राजनीति

नयी सोच नयी क्रांति

40 Posts

1427 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8082 postid : 414

"तुझको विलुप्त हो जाना होगा"

Posted On: 12 Oct, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Collage

समझ न बच्चू, हमको  कच्चू, जिसपर चाक़ू धंस जाएगा,

बड़ी सख्त है आम की  चमड़ी, गफलत में  गच्चा  खाएगा,

अपने को तू गजराज समझ, मतवाला बन कर झूम रहा,
यह नहीं बपौती तेरी, क्यूं पग पटक-पटक कर झूम रहा,

इतिहास देख, अच्छे-अच्छों को इसी दंभ ने मारा है,
रावण था बहुत शक्तिशाली, पर “धर्म-युद्ध” में हारा है,

तेरे कुकर्म थे सदा जटिल, वाणी में विष क्यों लाता है ,
जनता की हाय गिरे जिसपर, वो अन्तकाल पछताता है,

तू घोर – घने निंद्रा में जपता, बस अर्थ – रुपया – मुद्रा - पैसा,

बनने को एक भोग – विलासी, तू कृत्य कर रहा कैसा – कैसा,

सुन हम मानव तू भी मानव, पर तुने मानव  धर्म को त्यागा,

एक जनम ही मिला सभी को, ये  क्या कर डाला हाय अभागा,

तुम सब पापी को देख – देख, यमराज ने अपनी मूंछ ममोरी,

चित्रगुप्त हंस – हंस लिखता है, जितनी हरकत हुई छिछोरी,

साम – दाम और दंड – भेद, माँ के उर में ही जान गया तू,

करता गया जघन्य अपराधें, हर सीमा को है लांघ गया तू,

अब देख चिता सजी है तेरी, विकराल काल मुँह खोल खड़ा है,

तेरा फूँक डालने जीवन सारा , ये आम ही बन अंगार खड़ा  है,

अब नहीं है इच्छा ले तू शिक्षा, हमें रौद्र रूप दिखलाना होगा,

अब यही माँग सब माँग रहे, “तुझको विलुप्त हो जाना होगा”

……

ANAND PRAVIN

(कच्चू – एक प्रकार की सब्जी, जिसे काफी जगह अरबी भी कहते हैं)

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 4.83 out of 5)
Loading ... Loading ...

44 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति…

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 16, 2012

प्रिय आनंद जी, सस्नेह चेतावनी, ओज, ललकार एक साथ परिणाम देख पकड़ेंगे वे माथ सुधरेंगे नहीं वे रावन के खानदानी जनता दौडाएगी जब मांगे मिलेगा न पानी उठो जवानो सुनहरा मौका अब फिर नहीं आएगा चूक गया सेनानी अंत बहुत पछतायेगा सुन्दर प्रस्तुति, बधाई.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय प्रदीप सर, सादर प्रणाम सत्य वचन सर……………..यही मौक़ा है आर या पार जो चुका वो सिर्फ अपनी नियति पर आंसू ही बहा सकता है………..वीर वही होगा जो वीरता से लडेगा जब आप जैसे मार्गदर्शक है तो फिर खून मने उबाल तो आना ही है……….आशीर्वाद बना रहे सर………… सुन्दर कविता …….लिखते रहें

yogi sarswat के द्वारा
October 16, 2012

अब देख चिता सजी है तेरी, विकराल काल मुँह खोल खड़ा है, तेरा फूँक डालने जीवन सारा , ये आम ही बन अंगार खड़ा है, … अब नहीं है इच्छा ले तू शिक्षा, हमें रौद्र रूप दिखलाना होगा, अब यही माँग सब माँग रहे, “तुझको विलुप्त हो जाना होगा” आनंद प्रवीण जी, बहुत खूब! आज ऐसे ही शब्दों से क्रांति का अलख जलाने की जरूरत है, बहुत-बहुत बधाई , सुन्दर शब्द

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आपका आभार योगेन सर…………

sudhajaiswal के द्वारा
October 15, 2012

आनंद जी, बहुत खूब! आज ऐसे ही शब्दों से क्रांति का अलख जलाने की जरूरत है, बहुत-बहुत बधाई |

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आपका ह्रदय से आभार आदरणीय सुधा जी…………..

Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
October 15, 2012

सादर नमस्कार प्रवीण जी, एकदम सटीक शीर्षक दिया है आपने अपनी कविता को, मैं भी यही समझता हूँ की अब इन्हें विलुप्त हो जाना होगा. सुन्दर, सटीक, समसामयिक कविता के लिए बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय समीर जी, नमस्कार जी बिलकुल अब हम त्रस्त हो चुकें है इन नेताओं से इनको विलुप्त होना ही होगा…………. देखिये कब तक हमें इनका तांडव झेलना पड़ता है…………. सुन्दर प्रतिक्रया और रचना को सराहने के लिए आभार…………

ashishgonda के द्वारा
October 15, 2012

मित्र! सादर अभिवादन, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति, वर्तमान भारत का सीधा शब्दों में चित्रण………कभी इसके लिए समय निकाले- http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/10/08/%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE/

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    जरुर आपके पोस्ट पर जाकर पढूंगा…………….रचना पसंद करने के लिए आभार

rekhafbd के द्वारा
October 15, 2012

प्रवीन जी सुन हम मानव तू भी मानव, पर तुने मानव धर्म को त्यागा, एक जनम ही मिला सभी को, ये क्या कर डाला हाय अभागा,,जोश भरी रचना पर हार्दिक बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    हार्दिक आभार आदरणीय रेखा मैम……..

chaatak के द्वारा
October 15, 2012

‘ अब देख चिता सजी है तेरी, विकराल काल मुँह खोल खड़ा है, तेरा फूँक डालने जीवन सारा , ये आम ही बन अंगार खड़ा है,’ अत्यंत प्रभावी, क्रांति का बिगुल ऐसी ही छोटी छोटी चिंगारियों से बड़ी आग प्रकट करेगा| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय चातक भाई, नमस्कार बस इन्ही चिंगारियों को मशाल का रूप देने का वक़्त आ गया है………… अब इन्हें इनकी ओकात दिखानी ही होगी…………सुन्दर प्रतिक्रया के लिए आभार भाई

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 15, 2012

क्यों डरा रहे हो भाई अभी कुछ दिन और कलयुग देख लेने दो …वैसे ही साँसे अटकी हुयी हैं ईमान धर्म वालों का रोज दिल जला जा रहा है एक एक पल कैसे भी काट रहे हैं जी रहे हैं ….. जय श्री राधे सुन्दर रचना ….. साम – दाम और दंड – भेद, माँ के उर में ही जान गया तू, करता गया जघन्य अपराधें, हर सीमा को है लांघ गया तू, … अब देख चिता सजी है तेरी, विकराल काल मुँह खोल खड़ा है, तेरा फूँक डालने जीवन सारा , ये आम ही बन अंगार खड़ा है सच में इन्हें जल्द विलुप्त करो सब मिल के …. भ्रमर ५

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय भ्रमर सर, सादर प्रणाम आपने सुन्दर कहा सर …………बस यह सुन्दर हो गया बची खुची खामी आदरणीय शशि सर ने पूरी कर दी…………कलयुग में इन नेताओं के तांडव को तो झेलना ही होगा………….देखिये कब मुक्ति मिलती है और कब ये विलुप्त होतें है………… प्रतिक्रया के लिए आभार सर…………आशीर्वाद बना रहे

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 14, 2012

यह तो शाश्वत सत्य है कि झूठ या असत्य जितना भी बलवान क्यों न हो उसका अंत होना तय है !एक सुन्दर kaavya -rachnaa के लिए हार्दिक aabhaar ! आनंद जी , badhaai !!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय विजय सर, सादर प्रणाम आपने बिलकुल सत्य कहा सर………..झूठ कभी बलवान नहीं होता रचना सराहने के लिए आभार सर

