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"जल ही जीवन है"

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कहतें है “जल ही जीवन है” अगर ऐसा कहा गया है तो इसे सिद्ध करने की आश्यकता नहीं है क्योंकि हम खाने के बिना तो शायद कुछ दिन जी भी ले मगर पानी बिना कल्पना कर ही रूह काँप उठता है I

आज कल बिहार के ज्यादातर जिलों में एक  गंभीर समस्या पैदा हो गई है ……

पानी के परत के निचे जाने की ……और यह गर्मियों में तो इतनी निचे चली जाती है की बहुत से पुराने हाँथ पम्प और कुँए बिलकुल सुख जाते है……

किंतु यह अचानक ऐसा क्यों हुआ की पिछले पांच से छः सालों में धीमें – धीमें यह समस्या गहराती ही चली जा रही है……

इसके कारणों पर अध्यन किया जाना चाहिए…..

आज बिहार सहित काफी राज्य जलवायु परिवर्तन  से परेशानी का अनुभव कर रहें है…..जिसके कारण  सबसे ज्यादा प्रभाव जल  परिसंचरण तंत्र पर ही पड़ा है….

अब सवाल यह उठता है की क्या आज  जल की इस समस्या का जिम्मेवार केवल  जलवायु को ही ठहराया जाए या अपने कर्मो पर भी एक नजर डाली जाए……..ज़रा सोचेतें है………….

आज से करीब दस साल पहले आमूमन माध्यम वर्गीय परिवारों में साधारण  बोडिंग की व्यवस्था हुआ करती थी………..कुओं पर आश्रय तो हम घटा ही रहें थे किंतु उनके स्थान पर हैंड पम्प पर ज्यादा जोड़ दे रहें थे ……….मुख्य रूप से दो प्रकार की व्यवस्था थी एक तो जिसे हम अपने भाषा में ठोका बोडिंग कहते है और दूसरी कुछ घरों में कटिंग बोडिंग ……..ये ऐसे सधारण  सूत्र थे जिनसे सभी आसानी से अपना काम कर रहें थे……

किंतु तभी जन्म हुआ एक ऐसे विकराल दैत्य तंत्र  का जिसने पृथ्वी को लगभग  एक खुली चेतावनी दे डाली की चाहे पृथ्वी जल को कितना भी निचे रखे वो उसे निकाल लेगा ……..इसे हम समरसेवुल  बोडिंग कहते है या ठेठ में कहें तो पाताल  बोडिंग ……….

मनुष्य हमेसा से स्वार्थी भी रहा है और स्थाईत्व की तलाश में भी रहा है और जब बात बिजली पानी की हो तब तो वो किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है………….

यह रोग मुख्यतः व्यपारिक स्तर से चालु हुआ  और जैसे – जैसे मनुष्य ने इसका मजा लेना आरंभ  किया उसने इसे  मुख्य धारा से जोड़ दिया ….और परिणाम स्वरूप हमें एक  ऐसे व्यवस्था का आदि होना पड़ा जो आज हमें मजबूर किये हुए है ………..

शुरू-शुरू में कुछ  घरों ने जब इसका उपयोग चालु किया तब उन्होंने पाया की वास्तव में जल की समस्या से उनको निजात मिल गई……..भले ही इसके लिए उनको मोटी रकम  चुकानी पड़ी हो ……फिर जैसे – जैसे लोगों को पूरानी व्यवस्था के साथ छोटी मोटी भी समस्या आई उन्होंने भी इसी मार्ग को पकड़ना उचित समझा …………सूरत यह बन गई की ज्यादातर घरों में हमें यही दिखने लगा ……नतीजा …….नतीजा यह की जहाँ पानी अपने सतह से थोड़ी दुरी पर थी वह इसके कारण  काफी निचे चली गई और मूल रूप से पुराने हैंड पम्प  और कुओं को इस्तेमाल करने वालों को पानी की घोर समस्या आने लगी…….व्यवहारिक  रूप से तो इसने हमें एक  स्थाईत्व दिया….. किंतु जमीनी हकीकत यह की जो लोग गरीब थे और साधारण वर्ग के थे उनको एक  जोरदार धक्का दिया गया ……

आज  समरसेवुल  बोडिंग  का कास्ट  लगभग लाख  के आस पास आ ही जाता है ………….कई मध्यम   वर्गीय परिवार तो निश्चय ही अपने स्थाईत्व के लिए यह करवा लेतें है………किंतु जो गरीब है उनके लिए इतने पैसे जुटाना आसान नहीं होता ……नतीजतन आज उन्हें मुख्य रूप से सरकारी पम्पों पर आश्रित होना पड़ रहा है …….जिनकी स्तिथि जगजाहिर है ……..

