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”हथियार हूँ बना रहा”

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मानसिक चित्र को, हूँ शब्द में उतारता,
इन शब्दों को मैं सोच से, और हूँ निखारता,
निखारता हूँ मैं उसे, जो “कोयले”की खान में,
सचित्र रूप में बसा, विचारशील ज्ञान में,
ज्ञानशिलता की मैं, प्रदर्शिनी दिखा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
मैं जलाता हूँ दिया,  प्रकाश की ही चाह में,
मैंने देखा है खड़े, कई को अपनी राह में,
मै चेतना जगाता हूँ, नए – नए विचार से,
बचाना चाहता हूँ मैं, समाज को विकार से,
प्रयत्नशील अब भी हूँ, इसी लिए हूँ  गा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
जो चाहे मुझको अब कहो, सुनूंगा केवल अपनो की,
मैं बांछ्ना  हूँ चाहता, बाते नए वो सपनो की,
वो सपने जिनको देख कर, यहाँ पे मैं बड़ा हुआ,
उसे ही तो निभाने को, पुरुषार्थ से खड़ा हुआ,
क्या सोचता हूँ  मैं इसे, सभी को हूँ दिखा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
इंसान के लिए यहाँ, शैतान ही है रह गए,
इंसान जो बने यहाँ, तूफ़ान में है बह गए,
विचित्र रोग है यहाँ, समाज में भरा  पड़ा,
इंसानियत के खून से, है लाल हो चुका धड़ा,
इंसान के ही खून को, मैं भी तो हूँ उठा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
आत्मचिंतन मैं करू, क्यों किसी के वास्ते,
अलग – अलग है जा रहें, विचार के ये रास्तें,
मुझे किसी प्रकार का, अह्सान अब न चाहिए,
खोज – खोज थक गया, मुकाम अब न चाहिए,
विश्वास को  मैं दिल में अपने, अब भी हूँ जगा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
देखा है उन्हें  भी जो, तलवार रखते पास में,
डरा के जितने की इक, उम्मीद और आस में,
है कौन सा वो धार जो, तलवार को गिराएगा,
कटता रहेगा यूँ ही या, कभी इसे मिटाएगा,
कलम की ताकतों से मैं, शक्ति ये घटा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
नवीनता को मैं यहाँ, आधार ना बनाऊँगा,
प्राचीनता को ही मैं अब, संशोधित कर के लाऊँगा,
क्या मिला समाज को, नविन इन विचार से,
अभद्र रूप में यहाँ, हो रहे प्रचार से,
समाज का वो शुद्ध रूप, को ही मैं बता रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
सामान्य सा जो मैं यहाँ, दिख रहा था आज तक,
बुद्धिमता का मैं यहाँ,  था खो चुका आकार तक,
सामान्य जानकारियों को, मैं सरल बनाऊँगा,
योग्यता भड़ी हुई है, इसको मैं दिखाऊँगा,
प्रवेश हो चूका मेरा, सभी को मैं जता रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”
……
ANAND PRAVIN
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मानसिक चित्र को, हूँ शब्द में उतारता,
इन शब्दों को मैं सोच से, और हूँ निखारता,
निखारता हूँ मैं उसे, जो “कोयले”की खान में,
सचित्र रूप में बसा, विचारशील ज्ञान में,
ज्ञानशिलता की मैं, प्रदर्शिनी दिखा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”


मैं जलाता हूँ दिया,  प्रकाश की ही चाह में,
मैंने देखा है खड़े, कई को अपनी राह में,
मै चेतना जगाता हूँ, नए – नए विचार से,
बचाना चाहता हूँ मैं, समाज को विकार से,
प्रयत्नशील अब भी हूँ, इसी लिए हूँ  गा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”


जो चाहे मुझको अब कहो, सुनूंगा केवल अपनो की,
मैं बांछ्ना  हूँ चाहता, बाते नए वो सपनो की,
वो सपने जिनको देख कर, यहाँ पे मैं बड़ा हुआ,
उसे ही तो निभाने को, पुरुषार्थ से खड़ा हुआ,
क्या सोचता हूँ  मैं इसे, सभी को हूँ दिखा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”


