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"गेलऊ हमर मौगी भाग"

Posted On: 13 May, 2012 Others में

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The_Milkmaid_miniature_painting

एना – ओना केना – केना करब अब कौन उपाय,
बुढौती में शादी कैली छोड़ देलऊ देखहिं माय,

एना सुन्दर छौरी चुनली खुशी अपन की बतलाऊ,
गेलव छोड़ देख गे मईया अब केकरा पीड़ा दिखलाऊ,
पुताहू केकरा कहबे अब पोता कैसे होतऊ गे,
रात होवे पे हेगे मईया जड़े कोन सोतऊ गे,
देखहिं न गे हमें त रह गेलियऊ बिन साबुन झाग,
“गेलऊ हमर मौगी भाग”………………..१
…………..
रिक्शा वाला झलुआ पर त शक हमरा पहले से रहलऊ,
गर्मी के ऊ ढाल बनाइके बौडी अपन खूब दिखलऊ,
एहे खातिर कहत रहली गेट तनिक बरका लगवाव,
ओहो में तू दुइगो ताला डाल भीतर से बंद कराव,
अस्सी बरस उमर भेलऊ तहियो तोरा कुछो न अइलऊ,
ऊ कल के छौरी तोराके देखली कैसे ठेंगा दिखैलऊ,
मिले खाली झलुआ हमरा देबऊ ओकरा गोली दाग,
“गेलऊ हमर मौगी भाग”………………..२
………….
अब सोची की बप्पा-पितिया के इज्जत के की गे रहतऊ,
जेकरा मन करतऊ उही हम्मर सब के नाम पे हंसतऊ,
कित्ता जतन कैली तब त जा के हमरा हाँथ इ अलऊ ,
मगर ससुरा झलुआ ता इज्जत के है वाट लगलऊ,
जावाईछियौ थाना अब दरोगवा कुछो बुद्धि देतऊ,
मगर मईया ऊ ससुरा भी दाम खूब एकरा के लेतऊ,
कहब पूरा बात मगर पहले देबऊ एगो पान – पराग,
“गेलऊ हमर मौगी भाग”………………..३

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65 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

div81 के द्वारा
May 20, 2012

देरी से प्रतिक्रिया के लिए क्षमा चाहूंगी ………………… मगर देरी का कारण भी बता देती हूँ पहले पढ़ी तो सर के ऊपर से गयी, फिर सब प्रतिक्रियाओं को पढ़ने के बाद थोडा सा समझ आया उसी समझ से फिर से पढ़ी अब अच्छे से समझ आई इस लिय अब प्रतिक्रिया दे रही हूँ :) बहुत ही मजेदार रचना आप कि पढ़ के अब सच मजा आया….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    आपने देर से प्रतिक्रया दी हम देर से जवाब दे रहें है…………हिसाब बराबर समझ में आया यही सुन ख़ुशी हुई क्यूंकि बाकी कविता में ज्यादा कुछ था नहीं…….हा हा झूठ में मजा कैसे आता है वो ज़रा बताइयेगा

May 15, 2012

pawansrivastava के द्वारा May 15, 2012 I am taken aback seeing people of extraordinary wits & dignity bestowing respect to a man who is not sparing even girl of his daughter’s age from his debolious and mean act . Such a dilemma that a man ravage the modesty of a woman openly in JJ forum and all mere be the spectator. Who will call spade a spade ? मुझे हैरानी भी हो रही है और क्षोभ भी की एक आदमी ओछेपन की हर हदें पार कर रहा है,अपने बेटी के उम्र की लड़की की स्मिता पे चोट दर चोट कर रहा है और तो और मेरा नाम भी जोड़ रहा है एक ऐसी लड़की के साथ जो मेरी छोटी बहन सरीखी है …. और लोग चुप हैं …..ऐसे इन्सान को इज्ज़त नवाज रहे हैं …अब बताइए अपने आलेख और कविताओं के ज़रिये कोई अगर नारी के हक और हुकुक की बात करता है तो उसपे कैसे यकीं किया जाये ..कैसे यकीन किया जाये उसकी कथनी और करनी में भेद नहीं है संभवतः मेरे इस coment को यह महाशय डिलीट कर देंगे ….अगर यह साहब ऐसा करें तो मेरे दोस्तों से मेरी अपील है कि कृपया मेरे इस कमेन्ट को कट पेस्ट कर पुनः यहाँ छाप दें ताकि सच दबाया न जा सके … मैं यह भी देखना चाहूँगा की इस पोस्ट पे कौन क्या कमेन्ट करता है …और फिर उन लोगों से मुत्तालिक अपनी एक राय बनाऊंगा ….जो पत्थर पे लिखे इबारत की तरह हमेशा मेरे साथ रहेगी . Go through following site at related blog…. http://rajkamal.jagranjunction.com/2012/05/15/%E2%80%9C%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%8B/

