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"हर रात के बाद सवेरा है"

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हे केशव, माधव, हे मोहन, कुछ दया – अनुग्रह बरसाओ,

खल – दुर्जन का उत्पात बढ़ा, मत मानवजन को तरसाओ,

मत तरसाओ गोविन्द की अब, यह पाप सहन न होता है,

अवलोक दशा इस धरती की, मन भीतर – भीतर रोता है,

मानव ने मानवता छोड़ी, हाँ छोड़ दिया कब का ही शरम,

यह बीते युग की बात हुई, जब मिलता था कर्मो में धरम,

अब तो केवल नर मिलते है, अबला के तन को खाने को,

नारी की दशा भी कहाँ सही, व्याकुल कायासुख पाने को,

जो मुल्ला – पंडित बने हुए, वो ही दुनिया को छलते हैं,

जो सीधे – साधे मानव हैं, यह देख – देख बस जलते हैं,

गर चक्र में तेरी धार बची, तो पूर्णः चलाओ हे गिरिधर,

रोष – कोप कुछ दिखलाओ, हिय पामर का कापें थर-थर,


वरना मानव में ज्ञान भरो,  इस जाती का कल्याण करो,

द्वापर बीते युग बीत गए, इस युग का अब अवतार धड़ो,

यह पीड़ा यह संताप देख, निर्धन का घोर  विलाप देख,

कुछ यहीं देव बन बैठे हैं, ज़रा उनका तेज़ – प्रताप देख,

फिर तूही कहना ईश मेरे, क्या व्यर्थ प्रलाप ये मेरा है,

तुने ही कहा था हे कृष्णा, “हर रात के बाद सवेरा है”

ANAND PRAVIN

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59 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

cpsingh के द्वारा
December 3, 2013

अप्रतिम रचना

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    December 4, 2013

    बहुत आभार आपका आदरणीय सिंह साहब

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 12, 2012

यह पीड़ा यह संताप देख, निर्धन का घोर विलाप देख, कुछ यहीं देव बन बैठे हैं, ज़रा उनका तेज़ – प्रताप देख, … फिर तूही कहना ईश मेरे, क्या व्यर्थ प्रलाप ये मेरा है, तुने ही कहा था हे कृष्णा, “हर रात के बाद सवेरा है”……. वाह आनंद जी …बहुत ही शानदार अभिवयक्ति …. आपकी रचनाये दिनोदिन गहरी होती जा रही है …….. पर अवतार की जरुरत नहीं जन जागरण की जरुरत है जो धीरे -२ हो रहा है …… ऐसे ही अलख जागते रहे ..गोविन्द हमारे साथ हैं …. बहुत-२ बधाई आपको

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 12, 2012

    आदरणीय महिमा जी, नमस्कार बहुत दिनों बाद आपकी प्रतिक्रया पढ़ अच्छा लगा………… बाहर तो आना ही होगा घर बैठे कितने दिन सिर्फ बोलते रहेंगे अब वक़्त है गरजने का……..रचना को सराहने के लिए धन्यवाद

aman kumar के द्वारा
October 11, 2012

“हर रात के बाद सवेरा है” सच है ! बहुत सुद्ध सोच !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 12, 2012

    अमन जी बहुत शुक्रिया रचना पर समय देने के लिए ……..

drvandnasharma के द्वारा
October 9, 2012

बहुत अच्छा लिखा है . मानवता ही हमारा परम धर्म है .खुद भी खुस रहे और ओरो को भी खुश रखें

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 12, 2012

    आपका बहुत – बहुत धन्यवाद आदरणीय शर्मा जी

yogi sarswat के द्वारा
October 8, 2012

आनंद जी, पीड़ा और भक्ति के इतने सुन्दर भाव से कही कलयुग में श्री कृष्ण विवश न हो जाएँ अवतरित होने को, बहुत सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय योजेन सर…………रचना सराहने के लिए आभार

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 8, 2012

आनंद जी,आपका ये दोहा मुझे बहुत पसंद आया..दरअसल मेरे पिता जी ने इस दोहे को पढ़ने केलिए कहा और जब मैंने इस दोहे को पढ़ा तो मन प्रफुलित हो गया |बहुत ही सुन्दर ढंग से आपने अपने भाव व्यक्त किये है |बहुत-बहुत बधाई |

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय धव्लिमा जी, सादर प्रणाम सबसे पहले तो मेरे ब्लॉग पर आकी प्रथम आगमन का ह्रदय से स्वागत…………..फिर धन्यवाद आपके आदरणीय पिता जी का जिन्होंने मेरे रचना को इस काबिल समझा की उसे प्रोत्साहित किया जाए …………..आपके अत्यंत हर्ष बड़े कमेन्ट को पा प्रफुल्लित हूँ…………आपके भी ब्लॉग पर गया था आपकी लेखनी भी लाजवाब है…….समय आभाव के कारण कमेन्ट नही कर सका वह भी जल्द ही करूंगा