इंसान के लिए यहाँ, शैतान ही है रह गए,
इंसान जो बने यहाँ, तूफ़ान में है बह गए,
विचित्र रोग है यहाँ, समाज में भरा  पड़ा,
इंसानियत के खून से, है लाल हो चुका धड़ा,
इंसान के ही खून को, मैं भी तो हूँ उठा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”


आत्मचिंतन मैं करू, क्यों किसी के वास्ते,
अलग – अलग है जा रहें, विचार के ये रास्तें,
मुझे किसी प्रकार का, अह्सान अब न चाहिए,
खोज – खोज थक गया, मुकाम अब न चाहिए,
विश्वास को  मैं दिल में अपने, अब भी हूँ जगा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”


देखा है उन्हें  भी जो, तलवार रखते पास में,
डरा के जितने की इक, उम्मीद और आस में,
है कौन सा वो धार जो, तलवार को गिराएगा,
कटता रहेगा यूँ ही या, कभी इसे मिटाएगा,
कलम की ताकतों से मैं, शक्ति ये घटा रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”


नवीनता को मैं यहाँ, आधार ना बनाऊँगा,
प्राचीनता को ही मैं अब, संशोधित कर के लाऊँगा,
क्या मिला समाज को, नविन इन विचार से,
अभद्र रूप में यहाँ, हो रहे प्रचार से,
समाज का वो शुद्ध रूप, को ही मैं बता रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”


सामान्य सा जो मैं यहाँ, दिख रहा था आज तक,
बुद्धिमता का मैं यहाँ,  था खो चुका आकार तक,
सामान्य जानकारियों को, मैं सरल बनाऊँगा,
योग्यता भड़ी हुई है, इसको मैं दिखाऊँगा,
प्रवेश हो चूका मेरा, सभी को मैं जता रहा,
कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा”

……

ANAND PRAVIN

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

munish के द्वारा
August 14, 2012

प्रवीण जी, पढ़कर आनंद आ गया, वैसे मैंने आपके सभी ब्लोग्स नहीं पढ़े हैं पर जितने पढ़े हैं ये सबके ऊपर है……..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    मुनीश भाई आपने मेरी रचना को इतना पसंद किया यह पढ़ हार्दिक ख़ुशी हुई………….

Santosh Kumar के द्वारा
August 12, 2012

प्रिय आनंद भाई ,.सादर नमस्ते आज यह रचना पढ़कर दिन की अच्छी शुरुआत होने वाली है ,..सुन्दर भाव और जज्बा आपके राह में आनंद ही आनंद लाये,.. प्रवीणता से आप सभी बाधाओं को हटायें यही कामना है ,….इन पंक्तियों को नहीं समझ पाया ,..कृपया ज्ञानवर्धन कीजिये देखा है उन्हें भी जो, तलवार रखते पास में, डरा के जितने की इक, उम्मीद और आस में, है कौन सा वो धार जो, तलवार को गिराएगा, कटता रहेगा यूँ ही या, कभी इसे मिटाएगा, कलम की ताकतों से मैं, शक्ति ये घटा रहा,………….सादर आभार

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    संतोष भाई की जय हो हमेशा, आपके स्नेह और प्यार का ही यह परिणाम है ……….. जिन पन्तियों को आपको समझने में परेशानी हो रही है दरअसल वहां …… तलवार को मैंने उन लोगों को दर्शाने के लिए लिखा है जो समर्थवान है जैसे नेता, बाहुबली, उद्योगपति बाकी बागार्बिल्लों के बारे में तो आप जानते ही हैं…………….उनकी शक्तिओं को कम करने का एक आम आदमी के पास में एक ही हथियार है वो है कलम वो अपने हित के लिए किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार रहते है आपकी प्यार भरी प्रतिक्रिया के लिए आभार…………