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा की ये क्या कर रहे हो ……अब तुम्हे नहीं लगता की अति होता जा रहा है …….लेखनी पर ध्यान देने की अव्य्सक्ता है दोस्त ……….अब छोड़ो इन सब लड़ाई झगड़ों को और कलम उठाओ अच्छे मुद्दे के लिए……….किसने क्या कहा किसने क्या सूना यह तुहारा ध्ये नहीं ………..सोचो की क्या यही करना है

    May 16, 2012

    भाई जी, हमें लेखक नहीं बनना है, आपको बनना है बनिए और अपनी कलम पर ध्यान दीजिये…..हम सिर्फ दोस्ती निभाते हैं चाहे तुम्हारे साथ हो या संदीप के साथ…..और दुश्मनी भी परन्तु वह भी सिर्फ दोस्तों के साथ किसी और के साथ नहीं…….मेरे बारे में कौन क्या समझता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है….लगता है माँ की ममता ने तुम्हें कुछ ज्यादा ही बिगड़ दिया है दिमागी रूप से कमजोर हो गए हो….पटना क्यों नहीं चले जाते अरे तुम्हारे यहाँ से नजदीक है……यदि सचमुच एल लायक बेटे हो तो अपना फोन नंबर मुझे इ-मेल कर फिर तुम्हें बताता हूँ. और यदि रिचार्ज करने के लिए जेब में पैसा नहीं है तो बोल मैं रिचार्ज करवाता हूँ….!

May 15, 2012

मुबारक हो……………….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    धन्यवाद मित्र ……..

krishnashri के द्वारा
May 15, 2012

प्रिय आन्नद जी , सस्नेह ,आंचलिक मिटटी की सोंधी गंध लिए आपकी पंक्तियाँ दिल को छू गई . आपके लेखन को इस नए कलेवर में देख कर प्रसन्नता हुई , मेरी शुभकामना .

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    आदरणीय सर आपने रचना को पढ़ा और आपको अच्छा लगा यह मेरे लिए हर्ष की बात है ……..आशीर्वाद बनाय रखें

yamunapathak के द्वारा
May 15, 2012

आनंदजी,भाषा की मिठास और माटी की खुशबु दोनों बहुत भली लगी. शुक्रिया

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    आदरणीय यमुना जी रचना ने आपका मनोरंजन किया जान अत्यंत ख़ुशी हुई

akraktale के द्वारा
May 14, 2012

प्रिय आनंद जी नमस्कार, सब कह रहे हैं बहुत अच्छी मस्ती भरी रचना है तो मै भी मान लेता हूँ फागुन आ गया. मगर हकीकत ऐसी है की जब दूसरा शब्द पढता हूँ तो पहला शब्द क्या पढ़ा था वही याद नहीं रहता अर्थ तो तब पूछूं की जब शब्द ही याद हो.किन्तु जितना भी पढ़ा मन को बहुत अच्छा लगा. बधाई.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    निश्चय ही सर आपको पढने में काफी कठनाई हुई होगी………….फिर भी अन्त्वागात्वा आपने रचना पढ़ा और इस कॉमिक रचना पर आनंद लिया बस और क्या चाहिए

sinsera के द्वारा
May 14, 2012

ऐ हो बबुआ, मौगी भगलस बुढवा के, .. गयिली रेस्कावाल के तने, …तहरा के कवन परेसानी बा……

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    का करी दीदी सामाजिक प्राणी हती बुढवा के दुःख न देखल गइल ओहे खातिर थाना में रिपोर्ट करे गेल रहली ता इ रचना सब के सूना डेली………….उ रिक्शावाला झलुआ बरा badmaash हाउ कहीं दिखे ता कहम ओकरा पर इनाम रखे के सोच रहली हा

