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"निजीकरण"---भविष्य पे वार

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“ये” देखने में तो नयी, इक सोच का प्रतिक है,
पर फक्र न करो की इसमें “नीचता” अधिक है,
अधीर हो ये सोच जो, दिखा रहे समाज में,
हम और क्या कहें ये है, दरिद्र की आवाज में,
बेच  के ये देश को, है पूँजी अब जुटा रहें,
मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I

फक्र है इन्हें की, “अर्थशास्त्र” के है हम धनी,
और देश “शास्त्र” में निपुणता की है कमी,
बड़े – बड़े ये लोग कृत्य, कर रहे बड़े – बड़े,
इनका जो बस चले तो, बेच दे सब खड़े – खड़े,
देश का ये धन को है, विदेश में लुटा रहे,
मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I

ढूंढ़ के कहाँ से लाये, हम नयी आवाज़ को,
जो जलाये वास्तविक, समृधि की मशाल को,
निजीकरण के नाम पे, जो खेल है ये चल रहा,
इस खेल में, सामर्थ है, मोम सा पिघल रहा,
माचिस जला के ये उसे, मशाल है बता रहें,
मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I

तेल, कोयले को और खनिज को हैं बेचते,
और अपने मूँछ पे, है ताव कैसे खींचते,
दावत निकाल घर में है, घुसपेठिये बुला रहें,
और उन्नति का इसको, साज है बता रहें,
संसाधनों को बेच हमको, मुर्ख है बना रहे,
मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I

यही नहीं रुका तो देखो, क्या गजब ये ढाएगा,
जब आपके ही धन से, कोई आपको सताएगा,
अर्थशास्त्र का सवाल, है नहीं यहाँ बड़ा,
इस सोच में “जो सोच है”, उसी का है किया धड़ा,
ये पीठ पीछें हँस रहें, और हमें रुला रहें,
मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I

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ANAND PRAVIN

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajkamal Sharma के द्वारा
August 22, 2012

धन्य है हमारा देश नेता और अपराधी नोकरशाह और व्यापारी सभी लूटने में लगे है इसको सभी तरह से लूट कर भी यह कभी खाली नहीं हो पाता है पता नहीं कितना ही काला धन विदेशों में जमा होता चला जाता है लूटने  वाले थक जायेंगे लेकिन यह बिना सोने के पंखो वाली चिड़िया आखिर तक लुटती हुई भी हमेशा और लुटने के काबिल बनी ही रहेगी जय श्री राम

akraktale के द्वारा
August 20, 2012

प्रिय आनंद जी                    नमस्कार, बहुत ही सामयिक और जरूरी विषय पर लिखने पर धन्यवाद.बिलकुल यही देखने में आ रहा है कि निजीकरण को आधार बना कर नेतागण अपने तमाम जीवन और मै तो कहूँगा कि अपनी कई पीढीयों कि व्यवस्था करने में लगे हुए हैं.निजीकरण के आधार पर हो रहे कार्य देश और मानव दोनों के साथ अन्याय है. इस व्यवस्था का स्वरुप जीतनी जल्दी बदला जाएगा उतना ही देश और देश के युवाओं के लिए लाभकारी होगा. 

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
August 19, 2012

सोने की चीड़ी का हाल इतना बेहाल बन्धु , बनकर रह गयी क्षेत्र है निवेश के ! आनंद जी ! यह अर्थ शास्त्री तो लगता है देश को निगल कर ही दम लेगा ! यह मामूली नहीं जंगली और विषैला अजगर है ! सुन्दर और समसामयिक प्रस्तुति के लिए बधाई ! पुनश्च !!

sinsera के द्वारा
August 19, 2012

आनंद जी नमस्कार, आपकी ऊँची सोच और ऊपर से इतने कठिन व नीरस विषय पर कविता….वाह वाह …क्या बात है.. निजीकरण तो व्यापार की नीतियों का एक हिस्सा है, बस ज़रा हिसाब किताब ठीक बैठना चाहिए..अब एक अर्थशास्त्री के ऊपर जब तमाम बोझ डाल दिए जायेंगे तो काम का स्टैण्डर्ड तो थोडा गिर जायेगा ना…..

ashishgonda के द्वारा
August 19, 2012

आपके सत्यता रुपी दर्पण से झूंठ रुपी धुल साफ़ करती भावनाओं को नमन,,,,, http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/08/13/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A8/