हमें आज ऐसे व्यवस्था का विरोध करना चाहिय क्यूंकि हम जिस प्रकार से इसका इस्तेमाल कर रहें है वो घातक है हम आसान सुविधा होने के कारण जल को पुरे प्रकार से बर्बाद कर रहें है ………भले ही हमें इसका इल्म ना हो और हम अनजाने में ही करते हों पर यह दुखद कार्य हमारे द्वारा ही हो रहा है …….इसके दोषी हम सब हैं ……..और हमें ही जागरूक होना होगा………याद रहे फिर से ‘जल ही जीवन है”……..और आने वाली पीढ़ी के लिए हमें इसे बचाना होगा अन्यथा निश्चय ही जल कोई महायुद्ध करवाएगा ………..जय हिंद

“एक छोटी सी कोशिश  गरीबों के द्वारा जल का दुरूपयोग करने वालो को पैगाम “

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“मेरा हिस्सा क्यों भरते  हो”

क़द्र नही करते थे देखो, अब प्यासे – प्यासे फिरते हैं,

कितने  प्राणी नित्य यहाँ, निर बिना घुट-घुट मरते हैं,

वसुधा ने तो उर में अपने, जल को देखो खूब छुपाया,

किंतु हम चालाक है इतने, हमने सीना छेद दिखाया,

अब तो देखो सरिताओं ने, भी हमसे मुख मोड़ लिया है,

छोटी – छोटी धाराओं में, खुद को देखो तोड़ लिया है,

मुद्रा जिनके पास है वो तो, अभी भी इनका सुख करते हैं,

किंतु जो लाचार पड़े हैं, निर बिना वो क्यों मरते हैं,

वो पूछ रहें जब धरा सभी का, जुल्म हमीं पे क्यों करते हो,

अपना तो सब गटक गए, फिर मेरा हिस्सा क्यों भरते  हो (१)

……………

आज मनुज के जज्बातों में, कोई वेदना नहीं है दिखती,

अपने हित के आगे उनको, मौलिक संवेदना नहीं है दिखती,

खोद – खोद जल की खातिर, पाताल के निचे पहुँच गए हैं,

भले गरीबों  के बच्चे, आकाल के मुंह तक  पहुँच गए है,

माना जल ही जीवन है, और उसी लिए तो हम मरते हैं,

किंतु इसके संरक्षण की खातिर, कहाँ कभी आहें भरते हैं,

हमें भला आजू – बाजू के, दर्द से कोई क्या है लेना,

खोदो  जितना खोद सको, माल तो केवल हमको देना,

उनमें उबाल आ रहा है देखो, ऐसे कृत्य अब  क्यों करते हो,

अपना तो सब गटक गए, फिर मेरा हिस्सा क्यों भरते  हो(२)

……………

सवाल बड़ा है क्या हम यूँही, जल को केवल  वेस्ट करेंगे,

या मेहनत कर बचा के इसको, भविष्य में थोड़ा रेस्ट  करेंगे,

सरकार भरोसे मत बैठो, सरकार तो केवल  सोने को है,

लेट  बहुत  हम पहले से हैं, नहीं टाइम अब रोने को है,

हे मानव अब स्वार्थ को त्यागो, जियो सभी को जीने दो,

जीतने में हो काम उसे लो, बाकी गरीब को तो पिने दो,

याद रहे गर अब ना सुधरे, परिणाम भयानक   आएगा,

नहीं मिलेगा जल  पिने को, मानव मानव लड़ जाएगा,

इसी लिए कर जोर हूँ कहता, भगवान से भी न क्यों डरते हो,

अपना तो सब गटक गए, फिर मेरा हिस्सा क्यों भरते  हो(३)