Malik Parveen के द्वारा
October 8, 2012

आनंद भाई नमस्कार , बहुत ही सुंदर आज के कलयुग पर दृष्टिपात करती आपकी ये रचना …. आज फिर से किसी अवतार की आवश्यकता है क्यूंकि सब जगह इतना पाप ही पाप फ़ैल चुका है ….. युहीं लिखते रहिये ………बधाई !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय परवीन दीदी, सादर प्रणाम मैं आपसे अत्यंत ही गुस्सा हूँ………….आप तो लगता है मेरे ब्लॉग का पता ही भूल बैठी हैं कितने दिनों बाद आपकी प्रतिक्रया पा अत्यंत ख़ुशी हुई…………स्नेह बना रहे

    Malik Parveen के द्वारा
    October 9, 2012

    आनंद भाई गुस्सा न करिए एक तो सेहत के लिए ठीक नहीं दूसरा जायज़ भी नहीं है आपका गुस्सा क्यूंकि मै काफी दिनों से किसी भी पोस्ट पर कमेन्ट नहीं कर पा रही थी जागरण की मेहरबानी की अब काफी दिनों बाद कर पा रही हूँ …. सदा खुश रहो और अच्छा अच्छा लिखते रहो हम आपके साथ ही हैं :)

sudhajaiswal के द्वारा
October 7, 2012

आनंद जी, पीड़ा और भक्ति के इतने सुन्दर भाव से कही कलयुग में श्री कृष्ण विवश न हो जाएँ अवतरित होने को, बहुत सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय सुधा जी………प्रथम बार ब्लॉग पर आने के लिए ह्रदय से आभार रचना आपको अच्छी लगी संतुष्टि प्राप्त हुई

seemakanwal के द्वारा
October 7, 2012

अब तो केवल नर मिलते है, अबला के तन को खाने को, नारी की दशा भी कहाँ सही, व्याकुल कायासुख पाने को, … जो मुल्ला – पंडित बने हुए, वो ही दुनिया को छलते हैं, जो सीधे – साधे मानव हैं, यह देख – देख बस जलते हैं, बहुत सुन्दर रचना ,हार्दिक बधाई .

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आपका ह्रदय से आभार आदरणीय सीमा जी…………….

sinsera के द्वारा
October 7, 2012

प्रिय आनंद जी , नमस्कार, कलयुग का वास्तविक चित्रण करता हुआ काव्य..परन्तु ऐसा लगा जैसे अपने केवल परिभाषा कह कर छोड़ दिया हो…इस विषय पर जितना भी लिखा जाये कम होगा… बहुत सुन्दर प्रयास…बधाई..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय सरतिया दीदी, सादर प्रणाम आपने बिलकुल सही कहा दीदी इस विषय पर जितना भी लिखा जाए बहुत कम ही लगता है …….और मूल बात तो यह है की यह रचना लिखने की इक्षा मुझे आपके ही एक कविता “वज्रदंत का खंजर’ पढने के बाद से थी ……कोशिश जो कुछ हद तक सफल हुई……..अब आपकी बारी है की इस विषय का इन्साफ करें………………बहुत दिन हो गएँ कुछ झन्नाटेदार प्रस्तुति नहीं आई आपके कलम से ………..अब सुखा खत्म करिए

shashibhushan1959 के द्वारा
October 5, 2012

मान्यवर आनंद जी, सादर ! बहुत अच्छी तरह लिखी गई एक सुन्दर रचना ! वर्तमान स्थिति का वास्तविक चित्रण ! कई पंक्तियाँ बहुत सुन्दर ! काव्यात्मक त्रुटियों को छोड़ दिया जाय तो कविता के भाव बेहद सार्थक ! हार्दिक शुभकामनाएं !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय सर, सादर प्रणाम बहुत दिनों बाद आपकी कोई प्रतिक्रया पा ख़ुशी हुई सर……..पिछले पोस्ट पर भी आपकी कोई प्रतिक्रिया न देख दुख हुआ……………लेखनी में सुधार करने की कोशिश में हूँ ….मार्गदर्शन नहीं आ पा रहा ……रचना लिखने की शैली के बारे में पूरी तरह अन्भिज्ञं हूँ……..यदि कोई मार्गदर्शन मिले तो और बेहतर कर सकता हूँ…….आशीर्वाद बना रहे बस