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 14, 2012

आनंद प्रवीण जी- सादर, भाई भोजपुरी कविता की प्रस्तुति से मंच पर छा गए हो………………….. बधाई……………………………….. रिक्शा वाला झलुआ पर त शक हमरा पहले से रहलऊ, गर्मी के ऊ ढाल बनाइके बौडी अपन खूब दिखलऊ, एहे खातिर कहत रहली गेट तनिक बरका लगवाव, ओहो में तू दुइगो ताला डाल भीतर से बंद कराव, अस्सी बरस उमर भेलऊ तहियो तोरा कुछो न अइलऊ, ऊ कल के छौरी तोराके देखली कैसे ठेंगा दिखैलऊ, मिले खाली झलुआ हमरा देबऊ ओकरा गोली दाग, “गेलऊ हमर मौगी भाग”………………..२

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    बस हनीफ भाई कोशिश की थोड़ी सी आपसबों को पसंद आई और क्या चाहिए ………….प्यार बना रहे

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    May 16, 2012

    ये भोजपूरी नहीं बज्जिका है .अंकुर जी

minujha के द्वारा
May 14, 2012

आनंद भईया मस्ती का ये अंदाज  बहुत भाया ,पर भगवान ना करे कभी किसी को इस समस्या से दो चार होना पङे,,,,वैसे आपकी कविता में हास्य  विनोद तो समझ  में आया ,पर वो दर्द कहां से ले आए आप सबकुछ  ठीक तो है ना…….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    जी दीदी सब ठीक ही है…….मौगी भागने के लिए उसका होना भी बहुत जरुरी है……….आप शंका न करें……..हा हा बिहारी ठेठ कॉमेडी पेश की थी बुढाऊ की बीवी भाग गई इसमें बेचारे के दुःख को समझना होगा आप शायद समझ रही हैं ………..चलिए रचना पसंद आई और क्या चाहिए रिक्शा वाला झलुआ कहीं मिले तो दरोगा राजकमल जी को तुरंत इक्त्लाह करें

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 14, 2012

हा हा हा हा …. आनद जी आपका चलो पहली बार हास्य और मस्ती से भरा रचना पढने को मिली … ये मगही में लिखी है न ..उसी जैसी लगी मुझे .. आनंद ही आनंद … :) :) देख के तेरा नया ढंग बहुत के उड़ गए रंग ..::) :) बधाई आपको

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    May 15, 2012

    जन्म दिवस की ढेरो शुभकामनाएं आनंद जी … खूब अच्छा लिखे . आगे बढे … अब मुद्दे के बात …… पार्टी कहाँ दे रहे है ….: :)

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    चलिए कुछ रंग उड़ाने के काम हम भी आये अब उजाला सफेदी जरुर आएगी…………..हा हा यह शुद्ध बिहारी कोकटेल है जिसमें मुंगेरिया + मगही वो भी जो वैशाली + मुजफ्फरपुर में बोली जाती है का मिश्रण है……..उसमें भी आम जन की नहीं गाँव में ठेठी में बोली जाने वाली ………बहुत कंफुसन है क्यूंकि मुझे भी इस भाषा का ज्यादा ज्ञान नहीं फिरभी कुर्फाती कोशिश सफल हुई लगती है ……………आपका धन्यवाद जन्मदिन के लिए ………पार्टी बाकी रही………..वैसे जब भी मीठा खाइएगा सोचियेगा मैंने ही दी है…………..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    May 16, 2012

    बज्जिका कहते है इस भाषा को नीचे मैंने अंगिका लिखा वो शायद भागलपुर वाले बोलते है …

alkargupta1 के द्वारा
May 14, 2012

आनंद प्रवीण जी , भरसक प्रयत्न करने के बाद भी भाव कुछ समझ नहीं आया आपकी ये रचना मेरे सिर से ऊपर चली गयी…..अतः प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हूँ……

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    अलका मैम मुझे खेद है निश्चय ही आपको समझने में काफी तकलीफ हुई होगी………….यह बिलकुल ठेठ भाषा है

