग़ के फूल नहीं मुरझाने वाले………………… हम निर्लज हैं, हम पापी हैं, हमें काम देव ने श्राप दिया, अपनी पुत्री को छलने का, हमने भयावह परिणाम दिया, …………….वह-वह………………..करार तमाचा हम बेशर्म और बहाया मर्दों को……………….

yogi sarswat के द्वारा
January 3, 2013

हूँ बड़ी ही पीड़ा में मैं अब, कुछ कहने को मन ना करता है, मुझे हिंद की बेटी ना कहना, अब “यह अपमान सा लगता है” मित्रवर आनंद जी , दिल को चीर गयीं आपकी पंक्तियाँ ! सच लिखा आपने , अब ये अपमान ही लगता है ! जिस देश में नारी की पूजा होती हो उस देश में ही नारी सबसे ज्यादा असुरक्षित है ! ओह ! लेकिन फ़रियाद सुनाने वाले ही और सुननेवाले ही जब शिकारी बने बैठे हों तब क्या करियेगा ?

Santlal Karun के द्वारा
January 2, 2013

आनंद जी, दोनों ही पक्षों के तथ्यों को संक्षेप में बड़े ही भेदक रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसकी सामयिक आवश्यकता है; हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ ! नव वर्ष की मंगलकामनाएँ !

sudhajaiswal के द्वारा
January 2, 2013

आनंद जी, मार्मिक रचना से कड़वी सच्चाई की अभिव्यक्ति के लिए बधाई |

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 2, 2013

मान्य आनंद प्रवीण जी , सप्रेम नमस्कार !……. यह जो ज्योति जली है , अंजाम तक पहुंच कर रहेगी ! सार्थक और सामयिक प्रस्तुति के लिए बधाई !

deepasingh के द्वारा
January 2, 2013

वन्दे मातरम आनंद जी.सत्यता लिय सुन्दर रचना पर बधाई. नव वर्ष पर मेरे द्वारा किय गे आग्रह के लिय समय निकालिएगा.

nishamittal के द्वारा
January 1, 2013

बहुत मार्मिक भावपूर्ण रचना आनन्द जी.और एक कटु सत्य

jlsingh के द्वारा
December 31, 2012

प्रिय आनंद जी, नव वर्ष में नई उर्जा के साथ हम बुराइयों से लड़ते रहें ..हम सबका यह प्राण होना चाहिए! आपकी पीड़ा और संवेदना युक्त कविता को नमन! आपको नव वर्ष की शुभकामनाएं!

akraktale के द्वारा
December 31, 2012

पर दुष्ट तनों से आस ही कैसी, जो बस प्यासे से दीखते हैं, करते रहते कुकर्म ही बस, पर न्याय की बाते लिखते हैं,………….बहुत खूब. सुन्दर रचना प्रिय आनंद जी हार्दिक बधाई स्वीकारें.


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