………..आनंद प्रवीन………..

| NEXT

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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

May 13, 2012

मुर्खता पूर्ण दोस्ती …हाँ….हाँ…..हाँ… तू हिमालय है, इसमे तो तनिक भी शक नहीं है. परन्तु लगता है तू मुझे शेर समझाने की भूल कर रहा है…मैं चूहा हूँ क्या हूँ…चूहा…और एक चूहा बेहतर जानता है कि पर्वतों में छिद्र कैसे करना है…!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    ‘चूहा है तो किस ऋषि ने तुम्हे शेर बना दिया याद रखना ………….मेरे पास भी मंतर है………..”पुनः मुस्काः” फिर बाद में न कहना की दोस्त ने ही चूहा बना डाला

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 13, 2012

आनंद जी नमस्कार , देर से आने के लिए क्षमा … बहुत ही गम्भीर जीवन के मुलभुत जरुरत पर आपने परीचर्च की है … सरिता दी ने भी बताया की युक्लिप्टस के पेड़ जलस्तर को गिरा देते है .. मुझे याद आया ..पटना में मैंने मौनिअल हक़ स्टेडियम के आगे रोड पे चारो और ये पेड़ लगे हुए है …. जो अच्छी बात नहीं है आज मुझे पता लगा … बहुत ही सटीक कविता के साथ कई विचारणीय बिंदु ..बधाई आपको

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    सही कहा आपने महिमा जी सरिता दीदी ने जो तथ्य दिए थे वो बिलकुल सही हैं…………युकिलिप्तास के पेड़ दो कारणों से ज्यादा लगाय जा रहें है एक तो शोभा और दूसरी उनसे प्लायवूड बनाई जाती है ज्यादा मात्रा में ………………….उनका इस्तेमाल कम होना ही चाहिए था………….आप पटना में रहती हैं जान ख़ुशी हुई

minujha के द्वारा
May 13, 2012

बहुत सार्थक संदेश युक्त रचना आनंद जी

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    दीदी कृपया जी ना लगाय जी नहीं लगता बस आनंद ही कहें ………आपका धन्यवाद

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 12, 2012

संदेशपरक  रचना…… हम भूल जाते हैं की जब बूंद बूंद से घड़ा भर सकता है तो खाली भी इसी तरह हो सकता है……. फिर भी हम पानी को यूं ही व्यर्थ बहाते हैं……आज ये नल से होकर नाली तक का सफर कर रहा जो पानी है…. अगर यूं ही जाया होता रहा …तो कल यही जीवन को भी इसी तरह व्यर्थ कर देगा……. यूं ही आदमी भी प्यास से व्याकुल होकर दम तोड़ने को विवश होगा…….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    बिलकुल सही कहा आपने आदरणीय पियूष भाई आपकी एक एक बात से सहमत हूँ जल को बचाने के लिए हमें ही पहल करनी होगी इसमें सरकार कुछ नहीं कर सकती आपके अर्थपूर्ण टिपण्णी की लिए आपका धन्यवाद

Sumit के द्वारा
May 12, 2012

जल ही जीवन है ,,हम सब मछली है और जल हमारे लिए जरुरी है,,,,,,,,,, सवाल बड़ा है क्या हम यूँही, जल को केवल वेस्ट करेंगे, या मेहनत कर बचा के इसको, भविष्य में थोड़ा रेस्ट करेंगे,….ये पंक्तिया सुंदर है, मगर मुझे पेट्रोल के विज्ञापन की याद दिलाती है ,,,,,,,,,,, http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/05/11/तानाशाही-मंच/

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    सुमित भाई अपने इशारा बिलकुल सही पकड़ा ……….लिखने के बाद मुझे भी लगा अरे यह तो विज्यापन जैसा लग रहा है ………..खैर अच्छी चीजों में जो भी लिखा जाए स्वीकार आप का धन्यवाद

mparveen के द्वारा
May 12, 2012

आनंद प्रवीन जी नमस्कार, सुंदर सन्देश देती रचना के लिए बधाई !!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    धन्यवाद परवीन दीदी

dineshaastik के द्वारा
May 12, 2012

प्रिय भाई  प्रवीन जी बहुत  ही सुन्दर संदेश, निश्चित  ही लोग  इस  रचना से प्रेरणा लेना चाहिये। सराहनीय रचना के लिये बधाई….

