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"बंजर भूमि पर फूल खिला"

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आधार अनोखा मैंने खींचा, खून दिया पानी से सींचा,

कतरा – कतरा सुख चुका, यह ह्रदय भी मेरा टूट चुका,

फिरभी न हरियाली आई, वो ख़ुशी मुझे न मिल पाई,

टूटा ये ह्रदय, हाँ तो भी सही, दिल बोल रहा उम्मीद जगा,

इस “आधार” को अब आधार बना “बंजर भूमि पर फूल खिला”

यहाँ कोई नहीं माली ऐसा, जो धरा पे यह उपकार करे,

सूत्रों को करके और सरल, इस कला का जो उद्धार करे,

मैंने कितनों को है  देखा, अकाट्य सूत्र गढ़ते हुए,

व्यक्तित्व का विकास किये, सफलता पथ चढ़ते हुए,

अदभुत रहस्य यह चीज नहीं, जिसे सोच रहें सब एक बला,

दिल खोज उन्हें जो जाने कला, “बंजर भूमि पर फूल खिला”

दूर कहीं जब दीप जले, रोशन होता सारा संसार,

यही वो दीपक है जिसमें, पथ ढूंढ़ रहा मेरा आधार,

अध्यन करें इस बात पे की, आगे को कैसे बढ़ना है,

उत्साहवर्धक परिणाम दिखे, यह दावा कैसे गढ़ना है,

उदास न हो उजियारे को, खोजन में दे मन प्राण गला,

अँधेरे में एक दीप जला, “बंजर भूमि पर फूल खिला”

चलो कृषि करें उस हल से अब, बलराम का जिसपर हाथ पड़ा,

मिलकर बोयें उस अन्न को अब, किस्मों में जो हो एक खरा,

पिछली भूलों को भी हम, एक सिख समझ कर अब बाँटे,

प्रखर बना इस बुद्धि को, सारे कंटक को अब काटें,

देर करें न बोने में, उम्मीद का सूरज दिख रहा ढला,

ऐसा कोई अब तीर चला, “बंजर भूमि पर फूल खिला”

ANAND PRAVIN

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sushma Gupta के द्वारा
November 17, 2012

प्रिय आनंद जी,प्रखर बना इस बुद्धि को, सारे कंटक को अब काटें, देर करें न बोने में, उम्मीद का सूरज दिख रहा ढला, ऐसा कोई अब तीर चला, “बंजर भूमि पर फूल खिला” एक नै आशा का संचार करती आपकी रचना सुन्दर भावों से भरी है ,बस उम्मीद का सूरज ढलना नहीं चाहिये ..शुभाकाक्षी सुषमा गुप्ता

    Sushma Gupta के द्वारा
    November 17, 2012

    एक नै, इसको त्रुटिवश लिखा गया है. कृपया इसको एक नई पढ़ें.

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 16, 2012

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!शुभकामनायें. आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके समस्त पारिवारिक जनो को ! मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
November 6, 2012

बहुत सुन्दर कविता प्रिय आनंद जी। दूर कहीं जब दीप जले, रोशन होता सारा संसार, यही वो दीपक है जिसमें, पथ ढूंढ़ रहा मेरा आधार, अध्यन करें इस बात पे की, आगे को कैसे बढ़ना है, उत्साहवर्धक परिणाम दिखे, यह दावा कैसे गढ़ना है, उदास न हो उजियारे को, खोजन में दे मन प्राण गला, अँधेरे में एक दीप जला, “बंजर भूमि पर फूल खिला” बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.

yogi sarswat के द्वारा
October 30, 2012

यहाँ कोई नहीं माली ऐसा, जो धरा पे यह उपकार करे, सूत्रों को करके और सरल, इस कला का जो उद्धार करे, मैंने कितनों को है देखा, अकाट्य सूत्र गढ़ते हुए, व्यक्तित्व का विकास किये, सफलता पथ चढ़ते हुए, अदभुत रहस्य यह चीज नहीं, जिसे सोच रहें सब एक बला, दिल खोज उन्हें जो जाने कला, “बंजर भूमि पर फूल खिला मित्रवर आनंद प्रवीण जी , आपकी रचनायें पढ़कर सच कहूं तो दिल एकदम प्रसन्न हो जाता है ! शब्द बहुत सरल होते हैं , भाषा बहुत सादगी लिए हुए लेकिन भाव बहुत सुन्दर !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 29, 2012

‘बंजर भूमि पर फूल खिला ‘ आशा और विशवास का मंजुल संगम ! आनंद जी बधाई ! आप की लेखिनी नित्य निखार पर है जैसा कि आदरणीय शशिभूषण जी ने भी कहा है ! पुनश्च !!

Santlal Karun के द्वारा
October 29, 2012

“चलो कृषि करें उस हल से अब, बलराम का जिसपर हाथ पड़ा, मिलकर बोयें उस अन्न को अब, किस्मों में जो हो एक खरा, पिछली भूलों को भी हम, एक सिख समझ कर अब बाँटे, प्रखर बना इस बुद्धि को, सारे कंटक को अब काटें, देर करें न बोने में, उम्मीद का सूरज दिख रहा ढला, ऐसा कोई अब तीर चला, “बंजर भूमि पर फूल खिला” ” संवेदनात्मक उत्कृष्ट गीत कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 29, 2012

