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"कहाँ समझा ज़माना है"

Posted On: 7 Oct, 2012 Others में

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heart-on-fire

अरे एक वीर हम भी हैं, ये दुनिया को बताना है,

अभी तक तेज़ को अपने, कहाँ समझा ज़माना है II

नजर को धार दे, और सर उठा के  देख ऊपर को,

जो नीला दिख रहा समतल,  उसी के पार जाना है II

जले पे जल जो छिडको, तो करे वो, छस-छ्सा-छस-छस,

हर दिल में धू-धू  जलते आग को, यूँही बुझाना है II

दुखों को गट-गटा-गट-गट, सभी मजबूर पीते हैं,

उन्ही लोगों में मैं भी हूँ मगर, ये गम मिटाना है II

तरक्की खूब आई है, की  बस कागज़, किताबों में,

हमें ही आगे बढ़ कर देश में, कुछ कर दिखना है II

लगे हैं सब खुदी के मतलबों में, कौन किसका है,

ज़रा सा प्रेम का इक सूत्र हमको, अब बनाना है II

अरे एक वीर हम भी हैं, ये दुनिया को बताना है,

अभी तक तेज़ को अपने , कहाँ समझा ज़माना  है II

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48 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 17, 2012

आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 17, 2012

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.

aman kumar के द्वारा
October 16, 2012

बहुत अच्छी कविता !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आपका आभार आदरणीय अमन जी……..

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 15, 2012

आनन्द जी, बहुत ही नाप- तौल के आपने अपने भावों को पिरोया है | दुखों को गट-गटा-गट-गट, सभी मजबूर पीते हैं, उन्ही लोगों में मैं भी हूँ मगर, ये गम मिटाना है II अति उत्तम…बहुत-बहुत हार्दिक बधाई, यूँ ही लिखते रहिए |

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आदरणीय धाव्लिमा जी धन्यवाद आपकी उत्साहित प्रतिक्रया के लिए

chaatak के द्वारा
October 14, 2012

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमाँ, हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है\ खूबसूरत भावो को पिरोती पंक्तियाँ बेहद पसंद आईं| उत्कृष्ट लेखन पर हार्दिक बधाई!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आपने बिलकुल सही लिखा आदरणीय चातक भाई……..रचना सराहने के लिए आभार

alkargupta1 के द्वारा
October 13, 2012

आनंद प्रवीण जी , अति सुन्दर भावों से सजी उत्कृष्ट काव्याभिव्यक्ति आपकी कविता पढने में बहुत ही आनंद आया…. साभार

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आपको अच्छा लगा अलका मैम लिखना सफल रहा………आशीर्वाद बना रहे

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 13, 2012

अरे एक वीर हम भी हैं, ये दुनिया को बताना है, अभी तक तेज़ को अपने, कहाँ समझा ज़माना है II दुखों को गट-गटा-गट-गट, सभी मजबूर पीते हैं, उन्ही लोगों में मैं भी हूँ मगर, ये गम मिटाना है ई वाह वाह बहुत खूब .. आनंद जी .. बहुत ही सुंदर … बधाई आपको

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 16, 2012

    आपका आभार महिमा जी सराहना के लिए………

sudhajaiswal के द्वारा
October 12, 2012

आनंद जी, उम्मीद और आत्मविश्वास का जज्बा बहुत खूब है, बहुत-बहुत बधाई!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 12, 2012

    आदरणीय सुधा जी ………रचना पर समय देने के लिए ह्रदय से आभार …….

seemakanwal के द्वारा
October 10, 2012

तरक्की खूब आई है, की बस कागज़, किताबों में, हमें ही आगे बढ़ कर देश में, कुछ कर दिखना है I अपने मनोंभावों का बहुत सुन्दर चित्रण किया है हार्दिक बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय सीमा जी ……………कविता पर नजर डालने के लिए धन्यवाद आपकी सराहना से बल मिला

munish के द्वारा
October 10, 2012

भाई प्रवीण जी आजकल इस तरह की कवितायें बहुत कम मिलती हों जो लयबद्ध हों ज्यादातर कवितायें भी गधकाव्य में ही होती हैं जिनको पढ़कर वास्तव में काव्य का मज़ा नहीं आता ….. इस रचना को पढ़कर मज़ा भी आया और जोश भी ………

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय मुनीश भाई, नमस्कार आपको रचना पढ़ मजा आया दिल को ख़ुशी मिली …….छोटी सी कोशिश कुछ नया लिखने की बस लिख डाला आपका पुनः आभार