    shashibhushan1959 के द्वारा
    October 7, 2012

    मान्यवर आनंद जी, शुभकामनाये ! खेद है कि आपकी पिछली पोस्ट पर मेरा ध्यान नहीं गया ! इस रचना को और सुगठित किया जा सकता है……… हे केशव, माधव, हे मोहन, कुछ दया – अनुग्रह बरसाओ, खल – दुर्जन का उत्पात बढ़ा, न मानवजन को तरसाओ, ——– निचली पंक्ति में “”न मानवजन को तरसाओ,”" के स्थान पर “मत मानवजन को तरसाओ” कर दिया जाय तो मात्रा की कमी पूरी होकर प्रवाह बढ़ जाएगा ! “”मत तरसाओ गोविन्द कि अब, यह पाप सहन न होता है, यह देख दशा इस धरती का, मन भीतर – भीतर रोता है”" दो पंक्तियों के मध्य एक ही शब्द की पुनरावृति से बचना चाहिए ! “यह देख दशा इस धरती का”" की जगह अगर “अवलोक दशा इस धरती की” करने पर यह और अच्छा हो जायेगा ! “”मानव ने मानवता छोड़ी, हाँ छोड़ दिया कब का ही शरम, यह बीते युग की बात हुई, जब मिलता था कर्मो में धरम,”" “मानव ने मानवता छोड़ी, हाँ, त्याग दिया है लाज-शरम, यह बीते युग की बात हुई, जब मिलता था कर्मो में धरम,” आनंद जी, केवल कुछ शब्दों के सामंजस्य से रचना और सुन्दर, सुगठित और प्रवाहमान हो जायेगी ! मैंने अपने सुझाव दिए हैं ! वैसे इस रचना में आपका परिश्रम स्पष्ट परिलक्षित है ! पूर्व की रचनाओं की तुलना में यह रचना बहुत अच्छी है ! आपको जहां भी कोई दिक्कत हो, आप निःसंकोच मुझे मेल करें, आपके किसी काम आकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 8, 2012

    आदनीय सर, सादर प्रणाम रचना में मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार सर……….. कुछ पन्तियों को सुधार लिया है जो की वास्तव में अब अच्छे बन पड़े लग रहे हैं ………किन्तु एक पांति जिसे आपने दर्शाया था उसका मूल स्वरुप बदलने के कारण मैं उसे नहीं बदल रहा ……….. “”मत तरसाओ गोविन्द कि अब, यह पाप सहन न होता है, यह देख दशा इस धरती का, मन भीतर – भीतर रोता है””………..इस पांति में आपके द्वारा जो बतलाया गया की एक ही शब्द की पुनरावृति हुई है कहीं आपका आशय ………….”पाप सहन न होता है’”………और “मन भीतर – भीतर रोता है”" से तो नहीं है………..समझ नहीं पा रहा हूँ बाकी मात्राओं को व्यवस्थित करने की कला के बारे में सीखना चाहता हूँ और अध्यन भी करना चाहता हूँ सर……..यदि आपके नजर में कोई ऐसी पुस्तक हो जिसमें इसकी विस्तृत जानकारी दी गई हो तो मुझे बतलाएं सर…………..आपका पुनः आभार …… आवयश्यकता पड़ने पर गुरुजनों को अवस्य याद करूंगा

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 4, 2012

मान्य भाई आनंद जी , सप्रेम नमस्कार !……..बिलकुल कए ढंग की नए तेवर में ! बधाई !!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय विजय सर, सादर प्रणाम बहुत ही संक्षिप्त में आप निकल गएँ सर……ऐसे काम नहीं होगा आशीर्वाद अनिवार्य है ………..बहुत दिनों से आपकी कोई नई पोस्ट नहीं आई आपकी लेखनी पढने में काफी अच्छा लगता है सर

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 4, 2012

अब तो केवल नर मिलते है, अबला के तन को खाने को, नारी की दशा भी कहाँ सही, व्याकुल कायासुख पाने को, प्रिय प्रवीन जी बहुत सुन्दर ..हम भी प्रभु से यही प्रार्थना करते हैं के कलयुग और कितना दिन तड्पाएगा और कब इस गहरी रात के बाद सवेरा आएगा क्या हम लोग रहेंगे सवेरे तक ? सुन्दर भ्रमर ५

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय भ्रमर सर, सादर प्रणाम रात देखने के लिए कोई हो या नहीं सर पर इतना आश्वस्त हो जाएँ हम की …….वो सुबह कभी तो आएगी…… देखना है प्रभु कब तक अवतारित होते हैं………..आपके आशीर्वाद से उत्साह आता है सर

rekhafbd के द्वारा
October 4, 2012

आनंद जी फिर तूही कहना ईश मेरे, क्या व्यर्थ प्रलाप ये मेरा है, तुने ही कहा था हे कृष्णा, “हर रात के बाद सवेरा है”,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,हार्दिक बधाई .