May 14, 2012

भाई, मेरा प्रणाम स्वीकार करो. इतनी मजेदार रचना मैंने जागरण पर आजतक नहीं पढ़ी. जिस भाषा का आपने उपयोग किया है मैं वो बोलता तो नहीं पर बिहार का ही हूँ अतः अच्छी तरह से समझ जरूर रहा हूँ. खास तौर से ये लाइन तो बहुत मजेदार है… रिक्शा वाला झलुआ पर त शक हमरा पहले से रहलऊ, गर्मी के ऊ ढाल बनाइके बौडी अपन खूब दिखलऊ,

    May 14, 2012

    आsss एगोsssssssss बात आउर, ई बुढ़ारी में बियाह करबे ता एही होतउ, तोरा पहिलहीं समझैलुक हल, बाकि तू न मनले….ले भोग….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    मित्र बोलते तो हमभी शुद्ध हिंदी ही हैं पर कभी – कभी बस यूँही शैतानी करने की सूझ जाती है ………………………………अरे बुढ़ारी में शादी के मजा ही कुछो और होवेला ………….का करी मौगी सही नइखे मिलल और उ भाग गेलक उहो रिक्शा वाला के गड़े अब टी भोगे के परवे करी………..बड़ा तकलीफ में हती भाई

yogi sarswat के द्वारा
May 14, 2012

भाई आनंद प्रवीण जी , मुझे ये भाषा समझ ही नहीं आती तो कैसे पढूं और क्या कहूं ?

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    बस योगेन सर थोड़ा ध्यान दीजिये और निचे संतोष भाई का कमेन्ट में मेरा कमेन्ट पढ़िए थोड़ा समझ आ जाएगा

rekhafbd के द्वारा
May 14, 2012

आनंद जी ,एक बार इसे हिंदी में भी लिख दे ,ताकि हम भी इसका आनंद ले सकें |धन्यवाद

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    कोशिश करूंगा रेखा जी………….किन्तु ज्यादा मनोरंगाक नहीं हिंदी में साधारण ही लगेगी………..

आर.एन. शाही के द्वारा
May 14, 2012

हम सब समझ गेलिये तोहर खेला बउवा, केकरो समझावे न परत. तू पहिले रिक्शा बला से मिलीभगत कर के बाबा के मउगी भगा देले, आ हियाँ आके बोकराती बतियावे छै. चुपचाप बुढ़ा के अमानत ओकरा लौटावे के व्यवस्था कर न त रिक्शा बला के संगे-संगे राजकमल दरोगावा तोरो भित्तर कर देतऊ.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    परम आदरणीय शाही सर, सादर प्रणाम रउरा ता अन्तर्यामी हती हम जानत रहली रा ………बाकी भगवान् कसम खायिछी बुड़वा के मौगी के बगावे में हमरा कोनो हाथ नइखे ……………और उ झलुआ से कोनो परिचय नइखे बा कहला की उ पियकरा है न ………………दरोगा बाबु ता अपने आदमी हलन हुनका से का खौफ खाई……………….रउरा डीजीपी ता हिये हती जियादा तकलीफ होवत ता हुनका के तबादला कर देबे के है और का ………….आशीर्वाद बनल रहे

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 14, 2012

yah kya bhai , aap ko to lagta hai aanchlik bhasha me bhee maharth hasil hai | badhai !! mangru ke maugee gelai bhag ! aur lagailkai kul me daag !…..vah…vah ….vah!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    छोटी सी कोशिश सर कुछ अलग लिखने की आपने पसंद किया ख़ुशी हुई

nishamittal के द्वारा
May 14, 2012

आनन्द जी प्रतिक्रिया कैसे दूं जब भाषा बोली से अनभिज्ञ हूँ.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    क्षमा चाहूँगा निशा मैम ठेठ देहाती भाषा उसपर भी ख़ास क्षेत्रों का मिश्रण निश्चय ही आपको कठिनाई हुई होगी …………निचे संतोष भाई के कमेन्ट में थोड़ा सा अर्थ लिखा है देखिएगा

