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"देखो है उठ रहा धुआँ"...........

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“यह कविता एक कहानी है उस धुंए कि जो लक्ष्य कि तलाश में निकला है उसका लक्ष्य है गगन जिसके ऊपर जाने कि चाहत वो रखता है इसी कहानी को मैंने कविता रूप में समझाने कि कोशिश कि है………और कोशिश कि है जीवन के संघर्ष को दर्शाने कि जिसमें सब सफलता को पाने में लगे हुए है………लक्ष्य कि प्राप्ति ही ध्येय होनी चाहिए चाहे लक्ष्य कुछ भी हो “

smoke cloud

देखो है उठ रहा धुआँ, पुन: गगन की चाह मे,
ये सोच के उठा है कि, इतिहास वो बनाएगा,

प्रारंभ में वो वीर था, था तेज़ उसकी आँख में ,
धुंए का रूप लेके वो, छुपा हुआ था राख में,


जब हमने राख को छुआ, निकल गया था वो धुआँ,
निकल गगन को देख के, विराट सा वो था हुआ,

वो सोच में पड़ा ही था, अभी ये पग धरा  ही था,
की देखता है सामने, थी मौत उसकी आ रही,
हवाओं का प्रचंड समूह, देखो उसे समां रही,


ये देख वो हैरान था, अवश्य वो अनजान था,

ये कौन काल आ गया, नयी – नयी दिशाओं से,
न जाने कैसे निकलूंगा, इन कातिली हवाओं से,


लक्ष्य तो गगन ही था, उचाईयों का नमन ही था,
पर सवाल ये उठा था की, क्या लक्ष्य अपना पायेगा,
या लक्ष्य की ही चाह में, वो काल को समायगा,

जो हो रहा उससे निकल, था होश में वो आ गया,
दे मात वो हवाओं को, निचे गगन के छा गया,


अध्याय था शुरु हुआ, भूमिकाओं पे ही जीत थी,
हरा के इन हवाओं को, मिली नयी इक सिख थी,


की इन पवन के झोंकों से, अगर उसे निकलना था,
तो डर को अपने आप से, कदम तले कुचलना था,

अब खोल पूरी आँख को, लगा वो नापने गगन,
तो पाया उसका आदि तो, अंत से भी दूर था,
यहाँ धुंए का देख लो, घट गया गुरुर था,


ये साफ़ – साफ़ दिख रही, थी चिंता उसके माथे पे,
जीतने की चाह तो, बची थी उसके हाथों  पे,

धुंए ने अपने आप को, ज़रा(थोड़ा) किया समेट के,
तूफ़ान के इक वेग से, निकल परा वो लेट के,


प्रयास जोरदार था, गगन पे एक वार था,
लेकिन गगन विशाल था, ये वार तो बेकार था,

अब धुएं ने जान ली, थी बात ये प्रयास कर,
अंत अब है  आ चूका , समाप्त कर निकास कर,


लहू – लुहान होके वो, वापस वहीँ पे जा गिरा,
जहां कोई नया धुआँ, हवाओं में ही था घिरा,

धुएं ने आँखें मुंद ली, तो पाया सामने गगन,
विशाल और समृद्ध वो, अजर – अमर अजेय गगन,


ये देख वो अचेत था, की गगन ने उसे बुला लिया,
जो जीतेजी  न हो सका, वो मर के उसने पा लिया,

ये पूछ बैठा वो धुआँ, गगन क्या मुझे बतायगा,
जो बात मेरे मन में है, उसे जरा सुनायगा,


है कौन सा इंसान वो, जो जीत पाया है तुझे,
है कौन सा महान वो, जिसने हराया है तुझे,


ये सुन गगन था हँस पड़ा, बोला जहाँ तू है खड़ा,
तू देख ले ज़रा धरा, अकेला तू ही है खड़ा,

प्रयास तो कई हुए, मुझे जीतने के वास्ते,
मगर अभी तलक नहीं, बनाय मैंने रास्ते,


आखरी ये शब्द तू, एक बार जान लो,
महान बनना है, यदि, तो लक्ष्य पे ही जान दो I

ANAND PRAVIN

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54 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaykr के द्वारा
July 17, 2012

BAHUT KHUB AANAND BHAYI AAPKO MERE BLOG PR AAMNTRN HAIN .

