राजनीति

नयी सोच नयी क्रांति

40 Posts

1427 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 8082 postid : 333

जे जे हमारा परिवार --------अब और नहीं हमें आगे बढ़ना है

  • SocialTwist Tell-a-Friend

यह मंच पर जो भी हो रहा है अत्यंत दुखद है इसपर पूर्णविराम लगना ही चाहिए…………………..आगे बढ़ने के लिए लोगों के गुण अवगुण सभी को स्वीकार करना ही पड़ता है……………..निश्चय ही आदरणीय प्रदीप सर और आदरणीया निशा मैम की बातों को ध्यान में रखना चाहिए
हम व्यर्थ की बातों में पड़े हुए है और अपनी आधार को कमजोर कर रहें है………..हमें संगठित रहना होगा ……..
‘याद रहे सिर्फ संग रहने वाले ही परिवार के सदस्य नहीं होते”………………’जहाँ प्यार मिले वहीँ जीवन है”
हम एक थे एक रहे यही कल्पना होनी चाहिए……..जिन्होंने कोई गलत कमेन्ट या गलत पोस्ट किया था या करने वाले है या कर चुकें है कृपया हटा दें…………..में अपनी पोस्ट “माँ-शब्द में संसार है”…………वापस ले रहा हूँ………..और मुझे कोई दुःख नहीं
जिनसे भी मेरा विवाद हुआ…………….सबसे माफ़ी मांगूंगा……..जिनसे नहीं हुआ उनसे भी ………..प्यार में यह चलता रहता है……..क्या पता कल वही दोष्ट बन जाएँ…………………आपसब एक विचारक है …….और विचार अवश्य होना चाहिय………..उम्मीद के साथ की प्यार मंच पर आएगा …….आपसब का प्रिय क्षमाप्रार्थी आनंद प्रवीन

नेत्रजल कुछ छलकाता हूँ, हाँथ जोड़ कुछ विनती करता,
नभ-गगन के अन्य सितारों से, व्याकुल मन की बात को कहता,
…………….
खोजो किसमे रावण और किसके अंदर में राम छुपा है,
सबके अंदर कुछ लिखने का प्रचंड वेग तूफ़ान छुपा है,
…………..
छोड़ो किसने क्या बोला और किसने किसको बुरा कहा है,
क्या हमने जीवन में कोई, कभी नहीं फिर द्वेष सहा है,
……………
हम सब में कुछ है भरा हुआ, हम सब में कुछ-कुछ खाली भी है,
ह्रदय पे जाकर लगता है ये, कुछ अच्छे मुख में तो गाली भी है,
……………
नहीं दोष देता हूँ किंतु, कुछ मर्यादा तो मर्यादा है,
कुछ भी कहने से पहले, ये याद रहे नर या मादा है,
……………
हमने कलम उठाया था, कुछ नैतिकता को बल देने को,
प्यार मुहब्बत के संग में, कुछ आग में केवल जल देने को,
……………
चलो अभी से शपथ उठायें, फिर ऐसे दिन न लायेंगे,
खुद को थोड़ा छोटा कर के, दूजे संग में मुस्काएंगे,
……………
माफ करो सब साफ़ करो, अब अपने अपने कर्म पे आओ,
प्यार सभी में फिर से आये, ऐसा कोई संगीत बनाओ,
…………..
नए-नए गुल आयेंगे तो, ये देख – देख प्रलाप करेंगे,
हमने नहीं सिखाया तो, वो खुद में कर आघात मरेंगे,
…………..
चलो अभी माफ़ी मांगे, चाहे हमने कुछ किया नहीं हो,
ह्रदय कहाँ होगा उसका, जिसने अब तक कुछ दिया नहीं हो,
…………..
ये याद रहे आगे बढ़ने को, विवेक ज़रा रखनी ही पड़ेगी,
देखो गर खुद में लड़ेंगे हम, फिर दुनिया हमपर शर्म करेगी,
देखो गर खुद में लड़ोगे तो, फिर दुनिया तुमपर शर्म करेगी

…………………………..त्रुटि करना लगता है मेरी नेसर्गिक गुण बनती जा रही है…………जल्दी में लिखने के कारण अवश्य काफी जगहों पर दिक्कत हो सकती है………….क्षमा करें…….