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    आभार दिनेश सर सबक लेनी ही पड़ेगी आज नहीं जागे तो कल रोयेंगे

akraktale के द्वारा
May 12, 2012

आनंद जी नमस्कार, सरकार भरोसे मत बैठो, सरकार तो केवल सोने को है, लेट बहुत हम पहले से हैं, नहीं टाइम अब रोने को है, बहुत ही जरूरी है जल बचाना इसका अंधाधुंध दोहन हमें विनाश की ओर ही ले जाएगा. जरूरी सन्देश देते काव्य पूर्ण आलेख के लिए बधाई.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    निश्चय ही अशोक सर यह दोहन वो सभी कर रहें है जिन्हें आसानी से जल मिल जा रहा है अन्यथा दक्षिन भारत और राजस्थान जैसे जगहों पर जा इसके असली कीमत के बारे में पता लगता है आपका धन्यवाद सर समय देने के लिए

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 12, 2012

प्रिय आनंद जी, सस्नेह अच्छा सन्देश. उत्तर प्रदेश में भी जल स्तर गिर गया है. बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    निश्चय ही सर पुरे यूपी बिहार का आमूमन यही हाल है मैंने एक कोशिश की है कारणों को बताने की किन्तु बहुत से और भी कारण है जो रह गएँ है

alkargupta1 के द्वारा
May 11, 2012

मानव को सतर्क करती संदेशवाहक रचना आनंद प्रवीण जी

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    अलका मैम आपने पढ़ा इसके लिए आभार

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 11, 2012

आनंद प्रवीण जी- दूरगामी परिणामो से सचेत करती हुए रचना व आलेख के लिए बधाई………………………. जल ही जीवन है………सुन्दर सन्देश. मानव जाति के लिए………

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    निश्चय ही हमें दूरगामी परिणामों के बारे में सोचना चाहिय लेख पसंद करने के लिए आभार आपका हनीफ भाई

shashibhushan1959 के द्वारा
May 11, 2012

मान्यवर प्रवीन जी, सादर ! बहुत अच्छी चेतावनी देती, सजग करती रचना ! “”इसी लिए कर जोर हूँ कहता, भगवान से भी न क्यों डरते हो, अपना तो सब गटक गए, फिर मेरा हिस्सा क्यों भरते हो !!”"” बहुत भावुक और नम्र शिकायत ! खूबसूरत ! शुभकामनाएं !!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    आदरणीय सर, सादर प्रणाम जी सर यह हमारी ही कमजोरी है की हम जल को न सिर्फ व्यर्थ ही बर्बाद करते हैं बल्कि होते भी देखते हैं इसमें सुधार तभी होगा जब हमें इसकी कीमत समझ में आयगी अन्यथा शायद हम न सुधरें आपको लेख सह कविता अच्छी लगी लिखना सफल रहा सर

yamunapathak के द्वारा
May 11, 2012

बहुत अच्छा सन्देश आनंद जी. शुक्रिया

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    धन्यवाद यमुना जी

yogi sarswat के द्वारा
May 11, 2012

म आसान सुविधा होने के कारण जल को पुरे प्रकार से बर्बाद कर रहें है ………भले ही हमें इसका इल्म ना हो और हम अनजाने में ही करते हों पर यह दुखद कार्य हमारे द्वारा ही हो रहा है …….इसके दोषी हम सब हैं ……..और हमें ही जागरूक होना होगा………याद रहे फिर से ‘जल ही जीवन है”……..और आने वाली पीढ़ी के लिए हमें इसे बचाना होगा अन्यथा निश्चय ही जल कोई महायुद्ध करवाएगा …आज मनुज के जज्बातों में, कोई वेदना नहीं है दिखती, अपने हित के आगे उनको, मौलिक संवेदना नहीं है दिखती, खोद – खोद जल की खातिर, पाताल के निचे पहुँच गए हैं, भले गरीबों के बच्चे, आकाल के मुंह तक पहुँच गए है, माना जल ही जीवन है, और उसी लिए तो हम मरते हैं, किंतु इसके संरक्षण की खातिर, कहाँ कभी आहें भरते हैं, हमें भला आजू – बाजू के, दर्द से कोई क्या है लेना, खोदो जितना खोद सको, माल तो केवल हमको देना, उनमें उबाल आ रहा है देखो, ऐसे कृत्य अब क्यों करते हो, लेख तो विषय के साथ पूरा पूरा न्याय करता है किन्तु एक बात मैं समझ नहीं पाया , आप इतने दिनों से कहाँ हैं ! ऐसे लेखों की आवश्यकता आज बहुत ज्यादा है !