jlsingh के द्वारा
May 14, 2012

बिलकुल नया अंदाज! फणीश्वर नाथ रेणु की याद गाँव की झलक और सोंधी मिट्टी की महक ! शशि जी भी सकुचाते हैं कुशवाहा जी देख मूंछों में मुस्कुराते है! वाह मेरे शेर, अभिमन्यु, अर्जुन, कर्ण इस गर्मी में पूर्वी हवा का शीतल स्पर्श! एना – ओना केना – केना करब अब कौन उपाय, बुढौती में शादी कैली छोड़ देलऊ देखहिं माय, हा.. हा ….हा… ठहाका!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    बस सर गर्मी ज्यादा लग रही थी आपके आलेख में इसलिए खाली पानी से काम नहीं बना …….इसलिय ठेठ गाँव की शीतल मिटटी ले कर आया हूँ …………..आपसबों को मजा आया ख़ुशी हुई………..वैसे ज्यादातर को समझ में नहीं आई ………..बिहार के लोगों को समझ में आ रही होगी बाहर वालों को थोड़ी परेसानी हो रही होगी

shashibhushan1959 के द्वारा
May 13, 2012

मान्यवर आनंद जी, सादर ! समझे में थोड़ा देर भइल लेकिन समझ में आ गइल ! ठेठ गाँव के ठेठ लोग के ठेठ स्वभाव के ठेठ वर्णन ! वा……….ह……………………!!!! मजा आ गइल ! कोल्ड ड्रिंक नहाइए …… चिप्स फूलिए …….! शुभकामना ही शुभकामना !!!! आनंद दायक रचना !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    इस गर्मी में सर कोल्ड्रिंक मिल जाय और क्या चाहिय ………….एक छोटी सी शरारत करने की कोशिश की आपसबों को पसंद आई और क्या कहूँ ………बस स्नेह और प्यार बनाय रखें

Santosh Kumar के द्वारा
May 13, 2012

आनंद भाई ,.सप्रेम नमस्कार भाई आपकी रचना समझ नहीं सका ..फिर भी बहुत बधाई

    dineshaastik के द्वारा
    May 14, 2012

    भाई आनन्द जी, मैं भी संतोष भाई की तरह, क्षेत्रीय  भाषा की अनभिज्ञता के कारण , कविता का भावार्थ  समझने में असमर्थ  रहा। फिर भी आपको बधाई  प्रेषित  कर रहा हूँ।

    Santosh Kumar के द्वारा
    May 14, 2012

    वैसे प्रयास करने और गुरुजनों की प्रतिक्रिया से लगता है कि आप..” क्या करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया “..का क्षेत्रीय संस्करण लाये हैं ,पूरी रचना का न सही शीर्षक का अनुवाद अपेक्षित है ,.. .पुनः बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाये

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 14, 2012

    संतोष भाई सादर प्रणाम बस थोड़ा मस्ती करने की इक्षा हुई और कुछ कुराफाती कर डाला अर्थ बताने का तो बहुत लंबा हो जाएगा बस संक्षेप में बस यही कहूंगा की कविता का शीर्षक का अर्थ था एक बुढा व्यक्ति जो अपनी माँ से कह रहा है की उसकी बीवी(ठेठ में कहें तो मौगी) उसको छोड़ कर रिक्सा वाले के साथ भाग गई ………..और उसका पता लगाने के लिए गुरुदेव दारोगा राजकमल जी को सूचित किया गया है ……..किन्तु ज्ञात सूत्रों से पता चला है की वो भ्रष्टाचार में लिप्त हो चले हैं आपसे निवेदन है की उनके खिलाफ भी लोकपाल बने के उपरांत उचित कारवाई की जाए ……….आभार

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 14, 2012

    दिनेश सर निश्चय ही आपके लिए काफी कठिन है इसे समझना क्यूंकि बहुत टेढा है समझने को क्षमा चाहूंगा थोड़ा सा समझाने का प्रयाश किया है निचे देख लीजिएगा

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 13, 2012

priy aanand , sasneh naya rang, naya kalevar naya dhang ise dekh kar ham rah gaye dang badhai/ 16 may ko post dalne ka muhurt nikal raha hai. baaki bhagvan jane/

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 14, 2012

    आ हा हा हा सर आखिर आपका भी अर्ध शतक लग ही जाएगा आपके दिमाग को चकरा सका इसके लिए दुःख से ज्यादा ख़ुशी हो रही है पता नहीं क्यूँ