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

41 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 12, 2012

प्रिय आनंद जी, सस्नेह. लक्ष्य की ओर ध्यान रखें, केवल.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    बस यही कोशिश रहेगी सर…………………थोड़ा भटका था पर विचलित नहीं हूँ………और उत्साह कम नहीं हुआ है

May 10, 2012

‘हम एक थे एक रहे यही कल्पना होनी चाहिए”………………….जी प्रभु ऐसे ही हकीकत से इंकार कर कल्पना करते रहिये……..वैसे इसमे तुम्हारी कोई गलती नहीं है तुम जैसे दुश्मनों से सिर्फ कल्पना की आशा की जा सकती है……! सावधान रहना क्योंकि तेरी और मेरी लड़ाई अब व्यक्तिगत हो गयी है जिसकी पाहिले ही घोषणा कर चूका हूँ…. इस मंच पर मेरे तीन दुश्मनों के लिस्ट में तुम्हारा नंबर पहला चल रहा है…! गुरुजन बृंद का आशीर्वाद ले लो ताकि तुम्हे बाद में किसी भी प्रकार की शिकायत न रहे…..क्योंकि अलीन से जितना तुम्हारे बस की बात नहीं…..! हो सकता है कि बाकि के दो में से एक मुझसे जीत जाय….!…………………..अलीन.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    “हवाओं के जोर से चलने से उड़ने वाले ही उड़ते हैं, स्तम्भ जो हैं धरा के वो किस बात से बोलो डरते हैं”…………. चलो किसी और को डराना हम डरने वालों में से नहीं ………..जीतने के लिए नहीं दिल जीतने के लिए काम करो फिर बोल रहा हूँ …………………सांगत से गुण आत हैं सांगत से गुण जात लगे रहो मदारी के डमरू की तरह बजते ………………..डम डम कर जब थक जाना तब कहना की अब थक गया हूँ…………….अभी तो इन्शानी गुरुर बोल रहा है…………..जल्द ही इन्शान भी बोलेगा पंगा लेने का नहीं नंगा कर दूंगा……………..हा हा……………….सौरी आप तो पहले …………उफ़

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 10, 2012

प्यार मुहब्बत के संग में, कुछ आग में केवल जल देने को, चलो अभी से शपथ उठायें, फिर ऐसे दिन न लायेंगे, खुद को थोड़ा छोटा कर के, दूजे संग में मुस्काएंगे, बहुत अच्छे आनंद जी …. देर आये दुरुस्त आये :) :) … (कई बार कोशिश के बाद आज पोस्ट हुआ ) मजाक कर रही हूँ .. बहुत अच्छा लिखा है ..बधाई आपको

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    चलिए देर आये दुरुस्त आयें………………हम तो सोचे थे वो नहीं आयेगे, अजी हुजुर वो आये तो प्यार भी संग लायें बस यूँही प्यार बना रहे आपका आभारी हूँ

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 9, 2012

.हमें संगठित रहना होगा …….. ‘याद रहे सिर्फ संग रहने वाले ही परिवार के सदस्य नहीं होते”………………’जहाँ प्यार मिले वहीँ जीवन है” हम एक थे एक रहे यही कल्पना होनी चाहिए…सच कथन आइये इस का ध्यान रखें … सुन्दर विचार आप के आनंद जी ..पोस्ट नहीं हटानी चाहिए हाँ कोई अभद्र फ़ालतू प्रतिक्रिया हो तो हटा सकते हैं विचार तो बहुरंगी आयेंगे तर्क वितर्क होता रहेगा …. त्रुटियाँ होती रहती हैं आइये सुधारते भी रहे थोडा व्याकरण पर ध्यान देंगे तो हिंदी और समृद्ध होगी … जैसे शीर्षक में थोड़ी दूरी या अर्धविराम … जे जे हमारा परिवार ——–अब और नहीं——– हमें आगे बढ़ना है मेरा नैसर्गिक गुण बनता जा रहा है … विवेक ज़रा रखना ही पड़ेगा …या होगा …होता है प्रवीण जी आप के अन्दर भावों का खजाना है आओ इसे निखारते रहें.. भ्रमर ५

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    आपके आशीर्वाद के साथ तो निखार आना ही होगा सर …………..यहाँ बिन मांगे मुझे इतना मिला की क्या कहूँ आपकी स्नेह दृष्टि ही मेरे लिए विश्वाश का कार्य करती है

abhilasha shivhare gupta के द्वारा
May 9, 2012

आनंद जी…आपके विचारो में बहुत सादगी है…. बहुत उच्च विचार है आपके. विश्हल ह्रदय है आपका…. जिसका प्रतिबिब आपकी इस रचना में दिखता है… बहुत सुन्दर….. परन्तु सच की लड़ाई में आलोचनाये तो मिलेंगी है…. दर कर सच की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है…. इसलिए आको आपनी पोस्ट वापस नहीं लेनी चाहिए थी…..बहुत सुन्दर लिखा था आपने…..

