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"तू अहंकार को त्याग ज़रा"

Posted On: 17 May, 2012 Others,मेट्रो लाइफ में

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शून्य वेग से शुरू हुआ था, चलते – चलते गति मिली,
रोष – कोप कुछ नहीं भरा था, जीवन में सदगति मिली,
किंतु जो आगे तू निकला, तुने सच को त्याग दिया,
अपने अंदर की ज्वाला को, व्यर्थ यहाँ बर्बाद किया,
मर्यादा की भाषा से ही, जीवन-पथ में उत्थान मिला,
उचित कर्म करने का देखो, तुझको इक वरदान मिला,
अपने अंदर मंथन कर – कर, सोच ज़रा तू कैसा है,
तू अहंकार को त्याग ज़रा फिर देख धरातल कैसा है(१)

…………..

भटक रहा है ध्यान तेरा, और तू गफलत में जीता है,
नशा नहीं आती जिसमें, वैसी मदिरा क्यों पीता है,
यह सोचो कर्म बड़ा है या, केवल तर्कों पर जीना है,
अपने लोगों से ही लड़, क्या क्रोधभाव रस पीना है,
बड़ी – बड़ी बातें करने से, नहीं कोई बनता है बड़ा,
हाँ पर छोटी बात जो कहते, वो होते हैं नीच ज़रा,
बड़े का न आदर करना, बिलकुल गाली के जैसा है,
तू अहंकार को त्याग ज़रा फिर देख धरातल कैसा है(२)

…………….

उठो चलो उदेश्य पर लौटो, जो तुमने कल ठाना था,
कलम उठाओ फिर वो जिसका, लोहा सबने माना था,
धर्म वही जो लड़ना जाने, किंतु कुछ मर्यादा तक,
छोड़ दिया तुमने लिखना, तोड़ दिया क्यों वादा तक,
ज़रा सा सीखो झुकना क्युकी, अकड़ नहीं शोभा देती,
व्यर्थ अकड़ ही तो जीवन में, मौलिकता को हर लेती,
याद रहे कुछ न बदला, तू जैसा था तू वैसा है,
तू अहंकार को त्याग ज़रा फिर देख धरातल कैसा है(३)

नकारात्मक प्रतिक्रया निषेध ……आग्रह…….सिर्फ मेरी एक रचना कोई विशेष अर्थ ना निकालें

सिर्फ लेखनी को पढ़ें और उपयुक्त आशीर्वाद सह प्यार दें

आनंद  प्रवीन

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 17, 2012

बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति…

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 21, 2012

प्रवीन भाई, यह आप स्वयं को ही समझा रहे हैं न…. खैर जो भी है…..कविता बहुत सुन्दर है. सुन्दर भाव. बधाई

Santosh Kumar के द्वारा
May 19, 2012

प्रिय आनंद भाई ,.सादर नमस्कार आपके सुन्दर भाव और लेखनी को नमन ,..सादर आभार

sinsera के द्वारा
May 19, 2012

आनंद जी, सप्रेम नमस्कार, बात को समझ कर उचित निर्णय लेने की और बहुत ही शानदार कविता लिखने की बधाई..

minujha के द्वारा
May 18, 2012

आनंद जी इस तरह के वाद   विवाद में मैं नही पङती  ये तो आप समझते होंगे  आपके पोस्ट पर आने के बाद  मुझे पता चला कि ये  भी वाद  विवादहै  किसी और का होता तो मै वापस चली जाती ,पर आपको सुझाव जरूर देना चाहुंगी कि ये उठा पटक छोङिए  और सार्थक लेखन की ओर ध्यान लगाईये जिसके लिए इस मंच पर आए है……….

    dineshaastik के द्वारा
    May 20, 2012

    मीनू जी के विचारों से मैं भी सहमत….

चन्दन राय के द्वारा
May 18, 2012

मित्र , में तो पुराना गीत गाऊँगा , गोरो की ना कालो की , ये दुनिया है दिलवालों की , ना सोना ना चाँदी बांटे जो सबको प्यार ऐसे दिल वालो की

mparveen के द्वारा
May 18, 2012

आनंद जी आपने बहुत सुंदर सन्देश दिया अपनी कविता के माध्यम से …. बस अब बहुत हुआ लेखनी लिखो लेकिन किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं ..क्यूंकि ये वाद विवाद को बढ़ावा देता है …. ये सभी ब्लोग्गर से अनुरोध है कृपया कोई भी व्यक्तिगत रूप में ना ले इसे … विचारो की लड़ाई तो ठीक है लेकिन जब वो व्यक्ति विशेष पर आ जाये तो फिर विवाद बढ़ते हैं एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगते हैं अभद्र भाषा का प्रयोग भी दिखाई दे जाता है कहीं कहीं पर जो किसी भी व्यक्ति को शोभा नहीं देता है …. इस कविता में भी सिर्फ एक सन्देश दिया गया है तो कृपया इसे सिर्फ एक रचना समझ कर ही ले न की २ दोस्तों की झड़प चाहे वो विचारों की ही क्यूँ ना हो … धन्यवाद..

nishamittal के द्वारा
May 18, 2012

आनंद जी आपकी रचना सन्देश दे रही है,एक सार्थक सन्देश .हम तो आपको बधाई दे सकते हैं.पर अच्छा लगा मन में विचार आये और रचना तैयार सच में हो गया चमत्कार

akraktale के द्वारा
May 18, 2012

प्रिय आनंद जी, भटक रहा है ध्यान तेरा, और तू गफलत में जीता है, नशा नहीं आती जिसमें, वैसी मदिरा क्यों पीता है, दोस्त के प्रति एक बेंत सा प्रहार करती सुन्दर रचना, सच्ची मित्रता को प्रदर्शित कर रही है. और मुझे तो रचना की ये दो पंक्तियाँ भी भली लगीं. बधाई. दोनों में मित्रता और प्रगाढ़ हो. शुभकामनाएं.

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 20, 2012

    मान्यवर आनंद जी, सादर ! आदरणीय अशोक जी की बातों से सम्पूर्ण सहमति ! मित्र का कर्तव्य है मित्र को सही राह दिखाना ! शुभकामनाये !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 18, 2012

होले होले प्यार को जगाना है नादाँ हैं है आगे सुधर जाना है पचीसवाँ शतक तो लगाया है बहुत आगे तुन्हें जाना है बर्बाद न करो समय यूँ ही न समझे वो जमाना है लाखों गम है दुनिया के गरल पी के मुस्कराना है बधाई.

jlsingh के द्वारा
May 17, 2012

लघुता से प्रभुता बड़ी प्रभुता से प्रभु दूरी चीटी शक्कर ले चली हाथी के सर धूरी. यह नकारात्मक तो नहीं है मेरी समझ से!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 17, 2012

    आपकी लिखी कोई बात नकारात्मक हो भी नहीं सकती सर ………यह आग्रह केवल वाद-विवाद में पड़ने वालों को इससे रोकने के लिए था और कुछ नहीं ……….वैसे आपके इस दोहे का अर्थ और इशारा दोनों समझ नहीं पा रहा हूँ ………

    vikramjitsingh के द्वारा
    May 19, 2012

    आदरणीय जवाहर जी….सादर… प्रिय आनंद जी गूढ़ हिंदी नहीं समझ पा रहे हैं…इनको सरल हिंदी में समझाइये…. आनंद जी…..इशारों को अगर समझो….राज़ को राज़ रहने दो….. सुन्दर साकारात्मक रचना की हमारी तरफ से बधाई आपको…..


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