May 13, 2012

अच्छा यह बता कौन सी भाषा है….यह…..!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    यह मुंगेरिया + वैशाली की ठेठ भाषा है……….समान्यतः इतने बुरे ढंग से नहीं कही जाती

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    May 16, 2012

    इस भाषा को अंगिका बोलते है मेरे बंधुओ …. जो मैथली और बंगला के करीब मानी जाती है

May 13, 2012

तुम्हारी परेशानी देख रहा हूँ दिन पर दिन बढ़त ही जा रही हैं…..इलाज करना जरुरी है….माँ का contact नंबर तुझसे माँगा था अभी तक तुने दिया नहीं…चल जल्दी दे ताकि तुम्हारा इलाज शुरू करू…आखिर दुश्मनों से उम्मीद ही क्या की जा सकती है.

    jlsingh के द्वारा
    May 14, 2012

    एक दुश्मन, जो दोस्तों से भी प्यारा है!…..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 14, 2012

    का करी हो अनिल बाबू तुई हमर दुःख पर नमक काहे छिरक रहला हो …………हाय लग जाई तोहरा के बुढवा के दुश्मनी कर के कुछ करियो लेबो की

    May 14, 2012

    अब केतना हाय मिली हमके……ए समय जेवण दर्द से गुजरातानी ओकरा आगे टी हर हाय बेकार बाते…….हाँ अगर हाय दिहल चाहतर त, इतना दे द कि इ दुनिया से हम उठ जाई…..बहुत बोड़ एहसान रही हमरा पर तोहार…..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    जले तू आचरण ना सुधारवे हम तोहरा के हेगियाते रहबु…………बच सकत हो तो बचो अ हे ज्यादा नौटंकी न बतियाबा हमरा से…………न ता गर्दनिया दे देम समझ्ला हो

चन्दन राय के द्वारा
May 13, 2012

मित्र , पढने के साथ साथ , समझने में भी कठिनाई हुई , पर यह मेरी खामी है , जबकि बिहार मेरा जन्म स्थल है आपकी रचना की महक बहुत भीनी दिल को छु रही है , ये ठेठ देसी अंदाज , वाह ! वाह ! वाह ! वाह ! वाह ! वाह ! वाह !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 14, 2012

    मित्र थोड़ा ज्यादा ही ठेठ होने के कारण समझने में कठिनाई हुई होगी बस छोटी सी कुराफाती कोशिश आपने पसंद किया अच्छा लगा

follyofawiseman के द्वारा
May 13, 2012

‘पुरबा बहिया, मच्छर कटिया, कनिया मोन परिया…….’ प्रवीण जी सुंदर रचना अछि…मजा आबि गेल….(you have written good, I enjoyed it….)

    jlsingh के द्वारा
    May 14, 2012

    आज प्रिय wiseman (संदीप जी) के निर्मल मन को समझ सका … मैथिली, मुंगेरी, भागलपुरी, और मगही के मिश्रित रंग रूप और ठेठ बिहारी अंदाज को भी भांप सका .. ढाई किलो सत्तू वापस मिल गया! अब गर्मी में घोर घोर पिऊंगा या मुठरी बनाकर गमछा पर रखकर खाऊंगा! ऐसे ही मंच आबाद रहे यहाँ या इलाहाबाद रहें! मेरे सभी बिछुड़े साथियों! वापस आ जा! आ जा! अनिल जी, पवन बने! संदीप के सितार बजे, और साधना हो पूरी ! विक्रम के साथ जीत मिले यही है जरूरी! ….आ …. अब लौट चलें!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 14, 2012

    धन्यवाद संदीप जी ह्रदय से आभार

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 13, 2012

प्रवीण बाबू, बुढौती में विआह करब त इहे होई. अब आपन माथा पीट …… आपका यह शुद्ध , खाँटी देशी अंदाज़ पसंद आया. शानदार, मज़ेदार. गुदगुदी मचाने वाला बधाई….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 14, 2012

    का करी हो भाई हमर माई न मानलक अब भोग रहली हां …………दरोगा राजबाबू से कुछो आशा लागल बा बाकी उ एगो पान – प्राग में नइखे मानेवाला दरोगा हाउ …………बाकी तो रौअर आशीर्वाद ता हिये हो


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