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 8, 2012

इंसान के लिए यहाँ, शैतान ही है रह गए, इंसान जो बने यहाँ, तूफ़ान में है बह गए, विचित्र रोग है यहाँ, समाज में भरा पड़ा, इंसानियत के खून से, है लाल हो चुका धड़ा, इंसान के ही खून को, मैं भी तो हूँ उठा रहा, कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा” जोशीली कविता खून में उबाल लाने को प्रेरित करती …काश ऐसा ही सब सोचना शुरू करें ..आप के ये हथियार और पैने हों धार तेज हो जय श्री राधे भ्रमर ५

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    आपका आशीर्वाद रहा सर तो धार तेज़ ही बनी रहेगी………….

shashibhushan1959 के द्वारा
August 8, 2012

आदरणीय आनंद जी, सादर ! बहुत सुन्दर जज्बातों से भरी रचना के साथ वापसी अच्छी लगी ! त्रुटियों को नजरअंदाज कर दिया जाय तो बेहद सशक्त रचना ! साहस, जोश और उत्साह से भरी हुई ! शुभकामनाएं !

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    August 8, 2012

    प्रिय आनंद जी शशि भाई से मै भी सहमत हूँ भाव आप के मन में बहुत आते हैं हम ललचाते हैं कि हमारे भी ऐसे आयें लेकिन और मेहनत की जरुरत है लिखने के बाद एक दो बार पढ़िए व्याकरण लिंग पर और ध्यान दीजिये ..जय श्री राधे भ्रमर ५

    Santosh Kumar के द्वारा
    August 12, 2012

    अब अशुद्धिओं की आदत को बदलिए भाई ,…४/५ ….एक नंबर अशुद्धिओं को वन्देमातरम

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    आदरणीय सर, सादर प्रणाम रचना के भाव आपको अच्छे लगे बस और क्या चाहिए …………. सुधार करने की कोशिश करूंगा……….. और अच्छी कविताओं को लाने की भी……..आपका आशीर्वाद बना रहे

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    उम्मीद है भ्रमर सर आगे आपको और संतोष भाई को शिकायत का मौक़ा नहीं मिलेगा ………..

yamunapathak के द्वारा
August 6, 2012

आनंद जी बहुत सुन्दर कविता आज इसे अखबार में भी पढ़ा बधाई आपकी नयी सोच ने फिर se मुझे अपने प्रिय मंच पर उपस्थित लेखन शक्ति और सकारात्मक सोच पर गर्व करने की राह दिखा दी. बहुत अच्छा लगा.बस एक पंक्ति से इतेफाक नहीं रख पा रही.आशा है आप मेरे इस व्यक्तिगत सोच से आहत नहीं होंगे और इस प्रतिक्रिया को महज़ एक सोच मानेंगे.”इंसान जो बने यहाँ तूफ़ान में बह गए” ऐसा नहीं है इंसानी शक्ति की वज़ह से ही आज भी दुनिया कायम है.ये बात और है कि उन्हें किसी का साथ नहीं मिल पता पर itihas गवाह है कि परिवर्तन का बिगुल इंसानों ने ही बजाया है शैतानों ने नहीं.ve तूफ़ान में bahate नहीं balki apnee shahaadat से itihas rach kar sadaa ke लिए अमर हो जाते हैं. शेष पुरी कविता ज़ज्बों से भरपूर है. बहुत-बहुत बधाई.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    आदरणीय यमुना जी, सादर प्रणाम आहात होने का तो सवाल ही नहीं है……..प्यार और स्नेह में बोली गई बात से भी भला कौन आहात होगा कविता में ऐसे भाव आ गए निश्चय ही आपकी कथनी भी अपनी जगह सही है आपके स्नेह भरी विस्तृत प्रतिक्रया के लिए ह्रदय से आभार