अजय यादव के द्वारा
October 10, 2012

आनंद साहब |इस दुनिया में सबकुछ हमारी /आपकी पहुँच में हैं …….|बहुत ही सकारात्मक लेखन ,सकारात्मक लेखो की दुनिया अवचेतन मन ब्लॉग पर आपको आमंत्रण हैं -http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    धन्यवाद अजय जी……….आपके ब्लॉग पर अवस्य आउंगा

yogi sarswat के द्वारा
October 10, 2012

दुखों को गट-गटा-गट-गट, सभी मजबूर पीते हैं, उन्ही लोगों में मैं भी हूँ मगर, ये गम मिटाना है II … तरक्की खूब आई है, की बस कागज़, किताबों में, हमें ही आगे बढ़ कर देश में, कुछ कर दिखना है ई सही कहा आपने आनंद जी , अब किताबों से निकल कर सड़क तक आना ही होगा तभी कुछ संभव है ! सार्थक रचना

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आपकी युक्ति भी बिलकुल सही है सर………सड़क पर तो आना ही होगा

ashishgonda के द्वारा
October 10, 2012

“नजर को धार दे, और सर उठा के देख ऊपर को, जो नीला दिख रहा समतल, उसी के पार जाना है” मान्यवर आनंदजी! आपकी कविता पढकर बहुत हर्ष हुआ, बहुत ही आवश्यक बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया है,आभार……… http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/10/08/%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE/

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय आशीष जी …………..रचना पर समय देने और सराहने के लिए ह्रदय से आभार

yamunapathak के द्वारा
October 10, 2012

आनंद जी आशावादी और समाधानात्मक इन पंक्तियों के लिए बहुत संतुष्ट होते हुए बधाई देना चाहती हूँ. दुखों को गट-गटा-गट-गट, सभी मजबूर पीते हैं उन्ही लोगों में मैं भी हूँ मगर, ये गम मिटाना है ई पुरी कविता बहुत सुन्दर भाव लिए हुए है साभार

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय यमुना मैम, सादर प्रणाम सदेव की भाँती रचना को सराहने के लिए आपका आभार मैम

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 9, 2012

जले पे जल जो छिडको, तो करे वो, छस-छ्सा-छस-छस, हर दिल में धू-धू जलते आग को, यूँही बुझाना है II … दुखों को गट-गटा-गट-गट, सभी मजबूर पीते हैं, उन्ही लोगों में मैं भी हूँ मगर, ये गम मिटाना है ई क्या बात है प्रवीण जी आप दिनों दिन आनंद दे रहे हैं बहुत बहुत शुभ कामनाएं खूबसूरत सन्देश प्रोत्साहन देती हुयी जोश भरती हुयी काविले तारीफ़ रचना ..शुभ कामनाएं अरे एक वीर हम भी हैं, ये दुनिया को बताना है,… ज़माना बदल भी सकता ये दुनिया को दिखाना है जय श्री राधे भ्रमर ५

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय भ्रमर सर, सादर प्रणाम आपही सबों के आशीर्वाद का फल है सर की मैं कुछ आनंद देने में सफल हो पा रहा हूँ………….अभी और प्रवीणता लानी बाकी है सर

rekhafbd के द्वारा
October 9, 2012

आदरणीय प्रवीन जी , तरक्की खूब आई है, की बस कागज़, किताबों में, हमें ही आगे बढ़ कर देश में, कुछ कर दिखना ,अति सुंदर प्रस्तुति,बहुत बढ़िया ,बधाई .

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय रेखा जी………..रचना सराहने के लिए आभार

Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
October 9, 2012

आनंद जी, सच में आनंद आ गया आपकी कविता को पढ़कर, बहुत अच्छी, आवश्यक बिन्दुओ पर लिखी गयी, उत्साह वर्धक कविता के लिए आपको बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय अनिल जी……..ब्लॉग पर प्रथम आगमन और रचना को सराहने के लिए ह्रदय से आभार

jlsingh के द्वारा
October 8, 2012

प्रिय आनंद जी, सादर! बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति! अरे एक वीर हम भी हैं, ये दुनिया को बताना है, अभी तक तेज़ को अपने , कहाँ समझा ज़माना है II

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय जवाहर सर, सादर प्रणाम मगर इतने कम शब्दों में नहीं कुछ होना जाना है…………………………प्रदीप सर का रोग आपको भी कहीं न लग जाए सर………….कुछ मार्गदर्शन करते रहें………तारीफ़ तो होती रहेगी ……..आशीर्वाद बना रहे