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय रेखा जी आपका धन्यवाद सदेव की भाँती उत्साह देने के लिए….

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 4, 2012

आनंद जी ,,बहुत ही अच्छी रचना बधाई ,,,,वरना मानव में ज्ञान भरो, इस जाती का कल्याण करो, द्वापर बीते युग बीत गए, इस युग का अब अवतार धड़ो,

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    आपका तहे दिल से धन्यवाद रचना पर समय देने के लिए ………

yamunapathak के द्वारा
October 4, 2012

आनंद जी आपकी यह रचना बहुत पहले ही पढ़ लिया था पर कमेन्ट सबमिट नहीं हो पाए थे. वर्त्तमान समस्या को बहुत सुन्दर abhivyakta kiya है. main आप सभी युवा ब्लोग्गेर्स के vichar को naman karatee hun mujhe aatyant खुशी होती है की samaaj अच्छी सोच से कभी रीता नहीं होगा.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    कमेन्ट की प्रोब्लम मुझे भी आ रही है बहुत सारे पोस्ट पर कमेन्ट हो ही नहीं पा रहा ………जो भी हो आपने पढ़ा फिर क्या चाहिए आपके आशीर्वाद से कुछ अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलते रहती है……..आगे भी आशीर्वाद सह स्नेह बनाए रखियेगा

mataprasad के द्वारा
October 3, 2012

        आदरणीय ANAND PRAVIN जी, सादर नमस्कार   बहुत ही अच्छी प्रस्तुति, मानव ने मानवता छोड़ी, हाँ छोड़ दिया कब का ही शरम, यह बीते युग की बात हुई, जब मिलता था कर्मो में धरम, आज के मानव के लिए पैसा ही सब कुछ है | पैसे के लिए ये कुछ भी करेगा || जय हिंद …

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय माताप्रसाद जी बहुत दिनों बाद आपके कमेन्ट को देख ख़ुशी हुई……..आगे भी स्नेह बना रहे

Santlal Karun के द्वारा
October 3, 2012

आनंद जी, इस भरे-पूरे वैचारिक मंच पर कलिकाल में भक्तिकाल की भावना, किन्तु कलियुग की नवीन स्तुति-उद्भावना के साथ केवल आप के यहाँ ठहराव लिए हुए दिखी– “अब तो केवल नर मिलते है, अबला के तन को खाने को, नारी की दशा भी कहाँ सही, व्याकुल कायासुख पाने को |” और भजन-कीर्तन में उलाहना भी कम नहीं–”फिर तूही कहना ईश मेरे, क्या व्यर्थ प्रलाप ये मेरा है, तूने ही कहा था हे कृष्णा, “हर रात के बाद सवेरा है” |” आप के ब्लॉग से मैं वंचित था वन्धुवर, पर यहाँ पहुँचकर “प्रवीण आनंद” की अनुभूति हुई | इस भावप्रवण ब्लॉग तथा पोस्टों के लिए बधाई, साधुवाद एवं आभार !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय संतलाल सर, सादर प्रणाम बहुत ही ख़ुशी हुई की आपने मेरे ब्लॉग पर अपनी दृष्टि डाली ………..रचना को आपने सराहा यह उत्साहवर्धक है…. आगे भी स्नेह बनाय रखे……….

Mohinder Kumar के द्वारा
October 3, 2012

आनन्द जी, आपके कहने का मतलब है ’ओ कान्हा अब तो सुना दो तुम मधुर मुरली की तान” सुन्दर गीत के बधाई. लिखते रहिये.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 3, 2012

    आदरणीय मोहिंदर जी, सादर प्रणाम आपके ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक आभार ……….और साथ ही साथ आपके प्रथम पुस्तक के प्रकाशित होने के लिए शुभकामना भी आपकी पुस्तक नई बुलंदियों को छुए ………रचना को सराहने के लिए आभार

aartisharma के द्वारा
October 3, 2012

आनंद जी बेहद सुन्दर और प्रासंगिक कविता के लिए बधाई …

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 3, 2012

    आदरणीय आरती जी ब्लॉग पर प्रथम बार आने के लिए हार्दिक आभार ………..रचना सराहने के लिए धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 3, 2012

हर रात की सुबह जारूर होती है पापियों का अंत भी जरूर होता है. सुन्दर रचना देने पर बधाई. प्रिय आनंद जी, सस्नेह.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 3, 2012