yogi sarswat के द्वारा
August 6, 2012

मैं जलाता हूँ दिया, प्रकाश की ही चाह में, मैंने देखा है खड़े, कई को अपनी राह में, मै चेतना जगाता हूँ, नए – नए विचार से, बचाना चाहता हूँ मैं, समाज को विकार से, प्रयत्नशील अब भी हूँ, इसी लिए हूँ गा रहा, कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा” आनंद प्रवीण जी , आप फिर से पुराने रंग में लौट रहे हैं , स्वागत है आपका ! बेहतरीन रचनायें प्रस्तुत करने के लिए !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    योगेन सर आपकी प्यार और स्नेह से ही यह संभव है………….सदा की तरह उत्साह देने के लिए आपका ह्रदय से आभार

manoranjanthakur के द्वारा
August 5, 2012

bahut tej hathiyar hai anandji धार bi तेज अति सुंदर

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    बहुत दिनों बाद आपकी प्रतिक्रया पा अच्छा लगा सर………..स्नेह बना रहे

seemakanwal के द्वारा
August 4, 2012

आनन्द जी आपके खुदा करे आप के कलम की धार और तेज़ हो .

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    ब्लॉग पर आपका स्वागत है……………रचना पढने के लिए आभार

MAHIMA SHREE के द्वारा
August 4, 2012

आनंद जी नमस्कार .. जबरदस्त रचना के लिए बधाइयाँ .. आपकी रचना दिनों दिन परिपक्क होती जा रही है ..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    महिमा जी चलिए आपने अपनी व्यस्ताओं के बिच छोटा सा समय निकाला पढ़ कर ख़ुशी हुई………..आप जल्द मंच पर आये यही कामना रहेगी सराहने के लिए आभार

akraktale के द्वारा
August 4, 2012

प्रिय आनंद जी नमस्कार, एक कलम के सिपाही को कभी भी अपनी कलम पर तलवार से कम भरोसा नहीं होना चाहिए इन्ही विचारों को और प्रबलता देती बहुत ही सुन्दर विचारों से सुसज्जित रचना. हार्दिक बधाई. है कौनसी जगह जहां स्वप्नों को बांचना सिखा रहे, इतनी नवीनता भरी रचनाएं आप कहाँ से हैं ला रहे.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    बस सर आशीर्वाद बनाए रखें और भी रचनाओं को आपसे मार्गदर्शित करवाना है………..सराहने के लिए आभार सर

dineshaastik के द्वारा
August 4, 2012

आनन्द जी, बहुत ही परिपक्क, जोश एवं हृदय को उद्देलित करने वाली एवं क्राँति का आवाहन करती हुई सराहनीय रचना…..लय एवं गति पर पूरा नियंत्रण….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    आपका ही आशीर्वाद है सर……….उत्साह देते रहें

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 3, 2012

स्नेही प्रवीन जी , शुभाशीष. bhav और प्रस्तुतीकरण बढ़िया. पर जब इसे आदरणीय शशि भूषण जी देखेंगे तो फिर कहेंगे पोस्ट करने के पहले पढ़ लिया करें. टाइप त्रुटी है. सुन्दर रचना हेतु बधाई. यही आशा है जो आप खरे उतरते हैं.

    jlsingh के द्वारा
    August 4, 2012

    नाना (जी) का आशीष है, अग्नि कुंड तप्त है, बादलों की ओट में, द्रोण कहीं सुप्त हैं! कागजों के पृष्ठ पर पेन को पजा(तेज करना) रहा! कागजों, कलम को मैं ”हथियार हूँ बना रहा” ज्योति से ज्योति जागते चलो! प्रेम की गंगा बहाते चलो!

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    August 5, 2012

    आशीष बिखरा सारे अंगन खाओ गगन रहो मगन

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    आदरणीय प्रदीप सर, सादर प्रणाम रचना आपको बढ़िया लगी सर और क्या चाहिए …….देर से प्रतिक्रया का जवाब देने के लिए क्षमा

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    August 17, 2012

    नाना जी के आशीर्वाद का ही फल है की कुछ लिख रहा हूँ……..आपके प्यार के बिना भी यह संभव नहीं है स्नेह और आशीर्वाद दोनों बना रहे आप सब की ओर से


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