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    बस कभी कभी थोड़ी निजी परेशानी हो जाती है जिस वजह से मंच से दूर हो जाता हूँ……..आपने लेख को सराहा आभार आपका

rekhafbd के द्वारा
May 11, 2012

आनंद जी ,जल ही जीवन है ,सार्थक लेख ,सन्देश देती हुई अति उतम रचना |बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    आपका धन्यवाद रेखा जी

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 11, 2012

ab to dekho saritaon ne , bhee hamse mukh mod liya hai ! jab ham prakriti se khilvad karenge to yahee hoga ! aalekh sahit achhee kavita ! badhai praveen jee !!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    बस आपका आशीर्वाद है सर कुछ अच्छा लिखने की प्रेरणा देती है मार्गदर्सन अनिवार्य है

मनु (tosi) के द्वारा
May 11, 2012

नमस्कार आनंद जी बढ़िया लेख , जल का स्तर वाकई गिर चुका है ॥ नदियां भी अब मुह मोड चली है , सार्थक लेख ,,, नीर बिना सब सून !!!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    बहुत दिन बाद आपकी प्रतिक्रया देख अच्छा आगा पूनम जी …

May 11, 2012

बिन पानी सब सून…बढ़िया लिखा दोस्त. बधाई…

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    हाँ पानी नहीं रहा तो सब हवा ही खाते रह जायेंगे …………..धन्यवाद मित्र

चन्दन राय के द्वारा
May 11, 2012

आनंद जी, मित्रवर इस पानी की किल्लत ने देखो कितना भला किया है लोगो का , बेरोजगारी ख़त्म करने में इसका योगदान अमूल्य है , तो में तो आपके विपरीत कहूंगा , भाई पानी की किल्लत बढाओ, रोजगार बढ़ाओ

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    हाँ हर चीज में सकारात्मक पहलु ही ढूंढना चाहिय जवाहर सर तो आज कल नहीं लिख रहें इस पर लगता है अब सकारात्मक बातें छोड़ दी है उन्होंने

nishamittal के द्वारा
May 11, 2012

आपकी पोस्ट हम सबके लिए बहुत शिक्षा प्रद है ,परन्तु हमारी संवेदनाएं मर चुकी हैं,यही कारण है,की न तो घर में और न घर से बाहर कभी जल की बर्बादी रोकने के प्रयास नहीं किये जाते,जल को प्रदूषित करने के लिए हम होई जिम्मेदार हैं.इसी विषय पर जल दिवस पर मैंने एक पोस्ट प्रकाशित की थी समय हो तो कृपया पढ़ें.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    अवश्य पढूंगा मैं शायद उस वक़्त मंच पर नहीं आ रहा था इस कारण से नहीं पढ़ सका . जल बचाना हम सब की ही जिम्मेवारी है