Malik Parveen के द्वारा
October 14, 2012

जोशीली रचना के लिए बहुत बहुत बधाई हो आपको आनंद भाई ….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    धन्यवाद आदरणीय परवीन दीदी………..

shashibhushan1959 के द्वारा
October 13, 2012

आदरणीय आनंद जी, सादर ! शानदार – जानदार – समयानुकूल ललकार भरती रचना के लिए हार्दिक बधाई ! “अपने को तू गजराज समझ, मतवाला बन कर झूम रहा, यह नहीं बपौती तेरी, क्यूं पग पटक-पटक कर झूम रहा ! इतिहास देख, अच्छे-अच्छों को इसी दंभ ने मारा है, रावण था बहुत शक्तिशाली, पर “धर्म-युद्ध” में हारा है ! तेरे कुकर्म थे सदा जटिल, वाणी में विष क्यों लाता है , जनता की हाय गिरे जिसपर, वो अन्तकाल पछताता है !” आज ऐसी ही चेतना का विगुल फूंकती ज्वलंत रचनाओं की आवश्यकता है ! हार्दिक बधाई !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय सर, सादर प्रणाम आपके मार्गदर्शन से ही उचित उत्साह मिलता है सर…………. आपके द्वारा सुझाए गए तीनों पन्तियों में एक बिलकुल ही नया विचार था और उनसे मेरी कविता का माँ भी बढ़ा………..ख़ास कर दूसरी वाली तो बिलकुल ही सुन्दर लग रही है…………. आगे भी मार्गदर्शन अनिवार्य है सर………..आशीर्वाद बना रहे

alkargupta1 के द्वारा
October 13, 2012

आनंद प्रवीण जी , रौद्र रस से भरपूर हुंकार भरती उत्कृष्ट रचना …. इन्हें तो अवश्य ही विलुप्त हो जाना ही है……..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    धन्यवाद अलका मैम………..देखिये कब तक यह अपना तांडव दिखाते रहते हैं

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 13, 2012

समझ न बच्चू, हमको कच्चू, जिसपर चाक़ू धंस जाएगा, बड़ी सख्त है आम की चमड़ी, गफलत में गच्चा खाएगा, ————————————- तुम सब पापी को देख – देख, यमराज ने अपनी मूंछ ममोरी, चित्रगुप्त हंस – हंस लिखता है, जितनी हरकत हुई छिछोरी, क्या बात है … करारा व्यंग के साथ ललकार भी ……. बहुत ही जोशीली रचना … आनंद जी ..बहुत-२ बधाई आपको …

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय महिमा जी आपकी बधाई सर माथे पर………..रचना को सराहने के लिए आभार

akraktale के द्वारा
October 13, 2012

प्रिय आनंद जी                    सादर, सुन्दर ललकार भरती रचना के लिए बधाई स्वीकार करें.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम बस आपलोगों के आशीर्वाद का ही फल है सर

seemakanwal के द्वारा
October 13, 2012

साम – दाम और दंड – भेद, माँ के उर में ही जान गया तू, करता गया जघन्य अपराधें, हर सीमा को है लांघ गया तू, … अब देख चिता सजी है तेरी, विकराल काल मुँह खोल खड़ा है, तेरा फूँक डालने जीवन सारा , ये आम ही बन अंगार खड़ा है, … अब नहीं है इच्छा ले तू शिक्षा, हमें रौद्र रूप दिखलाना होगा, अब यही माँग सब माँग रहे, “तुझको विलुप्त हो जाना होगा” AAP तो लिखने में प्रवीण हो गये ,हार्दिक बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय सीमा जी…………अभी प्रवीणता आई कहाँ है बस कोशिश में लगा हूँ………….सुन्दर प्रतिक्रया के लिए आभार

yamunapathak के द्वारा
October 13, 2012

आनंद जी सुन हम मानव तू भी मानव, पर तुने मानव धर्म को त्यागा, एक जनम ही मिला सभी को, ये क्या कर डाला हाय अभागा, इन पंक्तियों का जीवन दर्शन मुखर हो उठा है.सुन्दर …पंक्ति चिंतनीय भी. …