अद्भुत

shashibhushan1959 के द्वारा
October 28, 2012

मान्यवर आनंद जी, सादर ! रचनात्मक सामाजिक चिंता से ओत-प्रोत आपकी इस रचना के भाव सराहनीय हैं ! कृषि, जो सम्पूर्ण जीवन का प्रथम आधार है, उसकी दुर्गति पर आपकी चिंता और उससे निकलने के उपायों पर मनन की व्याकुलता काबिलेतारीफ है ! हार्दिक शुभकामनाएं ! ईश्वर प्रदत्त आधार-भूमि को खून दिया जल से सींचा, हरियाली फिर भी आ न सकी, जाने क्या है प्रभु की इच्छा ! टूटा ये ह्रदय, हाँ तो भी सही, दिल में अपने उम्मीद जगा, इस संबल को आधार बना, बंजर धरती पर फूल खिला !! क्या नहीं यहाँ कोई ऐसा माली जो यह उपकार करे, सूत्रों को करके और सरल, मानवता का उद्धार करे ! अद्भुत रहस्य वह चीज नहीं, जिसे सोच रहें सब एक बला, दिल खोज उन्हें जो जाने कला, “बंजर धरती पर फूल खिला ! अध्ययन करें उन बातों का , आगे को कैसे बढ़ना है, उत्साहजनक परिणाम दिखे, यह दावा कैसे गढ़ना है! आगे बढ़कर उजियारे को, पाने हित दें मन-प्राण गला, अंधियारे में एक दीप जला, बंजर धरती पर फूल खिला !! हम करें किसानी उस हल से, बलराम का जिसपर हाथ पडा, वह बीज धरा में हम बोयें, जो हो सर्वोत्तम और खरा ! अब देर नहीं, अवसेर नहीं, दें उम्मीदों का दीप जला, ऐसा कोई अब तीर चला, बंजर धरती पर फूल खिला !! (कोई भी रचना प्रारंभ करें तो ध्यान रखें कि प्रथम ३-४ पंक्तियों में ही उस रचना का उद्देश्य स्पष्ट हो जाय ! हर पंक्ति के भाव एक दूसरे से सम्बद्ध हों ! शब्दों का पर्याय रखकर देखें, जैसे “बंजर भूमि पर फूल खिला” कि जगह “बंजर धरती पर फूल खिला” भूमि ३ मात्रा का शब्द है, जबकि धरती ४ मात्रा का ! “बंजर भूमि पर फूल खिला” में कुल १५ मात्राएँ हो रही हैं, जबकि चाहिए १६ मात्रा ! ज्योंही आप भूमि को धरती में बदलते हैं, मात्रा कि कमी पूरी हो जाती है, और पंक्ति सुदृढ़ हो जाती है ! )

    jlsingh के द्वारा
    October 30, 2012

    आदरणीय कविश्रेष्ठ शशिभूषण जी, सादर अभिवादन! अगर आपके जैसा गुरु द्रोण हो तो अर्जुन का निशाना ठीक मछली के आंख में ही लगेगा! आप दोनों गुरु शिष्य को नमन! आनंद जी बहुत अच्छा प्रयास कर रहे हैं, और आगे बढ़ते जाएँ यही कामना करता हूँ!

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 27, 2012

अध्यन करें इस बात पे की, आगे को कैसे बढ़ना है, उत्साहवर्धक परिणाम दिखे, यह दावा कैसे गढ़ना है, उदास न हो उजियारे को, खोजन में दे मन प्राण गला, अँधेरे में एक दीप जला, “बंजर भूमि पर फूल खिला” आनंद जी नमस्कार .. बहुत ही नवीन प्रस्तुति ….. बधाई आपको

October 26, 2012

ये तो आप ही बताएँगे की शर्मा जी कब रिटायर हुए…………………….नाना जी को सादर चरण स्पर्श…………..!

    October 26, 2012

    भाई उधर का कमेन्ट इधर हो गया एडजस्ट कर लेना…………… अदभुत रहस्य यह चीज नहीं, जिसे सोच रहें सब एक बला, दिल खोज उन्हें जो जाने कला, “बंजर भूमि पर फूल खिला” … दूर कहीं जब दीप जले, रोशन होता सारा संसार, यही वो दीपक है जिसमें, पथ ढूंढ़ रहा मेरा आधार, अध्यन करें इस बात पे की, आगे को कैसे बढ़ना है, उत्साहवर्धक परिणाम दिखे, यह दावा कैसे गढ़ना है,

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 26, 2012

प्रिय आनंद जी, सस्नेह आपकी कविता एवं भाव देख कर आनंद की प्राप्ति होती है. लिखते रहिये. बधाई.

Santosh Kumar के द्वारा
October 26, 2012

प्रिय आनंद भाई ,..सादर अभिवादन बहुत ही सुन्दर सीख देती रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ,.. उदास न हो उजियारे को, खोजन में दे मन प्राण गला, अँधेरे में एक दीप जला, “बंजर भूमि पर फूल खिला”………..बहुत बहुत बधाई

akraktale के द्वारा
October 26, 2012

प्रिय आनंद जी                  सादर, आधार को आधार बना लिखी सुन्दर रचना, अवश्य ही हमें कामना करना चाहिए कि इसे आशातीत सफलता मिले. जों सभी के न्याय और हक के लिए आवश्यक है. सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें.

nishamittal के द्वारा
October 26, 2012

आनंद जी ,भावपूर्ण रचना और सुन्दर आह्वान बधाई चलो कृषि करें उस हल से अब, बलराम का जिसपर हाथ पड़ा, मिलकर बोयें उस अन्न को अब, किस्मों में जो हो एक खरा, पिछली भूलों को भी हम, एक सिख समझ कर अब बाँटे, प्रखर बना इस बुद्धि को, सारे कंटक को अब काटें, देर करें न बोने में, उम्मीद का सूरज दिख रहा ढला, ऐसा कोई अब तीर चला, “बंजर भूमि पर फूल खिला”


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