sinsera के द्वारा
May 11, 2012

स्नेही आनंद जी, नमस्कार, सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया… लेकिन अभी सब कुछ लुट नहीं गया है. आप ने बहुत उचित समय पर बहुत समसामयिक लेख लिखा . वाटर लेवेल अगर नीचे जा रहा है तो ये हमारी जागरूकता की कमी है..मेट्रो सिटीज़ में तो अब बरसाती पानी के रिसाइकिल का उपकरण लगाये बिना मकान बनाने की अनुमति भी नही दी जा रही है.बिहार में सरकारी इंतजाम शायद देर से हो लेकिन व्यक्तिगत रूप से चेतना तो फैलाई ही जा सकती है. हम में से कम ही लोग ये जानते होंगे कि युक्लिप्टस के पेड़ ज़मीन का पानी सोख लेते हैं.विश्वयुद्ध के समय यूरोपियन सैनिक इन पेड़ों को दलदली ज़मीन पर लगाते थे ताकि वो चलने लायक हो जाये.एक साजिश के तहत ये पेड़ अंग्रेजों द्वारा भारतीय धरती पर रोपे गये . देखा गया है कि जहाँ ये पेड़ होते हैं वहाँ कुओं का पानी नीचे जाने लगता है. हमें इन पेड़ों को रोपने से बचना चाहिए… यदि हम अच्छे पर्यावरण के लिए जागरूक रहे, बादलों को आकर्षित करने के लिए अच्छी किस्म के पेड़ लगायें , बरसात के पानी को ठीक से रिसाइकिल करें तो न सरिताएं कभी सूखें और न कभी मुंह मोडें…

    May 11, 2012

    दुश्मन प्रवीन जी, आज तक आपकी लगभग ८० प्रतिशत पोस्टिंग आपके ब्लॉग के नाम के विपरीत ही रही है. जिसको ध्यान में रखते हुए आपसे विनम्र निवेदन है कि या तो आप अपना ब्लाग का नाम बदल दीजिये या फिर उसके अनुसार पोस्टिंग किया करिए वरना मुझे आपको समझाने के दुसरे रास्ते उपयोग करना पड़ेगा…… तो आपकी इस पोस्टिंग से सोचा कि थोड़ी बहुत जल की हकीकत की जानकारी लोगो को दुश्मनों के साथ मिलकर हम भी दे दे…. विश्व में उपलब्ध पानी का ९७ % भाग खरा है अर्थात समुद्र का पानी जो उपयोग करने योग्य नहीं है. २ % भाग बर्फ के रूप में ग्लेसियार्स पर जमा हुआ है . १% भाग नदी, कुआ, तलब, और भूमिगत जल है जिसका उपयोग हम पिने के लिए करते है. हमारी लापरवाही की वजह से यह १% भाग धीरे-धीरे कम होता जा रहा है और साथ ही २% हिमखंडों के रूप में जमा हुआ जल भी धीरे वातावरण में गर्मी बढ़ने के कारण दिन पर दिन पिघलकर , समुद्र के खरे पानी में मिलता जा रहा जिससे समुद्र का जा स्टार बढ़ता जा रहा और समुद्र के किनारे बसे शहर धीरे-धीरे इसमें डूबते जा रहे है……आशा करता हूँ क़ि हम सभी अपनी इस बड़ी उपलब्धि से खुद को गौरान्वित महशुस कर रहे होंगे…………….तो तैयार हो जाइये ख़ुशी के मारे कपडे फार के नंगा नाचने के लिए….अरे सर के ऊपर तो काली माई विराजमान है, इनका तो ध्यान ही नहीं रहा…….भाई कोई नाचेगा नहीं, हम तो मजाक कर रहे थे….अच्छा तो हम चलते हैं …..इ काली मियाँ ख़ुशी भी नहीं मनाने देती है…….!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    काफी विचारणीय बातें आपकी दीदी ………..किन्तु यदि कोई न समझी में ऐसे कार्य करता है तो उसे आप देख भी सकते हैं पर जो जान कर भी कर रहा हो उनको क्या कहा जाय ………… मैंने बहुत से घरो में देखा है जहाँ पानी को इस प्रकार बहाया जाता है जैसे उसका कोई मोल ही न हो आपके सुझाव भी सराहनीय हैं किन्तु देखना होगा कितने लोग इसे अनुसरित करते हैं ////// खैर जब पानी की ज्यादा जरुरत होगी तो बादल आयेंगे ही……….और सरिताएं कभी नहीं सूखेंगी ……आपका आभार ………..मतलब सर पर भार