    बस सर उसी सुबह की इन्तजार में सब लगे हुए हैं………वो सुबह कभी तो आएगी………..हार्दिक आभार सर

jlsingh के द्वारा
October 2, 2012

प्रिय आनंद जी, सुन्दर चित्र के साथ सुन्दर प्रस्तुति ! पर आज तो “रघुपति राघव राजाराम पतित पवन सीताराम इश्वर अल्ला तेरो नाम सबको सम्मति दे भगवान् !” या “जय जवान जय किसान” कहने दीजिये भगवन कृष्ण अपनी बासुरी का तान ऐसा छेड़ें, कि हम सबमे सद्बुद्धि आ जाय! आपकी प्रार्थना में मेरी भी प्रार्थना मिल जाय!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 3, 2012

    आदरणीय जवाहर सर, सादर प्रणाम रघुपति राघव गाने का तो सदेव दिन होता है सर…………साथ ही साथ वेष्णव जन भी किन्तु हम अब भक्ति गाने सिर्फ तीन देनों में ही गाते दीखते हिं…………. छोटी सी कोशिश की थी सर आपने प्राथना को स्वीकार किया बस यही तो चाहिए था……….. आशीर्वाद बना रहे बस

div81 के द्वारा
October 2, 2012

ये तो सच है प्रवीन भाई हर रात के बाद सवेरा है मगर इस रात का अन्धकार इतना घनेरा हाई की सुबह का इन्तजार मुश्किल लग रहा है ………… प्रभु हमारी भी अर्ज सुनिए बहुत ही सुंदर भक्ति गीत

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 3, 2012

    आदरणीय दिव्या दीदी, सादर प्रणाम सही कहा आपने अन्धकार बहुत गहराता जा रहा है…….किन्तु याद रहे की सुबह होने से पहले ही अन्धकार अपने पूर्ण रुबाब पर होता है…………………प्रभु आपकी और हमारी अर्ज जरुर सुनेंगे……किन्तु आप अर्ज तो करिए पहले कितने दिनों से आपकी कोई प्रस्तुति नहीं आई…………जल्द कुछ लिखिए………….आपका प्रिय

akraktale के द्वारा
October 2, 2012

प्रिय आनंद जी                 सादर, फिर तूही कहना ईश मेरे, क्या व्यर्थ प्रलाप ये मेरा है,                            तुने ही कहा था हे कृष्णा, “हर रात के बाद सवेरा है”                 बिलकुल सही है हर रात के बाद सवेरा होता है किन्तु इस बार बस रात कुछ लम्बी हो गयी है. बधाई स्वीकारें. उम्मीद बनाए रखें.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 2, 2012

    आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम उम्मीद कायम है सर……..वो सुबह कभी तो आएगी ……वो सुबह कभी तो आएगी एक छोटा सा प्रयाश किया था सर आपने सराहा यही बहुत है…….आशीर्वाद बना रहे

Santosh Kumar के द्वारा
October 2, 2012

आनंद भाई ,.सादर नमस्कार बहुत ही भाव भरी अतिसुन्दर प्रार्थना ,… वरना मानव में ज्ञान भरो, इस जाती का कल्याण करो, द्वापर बीते युग बीत गए, इस युग का अब अवतार धरो !!……करबद्ध होकर आपकी प्रार्थना में सम्मिलित हूँ ,..सादर अभिनन्दन

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 2, 2012

    संतोष भाई की जय हो, एक कोशिश कुछ अच्छा लिखने की बस और आपने सराहा प्रसन्नता हुई……. प्रेम बनाय रखे………..

manoranjanthakur के द्वारा
October 2, 2012

बहुत सलीका कई भाव लिए एक बिरल सोच .. बहुत बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 2, 2012

    आदरणीय मनोरंजन सर, सादर प्रणाम सराहना के लिए ह्रदय से आभार सर ………..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
October 2, 2012

बहुत सुन्दर कविता! आनंद जी. फिर तूही कहना ईश मेरे, क्या व्यर्थ प्रलाप ये मेरा है, तुने ही कहा था हे कृष्णा, “हर रात के बाद सवेरा है” अर्थपूर्ण पंक्तियाँ.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 2, 2012

    आदरणीय राजीव सर, सादर प्रणाम बहुत दिनों बाद आगमन देख अच्छा लगा सदैव की भाँती रचना को पढने और सराहने के लिए आभार सर…………

nishamittal के द्वारा
October 2, 2012

आपकी पीड़ा और फिर प्रभु से पुकार. बहुत सुन्दर भाव

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    October 2, 2012

    सराहना के लिए धन्यवाद निशा मैम……..


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