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 8, 2012

राजकमल उर्फ कसाई जी , आपका आभार प्रकट करने के लिए मेरे पास फंड की बेहद कमी हो गई है जल्द ही लोन के लिए अप्लाई करके + अरेंज करके आपका कर्ज चुकता करने की पुरजोर कोशिश करता हूँ – आनन्द कुमार “प्रवीण” :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| (* ) जय बोलो भगवान शंकर महादेव महाराज जी की सदाशिव जी की

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 31, 2012

आप ने कथात्मक-काव्य के माध्यम से वायस रूपी धुंआ को अच्छी शिकस्त दी है | अपशकुन का दर्प-मर्दन ज़रूरी है , साथ ही अनंत को छोड़ सांत ( स + अंत ) रूपी लक्ष्य के भेदन के प्रयास की सीख आप ने इस कथात्मक कविता के द्वारा दी है ! प्रिय प्रवीण भाई ! बधाई ! पुनश्च !

mparveen के द्वारा
May 26, 2012

आनंद भाई नमस्कार, अति सुंदर और सार्थक सन्देश देती आपकी रचना के लिए आपको बधाई … देरी से आने के लिए क्षमा करें पता नहीं कैसे आपकी ये खूबसूरत रचना आँखों से ओझल हो गयी थी बस इसीलिए आने में देरी हो गयी ….. युहीं लिखते रहें ..

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    महिला जेम्स बांड……………

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    लेडी जेम्स बांड……………

May 25, 2012

सन्देश देती सार्थक रचना आनंद भाई…बहुत बढ़िया लिखा आपने…

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    सार्थक तो ठीक है मित्र किन्तु लगता है की आपको शादी करवाने के लिए कुछ लिखना पडेगा

May 23, 2012

मैंने अपने इस आलेख में, कहीं भी नारी जाति को लेकर टिप्पड़ी नहीं की है यदि फिर भी इस पर स्त्री जाति द्वारा इसके विरुद्ध आवाज उठता है तो उनके भवनों का सम्मान करता हूँ और साथ में नारि जाति का भी. अतः इस आलेख के साथ अपना माफीनामा संलगन कर रहा हूँ और पूरी नारी-जाति से इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ. और यदि कोई सजा हो तो वो भी मंजूर परन्तु दूसरों की तरह पोस्ट को हटाकर अपने गुनाहों पर परदा नहीं डाल सकता और ना ही पोस्ट डिलेट करने के बाद , यह कह सकता हूँ कि मुझे किसी बात का पछतावा नहीं है परन्तु दूसरों के कहने पर यह डिलेट कर रहा हूँ. क्योंकि ऐसी महानता मैं नहीं दिखा सकता जिससे गुनाह भी करूँ और खुद को सही साबित करके लोगो की तालिया बिटोरू. साथ ही यह विश्वास दिलाता हूँ कि फिर कभी नारी जाति पर मेरी कोई ऐसी टिप्पड़ी नहीं होगी. हरेक गुनाह के साथ गुनाहगार का माफ़ीनामा होना चाहिए या फिर उसके गुनाहों की एक सजा जो इस बात का उसे याद कराये की उसने गुनाह किया है और साथ ही लोगो को भी पता चले कि वह गुनाह क्या है? अतः मैं अपने गुनाहों पर पर्दा डालकर, इस आलेख को डिलेट नहीं कर सकता. यदि आप सभी के मान-सम्मान और मर्यादा को मुझसे ठेस पहुँच रहा है तो मैं पहिले बोल चूका हूँ कि इस मंच को छोड़कर जाने के लिए तैयार हूँ क्योंकि यदि किसी का मान-सम्मान और मर्यादा खुले आसमान में लटका है तो हवा ( अनिल ) के प्रवाह से उसका हिलना स्वाभाविक सी बात है और वह हमेशा हिलाता ही रहेगा मैं रहूँ या ना रहूँ क्योंकि और भी करक है इस दुनिया में उसे हिलाने के लिए. नोट- कृपया जिस मान-सम्मान और मर्यादा की बात निचे की पंक्तियों में रखा हूँ नारी जाति अपने ऊपर न ले. वह इस मंच के मान-सम्मान और मर्यादा के ऊपर सवाल उठाया हूँ………!

sinsera के द्वारा
May 23, 2012

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

    May 23, 2012

    अरे यहाँ भी आप आ गयी…..अब कहाँ जाऊ भाई……निकल लो पतली गली से अलीन………………..!

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी,  ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ   रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………!  और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

pawansrivastava के द्वारा
May 22, 2012

हम मुंबई वासियों के आसमान पे जिस कदर विषाक्त धुआँसा छाया है कि हमे धुंए के नाम से दर लगता है पर आपकी कविता का धुआं मुझे बड़ा भाया .