Santosh Kumar के द्वारा
October 7, 2012

प्रिय आनंद जी ,.सादर नमस्ते बहुत ओजस्वी और सरल रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन स्वीकारें ,..ये गम मिटाना है ,… बहुत बधाई वन्देमातरम

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    संतोष भाई की जय हो हमेशा………….. बहुत कम शब्दों में आपने बहुत कुछ कह दिया संतोष भाई……………..आभार आपका आपकी पोस्ट पर पता नहीं क्यूँ कमेन्ट करने में काफी तकलीफ हो रही है…….काफी प्रयाश करने पर भी नहीं हो रही है………….हो सकता है यह कांग्रेस की चाल हो …………

Santlal Karun के द्वारा
October 7, 2012

प्रवीण जी, फिर आप ने शीघ्र ही एक पुनरुध्वनि का सौन्दर्य लिए हुए– “छस-छ्सा-छस-छस” तथा “गट-गटा-गट-गट”, जिनसे भावार्थ-ग्राह्यता में तात्कालिक वृद्धि हो गई है, सहज गीत प्रस्तुत किया है | इतनी प्रभावी रचना के लिए हार्दिक बधाई एवं साधुवाद !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय संतलाल सर, सादर प्रणाम यह आपका बरप्पन है सर की छोटी सी रचना आपको अच्छी लगी………आप अनुभवी हैं आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ेगी ………..रचना में सुधार लाने के भी मार्ग बताएं …………सुन्दर प्रतिक्रया के लिए ह्रदय से आभार सर

akraktale के द्वारा
October 7, 2012

प्रिय आनंद जी              सादर,              अरे एक वीर हम भी हैं, ये दुनिया को बताना है,              अभी तक तेज़ को अपने , कहाँ समझा ज़माना है ई            बहुत सुन्दर संघर्ष के भाव को प्रस्तुत करती रचना के लिए बधाई स्वीकारें.   

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम एक छोटी सी नई कोशिश की थी सर ……आपकी कविताओं की विविधताओं को देख कुछ सिखने को मिला है………………….मुझे अभी भी आपकी प्रहार कर …….प्रहार जोरदार लगती है सर

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 7, 2012

नजर को धार दे, और सर उठा के देख ऊपर को, जो नीला दिख रहा समतल, उसी के पार जाना है बहुत सुन्दर भाव के साथ रचा एवं लक्ष्य बधाई, स्नेही आनंद जी, सादर

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय प्रदीप सर, सादर प्रणाम आज कल आप इतनी कंजूसी दिखा रहे हैं सर की मैं सोच में पर गया हूँ …………..किन्तु जो भी हो आपके आने से बहार आ जाती है………आशीर्वाद बना रहे बस

manoranjanthakur के द्वारा
October 7, 2012

हम भी दरिया है ज़माने को दिखाना है जिस तरफ चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा .. बहुत बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय मनोरंजन सर,सादर प्रणाम बहुत ही सुन्दर कमेन्ट सर………..शानदार

shashibhushan1959 के द्वारा
October 7, 2012

मान्यवर आनंद जी, शुभकामनाये ! वाकई आनंद आ गया ! बहुत शानदार ! बहुत सुन्दर ! त्रुटिहीन ! प्रवाहमय ! मेरी हार्दिक शुभकामनाये ! (पर ये “जवाना” का अर्थ नहीं समझ पाया !)

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय सर,सादर प्रणाम नया प्रयास था सर आपको अच्छी लगी जान ख़ुशी हुई………..टाइपिंग करते वक़्त थोड़ी समस्या आने के कारण गलती से ऐसा हो गया सर………..वो ज़माना ही है……………

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
October 7, 2012

प्रिय आनंद जी,बहुत सुन्दर कविता लिखी है तरक्की खूब आई है, की बस कागज़, किताबों में हमें ही आगे बढ़ कर देश में, कुछ कर दिखना है लगे हैं सब खुदी के मतलबों में, कौन किसका है ज़रा सा प्रेम का इक सूत्र हमको, अब बनाना है बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.बस ‘जवाना’ को ‘ज़माना’ कर दें तो बात बन जाए.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय राजीव सर,सादर प्रणाम टाइपिंग की त्रुटी के कारण गलत शब्द बन गएँ थे सर……ध्यान दिलाने के लिए आभार रचना आपको पसंद आई सर जान हर्ष हुआ………….


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