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
August 19, 2012

आनंद जी, सादर नमस्कार, आपकी कविता पढ़कर बहुत अच्छा लगा और सत्य का आभास भी हुआ देश हित में आपकी सोंच को मेरा सलाम मेरे इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दीजियेगा http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/08/18/18/

mparveen के द्वारा
August 19, 2012

यही नहीं रुका तो देखो, क्या गजब ये ढाएगा, जब आपके ही धन से, कोई आपको सताएगा, अर्थशास्त्र का सवाल, है नहीं यहाँ बड़ा, इस सोच में “जो सोच है”, उसी का है किया धड़ा, ये पीठ पीछें हँस रहें, और हमें रुला रहें, मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I सुनदर आह्वान करती रचना के लिए बधाई …..

rekhafbd के द्वारा
August 19, 2012

आनंद जी यही नहीं रुका तो देखो, क्या गजब ये ढाएगा, जब आपके ही धन से, कोई आपको सताएगा, अर्थशास्त्र का सवाल, है नहीं यहाँ बड़ा, इस सोच में “जो सोच है”, उसी का है किया धड़ा, ये पीठ पीछें हँस रहें, और हमें रुला रहें, मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें सुंदर भाव लिए कविता ,हार्दिक बधाई

Chandan rai के द्वारा
August 18, 2012

आनंद मित्र , तेल, कोयले को और खनिज को हैं बेचते, और अपने मूँछ पे, है ताव कैसे खींचते, दावत निकाल घर में है, घुसपेठिये बुला रहें, और उन्नति का इसको, साज है बता रहें, संसाधनों को बेच हमको, मुर्ख है बना रहे, मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I बहुर सुन्दर कविता द्वारा आपने अपनी बात रखी ! निजीकरण जरुरी भी है पर संतुलित रूप में !

alkargupta1 के द्वारा
August 18, 2012

आनंद प्रवीण जी , समयानुकूल एक क्रान्ति का आह्वान… जन जागरण करने वाली उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति !

nishamittal के द्वारा
August 18, 2012

तेल, कोयले को और खनिज को हैं बेचते, और अपने मूँछ पे, है ताव कैसे खींचते, दावत निकाल घर में है, घुसपेठिये बुला रहें, और उन्नति का इसको, साज है बता रहें, संसाधनों को बेच हमको, मुर्ख है बना रहे, मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें कसर ही कौन सी बची है है,देश को लूटकर खाने में

manoranjanthakur के द्वारा
August 18, 2012

मातृभूमि से प्यार करने वाला चाहिये सुंदर आनंद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 18, 2012

जैसे गोरों को व्यापार करने का फल मिला शायाद उससे भी बुरा हाल हो. बधाई. प्रिय आनंद जी, सस्नेह मेरी कविअता को ठीक करने वा शीर्षक सुझाने का कष्ट करें. असहज परिस्थिति में लिखी थी.

vikramjitsingh के द्वारा
August 18, 2012

आनंद जी…..सादर….. भावपूर्ण और सार्थक काव्यात्मक प्रस्तुति…..

dineshaastik के द्वारा
August 18, 2012

भाई आनंद जी, नमस्कार। क्राँति का आवाहन एवं हृदय को उद्देलित, जन जागृति के लिये महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें।

jlsingh के द्वारा
August 18, 2012

यही नहीं रुका तो देखो, क्या गजब ये ढाएगा, जब आपके ही धन से, कोई आपको सताएगा, अर्थशास्त्र का सवाल, है नहीं यहाँ बड़ा, इस सोच में “जो सोच है”, उसी का है किया धड़ा, ये पीठ पीछें हँस रहें, और हमें रुला रहें, मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें इ स्नेही आनंद जी, विचार तो है सुन्दर, पर अँधेरा घोर दिख रहा जो कुछ भी है सामने, आँखों के आगे लुट रहा चंदा छिपा है नभ में, तारे क्या टिम टिमाएंगे . काली घटा के सामने , उजाले छिप ही जायेंगे!

अजय यादव के द्वारा
August 17, 2012

sundr,सटीक रचना

Santosh Kumar के द्वारा
August 17, 2012

प्रिय आनंद भाई ,.सादर नमस्ते यही नहीं रुका तो देखो, क्या गजब ये ढाएगा, जब आपके ही धन से, कोई आपको सताएगा, माचिस जला के ये उसे, मशाल है बता रहें, मात्रभूमि का है देखो, दाम ये लगा रहें I ……आपके भावों को सलाम है !..ये गद्दार देश को पूँजीपतियो और उनके बहाने विश्वबैंक के हाथों अमेरिका के कब्जे में देना चाहते हैं,… बहुत कुछ दिया जा चुका है ,..अब हम गद्दारों को मात्रभूमि की नीलामी नहीं करने देंगे !!…वन्देमातरम


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