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    वास्तव में मुंबई दिल्ली जैसे शहरों में धुँएं से हो रहे प्रदुषण एक विकत समस्या है……………..स्वक्ष हवा चाहिए तो सरिता दीदी के ब्लॉग पर गाँव की गवा बह रही है एक बार खा आइये……………हा हा कोशिश को सराहने के लिए आभार

rekhafbd के द्वारा
May 22, 2012

आनंद जी ,अति सुंदर पंक्तियाँ , आखरी ये शब्द तू, एक बार जान लो, महान बनना है, यदि, तो लक्ष्य पे ही जान दो इ,बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    धन्यवाद रेखा जी

yogi sarswat के द्वारा
May 22, 2012

है कौन सा इंसान वो, जो जीत पाया है तुझे, है कौन सा महान वो, जिसने हराया है तुझे, … ये सुन गगन था हँस पड़ा, बोला जहाँ तू है खड़ा, तू देख ले ज़रा धरा, अकेला तू ही है खड़ा, …प्रिय आनंद जी नमस्कार, सुन्दर रचना. कभी कभी विशाल सूर्य भी छोटे से बादल के पीछे छुप जाता है मगर कितनी देर के लिए बस वैसा ही प्रयास धुंए का भी है. मगर हम जानते हैं की सत्यता तो कुछ और ही है ! सुंदर रचना

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    आपका धन्यवाद योगेन जी

अजय कुमार झा के द्वारा
May 22, 2012

बेहतरीन प्रस्तुति । सुंदर रचना , प्रभावी बन पडी है आनंद जी

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    धन्यवाद आदरणीय अजय जी

sinsera के द्वारा
May 22, 2012

प्रिय आनंद जी, धुएं का तो स्वभाव ही है ऊपर उठना…जब उठा है तो ऊपर ही जायेगा चिंता न करें, आप फ़िलहाल घरेलू टी वी पर सोनी चैनल का आनंद उठाएं…………मुबारकबाद

    dineshaastik के द्वारा
    May 22, 2012

    भाई आनंद जी सरिता जी ने सच  कहा है, धुँआ   जो कर रहा है वह उसका स्वभाग  है। स्वभाव से विपरीत  करता तो चिन्तनीय होता। सुन्दर काव्यात्मक  प्रस्तुति के लिये बधाई…..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    दीदी धुएं का स्वभाव बताने के लिए धन्यवाद………..मनुष्य का भी स्वभाव है आगे बढ़ना किन्तु धुएं की तरह सार्थक लगन कितने में है वो देखने की बात है…………………घरेलू टीवी कुछ समझ में नहीं आया………..सोनी पर कभी कभी सी आई डी देखता हूँ बाकी का पता नहीं

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    सकारात्मक स्वभाव का स्वागत ही होना चाहिए और उसे आदर्श मानना चाहिए दिनेश सर…………मनुष्य को भी आगे के बारे में सोचते रहना चाहिए………..आपका आभार सर

    sinsera के द्वारा
    May 26, 2012

    आनंद जी, जून माह में अठ्ठारह दिन बीत जाने दीजिये, फिर सोनी में सब कुछ दिखेगा……:-)

akraktale के द्वारा
May 21, 2012

प्रिय आनंद जी नमस्कार, सुन्दर रचना. कभी कभी विशाल सूर्य भी छोटे से बादल के पीछे छुप जाता है मगर कितनी देर के लिए बस वैसा ही प्रयास धुंए का भी है. मगर हम जानते हैं की सत्यता तो कुछ और ही है. बधाई.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    बिलकुल सही कथन आपका सर…………………आपको प्रयाश अच्छा लगा यह मेरे लिए गर्व की बात है आपने सदेव मेरा नैतिक बल बढाया है और मार्गदर्शन भी किया है………….आपको आगे भी अपने प्रिय का मार्गदर्शन करते रहना है

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 21, 2012

प्रिय आनन्द पर्वत जी ….. सप्रेम नमस्कारम ! ये पग धड़ा (धरा )ही था, लक्ष्य पर ध्यान के साथ साथ खुद को मिटा + मिला देना भी है उस विराट में बहुत मन को भायी आपकी यह ‘नन्ही सी कविता” मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    गुरुदेव ने जैसे ही मेरे ब्लॉग पर पग धरा सब सही हो चला ………….आभार आपका नन्ही सी कोशिश कामयाब रही इससे बेहतर क्या हो सकता है …………. आपकी मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट ना आ पाने से मन दुखी था ……..आभार जे जे का जिन्होंने आपकी समस्या का निदान किया

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 21, 2012

अच्छी कविता,प्रिय आनंद जी. आखरी ये शब्द तू, एक बार जान लो, महान बनना है, यदि, तो लक्ष्य पे ही जान दो सुन्दर पंक्तियाँ.यदि ‘लक्ष्य पे ही ध्यान दो’ हो जाये तो क्या कहने.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    अवश्य सर लक्ष्य पर ध्यान दिया जाना ही चाहिए ………..जान तो धुंए ने दिया जिससे की इतिहास बना आपके आशीर्वाद से ही आगे भी सार्थक परिणाम देता रहूंगा

आर.एन. शाही के द्वारा
May 21, 2012

बहुत सारे अर्थ छुपाती, और बहुत सारे अर्थ बयान करती कविता आनंद जी . बधाई.