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    वाह …..वाह आपको इतना ज्ञान है जान ह्रदय पुलकित हो उठा कहते हैं न की मुर्ख दोषत से समझदार दुश्मन अच्छा ………….आपने मुर्खता पूर्ण दोस्ती की अब समजदारी से दुश्मनी निभा रहें है ………….लगे रहो इंडिया ……….हिमालय हूँ हिला नहीं पाओगे मित्र

jlsingh के द्वारा
May 10, 2012

आनंद जी, थोडा सा जल पी लेने के बाद चेतना लौटी है तो मैं आपकी पूरी रचना पढ़ गया! आपकी रचना आगे मेरा भी सर झुक गया! अब मैं जमशेदपुर की बात बताता हूँ! जहाँ जहाँ बने हैं बहुमंजिला फ्लैट. पानी उनके घर में आता है उतना ही लेट! जमीन में वर्षाजल नहीं जा रही है, पक्के सतह से वह बह जा रही है. नदी सरिता को भी हमने कहाँ छोड़ा है, कचड़े कूड़े को डाल उसे भी बार दिया है. अब पानी बहकर चला जाता है या किनारे के घरों में उत्पात मचाता है टाटा प्रबंध ने किया जल का प्रबंधन भी, पर हम वहां करते हैं स्वयम कुप्रबंधन! नल की टोटी को तोड़ देते हैं या उसे खुला ही छोड़ देते हैं लोग पानी ले जाने के लिए कारों में आते हैं, और पानी के लिए पेट्रोल ही जलाते हैं! हम सब है बराबर के दोषी! हमें चाहिए भरपेट से भी ज्यादा, भूखे भले ही रह जाय हमारा ही पड़ोसी! बहुत सुन्दर रचना समयानुकूल! …… थोडा अपने अन्दर भी झांकना होगा, माँ के गोद में सर रखकर सोचना होगा! संतोष जी और बहुत सारे लोग ऐसा कर रहे है! हमें भी वही करना होगा! बधाई और आभार!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    निश्चय ही सर आज फ़्लैट सिस्टम एक हद तो आदमी की जरुरत है किन्तु दूसरी तरफ इसमें प्राकृतिक नियमो की तो दज्जियाँ उड़ा दी जाती है ….जमशेदपुर में तो वास्तव में पानी की बहुत दिक्कत है………….किन्तु अब लगभग सभी जगह पर यह समाश्या गहराने लगी है …………आपके और संतोष भाई के विचार तो हमेसा से सराहनीय रहें है

jlsingh के द्वारा
May 10, 2012

बड़ी गर्मी लग रही है! आनंद भाई, थोडा पानी तो पिला दीजिये! फिर आपकी कविता पढ़ लेंगे!……. और कोमेंट भी कर देंगे!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 10, 2012

    मैं पानी पिने का न्योता देने ही गया की देखता हूँ आप पहले से ही पानी पिने आ चुकें है अब तो गर्मी थोड़ी जरुर कम हो जायेगी …………भाई काहे बना रहें है सर………….स्नेही ही अच्छा लगता है

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    May 11, 2012

    गुरु जी कब तक बच्चे बने रहोगे. अब बड़े हो गये हो. थोडा मुझे भी पानी पिला देते…….बहुत जोर से प्यास लागी है…….. लोग नहीं सुधरने वाले. इसीलिए मैं इन्हें पढ़े-लिखे मूर्ख कहता हूँ. हमारे पूर्वज इस सृष्टि के कल्याण का कार्य करते थे. आज के ये लोग सृष्टि के विध्वंस पर तुले हुए हैं. जब कोई इन्हें समझाता है तो ये समझाने वाले को ही मूर्ख समझने लगते हैं. इन्हें लोक-कल्याण, सृष्टि कल्याण की बातें मूर्खता पूर्ण लगती हैं. अभी तो आज गरीब परेशान है, कल जब इनकी बारी आयेगी तब इनको होश आएगा. हो सकता है तब तक बहुत देर भी हो चुकी हो. बहुत सुन्दर, सन्देश-प्रद रचना बधाई……..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    जब तक आपसबों से कुछ सतगुन ना ले सकूँ बच्चे बने रहने में ही तो मजा और प्रेम दोनों है लोगों को अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी…………..अन्यथा प्रकृति के प्रकोप से कौन बचेगा


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