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    धन्यवाद आदरणीय यमुना मैम……..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
October 13, 2012

बहुत सुन्दर कविता ! प्रिय आनंद जी. इसी दंभ ने किया निठल्ला, इस भूत – प्रेत का तू मारा है, एक रावन था बलवान बड़ा, सुनले पर धर्म-युद्ध वो भी हारा है, कर्म तेरे तो सदा जटिल थे, पर वाणी में क्यों विष लाता है, जन – जन जिसको हाय सुनावे, वो अंतकाल पर पक्षताता है, बहुत अच्छी पंक्तियाँ.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय राजीव सर……..सदेव उत्साह बढाने और मार्गदर्शित करने के लिए आभार

nishamittal के द्वारा
October 13, 2012

बहुत सुन्दर चुटीली ललकार आनंद जी.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आपका धन्यवाद निशा मैम……….आज इस ललकार की बहुत जरुरत आन पड़ी है

jlsingh के द्वारा
October 13, 2012

प्रिय आनंद जी, सादर अभिवादन! गुरु द्रोण, अर्जुन, अभिमन्यु सब मिलकर अब फुंफकार रहे. भीष्म पितामह पीछे से देखो कैसे ललकार रहे! अब नहीं बचेगी कुरुसेना कर ले चाहे वह क्षद्म युद्ध भारत माता के वीरों को अब श्री कृष्ण ललकार रहे ! मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा! ….बहुत ही सुन्दर! बधाई!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय जवाहर सर, सादर प्रणाम बिलकुल सर जब सुर मिलेंगे तभी कोई अच्छी धुन सफल हो पाएगी ………..फिर आपलोग जैसे अभिभावक जिनके हों वो निर्भीक भाव से ही लिख्नेगे बहुत सुन्दर कविता आपकी सर……………आशीर्वाद बना रहे

Santosh Kumar के द्वारा
October 12, 2012

सुन हम मानव तू भी मानव, पर तुने मानव धर्म को त्यागा, एक जनम ही मिला सभी को, ये क्या कर डाला हाय अभागा,…………प्रिय आनंद भाई ,सादर नमस्ते ….इनको विलुप्त होना ही पड़ेगा ,..पापी घड़ा भर चुका है ,….शानदार हुंकार भरती रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 12, 2012

    इच्छा -iccha ,रौद्र -raudr ,विलासी -vilaasi ,भूत -bhoot

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय संतोष भाई की जय हो………… बस इन्हें ही तो विलुप्त करना है……..पर कलयुग में इनकी शक्ति बड़ी प्रबल है …….काफी जोड़ लगाना होगा सुधार हेतु धन्यवाद ……आगे भी मार्गदर्शित करते रहें

Santlal Karun के द्वारा
October 12, 2012

आनंद प्रवीण जी, बड़े व्यंग्य भाव के साथ अत्यंत चुटीला गीत प्रस्तुत किया है: हार्दिक बधाई एवं साधुवाद  | हाँ, रचना के समय कहीं-कहीं आप को और ध्यान देने की जरूरत है |

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय संतलाल सर, सादर प्रणाम रचना को पढने और सराहने के लिए ह्रदय से आभार ………… आपके मार्गदर्शन से कोशिश करूंगा और निखार लाने की………मार्गदर्शित करते रहें सर कहाँ ध्यान देने की विशेष जरुरत है उसे भी इंगित करें…………..आशीर्वाद बना रहे


topic of the week



latest from jagran