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 21, 2012

    प्रिय आनंद जी, मेरा भी यही कहना है ! मित्र के प्रति आपकी यह उच्चतम भावना बहुत अच्छी लगी ! शुभकामनाएं !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    आपका हाथ सर पर बना रहे फिर ऐसी कविताओं को अवस्य लिखता रहूंगा

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    आभार सर………….किन्तु मित्र के प्रति …………लगता है गलत टायप हो गया है

मनु (tosi) के द्वारा
May 21, 2012

आदरणीय आनन्द जी सादर ! रचना बेहद बढ़िया है ,बस कहीं -कहीं थोड़ी सी मात्राओं कि कमियाँ खलती है … डर रही हूँ कहीं आप इसे अनयथा न ले लें  और बुरा न मान जाएँ पर… मैंने कह ही दिया

    Rajkamal Sharma के द्वारा
    May 21, 2012

    आप तो जागरण परिवार की पोती है आपको नहीं डरना चाहिए बल्कि हमे आपसे डर लगता है (अखबार में छपने के लिए अग्रिम शुभकामनाये जिद्दी और जनूनी बच्ची को ) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    अपनों से इतना किस बात का डर……………गलतिओं को इंगित करना आपका धर्म है गुरुदेव की बातों को गलत ना लीजिएगा

krishnashri के द्वारा
May 21, 2012

प्रिय आन्नद जी , सादर , सुन्दर भावों को अच्छे शब्दों में आपने बांधा है . आपसे ऐसी ही आशा हमेशा रहती है . अब पीछे मुड कर मत देखिएगा . मेरी शुभकामना .

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 21, 2012

    बिलकुल उचित मशवरा !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    कोशिश हमेसा सार्थकता की ही रहती है सर………….विवाद से मन विचलित होने लगता है आपकी आशाओं पर और खुद की आशाओं पर पूरा उतर सकूँ बस यही कामना है………..

minujha के द्वारा
May 21, 2012

आनंद जी इसी तरह के संदेशों की अपेक्षा आपकी रचनाओं से हमेशा होती है,अच्छा लिखा है…आगे भी इसे बरकरार रखें.बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    बस दीदी इसी चीजों का प्रयाश रहेगा ……..

Santosh Kumar के द्वारा
May 21, 2012

आनंद भाई ,.सप्रेम नमस्कार एक से बढ़कर एक प्रेरक रचनाएँ देकर आप धुंवे को मजिल दिलाकर ही रहेंगे ,..सादर आभार

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    बस आपका साथ रहे तभी यह मुमकिन है संतोष भाई

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 21, 2012

महान बनना है, यदि, तो लक्ष्य पे ही ध्यान दो, बढ़िया सन्देश , बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    बस आपका आशीर्वाद रहा तो लक्ष्य से कभी नहीं भटकेंगे

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 21, 2012

वाह..प्रवीन भाई. आपने तो धुआं -धुआं कर दिया. लगता है बुढवा की मौगी झालुआ रिक्शा वाले के साथ भाग गई उसका मलाल आपको हो गया है . कोई बात नहीं…. दूसरी ढूँढिये. इस बार लक्ष्य से नहीं भटकियेगा. इतिहास बना के ही रहना है.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    अरे झलुआ के पीछे तो दारोगा जी को लगा रखा है वो बात अलग है की उन्होंने रिक्सा वाला से भी रिश्वत खा ली है………….इतिहास तो बनाना ही है …………..हमें आपको सबको मिल कर आप जैसे अग्रज को पा कृतार्थ हूँ

चन्दन राय के द्वारा
May 21, 2012

मित्र , देखो है उठ रहा धुआँ, पुन: गगन की चाह में, ये सोच के उठा है कि, इतिहास वो बनाएगा, भटके लोगो को राह दिखाती सुन्दर रचना , बहुत सुन्दर भाव प्रयास तो कई हुए, मुझे जीतने के वास्ते, मगर अभी तलक नहीं, बनाय मैंने रास्ते,

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    धन्यवाद मित्र …….सराहने के लिए

May 21, 2012

महान बनना है, यदि, तो लक्ष्य पे ही जान दो, स्वार्थ व अहम् लिए यह भाव तेरा, तू जान लो. आखिर कैसा तेरा लक्ष्य और कौन सी है आरजू, तेरी मंजिल में तेरे स्वार्थ व सम्मान की है जुस्तजू. फिर बात तेरे लक्ष्य की, सच कैसे कोई मान ले, यह तेरी बात है बस बातों की तू इसे पहचान ले.;;;!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    धन्यवाद


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