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    अभिलाषा जी क्या कहूँ बस आग में जल डालना ही पड़ता है रचना सब के स्मरण में है यही काफी है

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 6, 2012

प्रिय आनंद पर्वत जी अगर मूसलो से डर लगता हो तो ओखली में सर देने की जुर्रत नहीं करनी चाहिए बाकी आप खुद समझदार है

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    गुरुदेव , “झुकेगा वो जिसके अन्दर कुछ जान है, अकड़ तो ख़ास मुर्दों की पहचान है,” समझ गया सब कुछ समझ गया….जब पर्वत कहा है तो ऊँचाइयों पर संदेह न करें…..

rahulpriyadarshi के द्वारा
May 6, 2012

आनंद जी,नमस्कार,आपने जो बातें यहाँ की हैं,वो आपके सहृदय होने का परिचायक है,आप हर अड़चन को भूल कर आगे बढ़ने में विश्वास करते हैं,लेकिन मेरा सोचना यह है कि अगर आपका कोई आलेख किसी को आपत्तिजनक लगता हो या उसकी घनघोर आलोचना हुयी हो तो आपको वह रचना हटा नहीं देनी चाहिए,आपका,हमारा काम लेखन करना है,और लेखन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह कि समीक्षाएं होती हैं,लेकिन लेख लेखक के अपने विचार होते हैं,पाठक प्रतिक्रिया देने के लिए स्वतंत्र होते हैं,आलेख मिटा देने से सोच नहीं मिटती है,प्रतिक्रियाओं की वजह से विचलित नहीं होना चाहिए,यह बात आपने बहुत उत्तम कही है की इस मंच पर तमाम लेखकों को एकजुट होकर रहना चाहिए,इस मंच पर कौन क्या कर रहा है,इसको लेकर किसी प्रकार का विद्वेष नहीं रखना चाहिए,हाँ किसी में कुछ सकारात्मक मिले तो अवश्य ग्रहण कर लेना चाहिए,आपका यह आलेख सार्थक लगा.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    आदरणीय राहुल जी सर्वप्रथम तो मेरे ब्लॉग पर प्रथम बार आने के लिए आपका आभारी हूँ………… आपकी बातों से पुर्णतः सहमत हूँ किन्तु विवाद को दफन ही हो जाना चाहिए था…….लड़ाई अपनों में सोभा नही देती ………और कुछ लोग अभद्रता पर उतर आये है जिनका समर्थन अपने ही कुछ लोगन ने कर दिया जो की तकलीफदे है…………आपको पसंद आई मेरी यह रचना इसके लिए पुः आभार

Santosh Kumar के द्वारा
May 5, 2012

प्रिय आनंद भाई ,.नमस्ते आपकी पहल का हार्दिक स्वागत करता हूँ …किन्तु आपकी पोस्ट अच्छी थी उसमें कोई बुराई नहीं थी फिर क्यों डिलीट किया ,.खैर कर ही दिया है तो कोई बात नहीं आगे बढ़ते रहिये ,..हार्दिक बधाई

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    बस संतोष भाई कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है…………..यदि ऐसा न करता तो मेरे कदम पर ही सवाल खड़े होते और जब आप साथ हैं फिर इन मुद्दों में क्या रखा है………हम अपनी उदेश्य से भटक रहें है इसपर ध्यान रखना होगा………….जय हिंद ……..जय भारत

akraktale के द्वारा
May 5, 2012

प्रिय आनंद जी नमस्कार, बस यही कहूँगा एक सराहनीय पहल.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    जिसमें सब का योगदान होना चाहिए सर…………..आपकी बातों से पूर्ण सहमत हूँ क्यूंकि आप बात को बिलकुल तौल कर ही कहतें है

shashibhushan1959 के द्वारा
May 5, 2012

मान्यवर आनंद जी, सादर ! आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी ! हार्दिक धन्यवाद ! (”"त्रुटि करना लगता है मेरी नेसर्गिक गुण बनती जा रही है………… जल्दी में लिखने के कारण अवश्य काफी जगहों पर दिक्कत हो सकती है………….क्षमा करें…….”" क्षमा तो करना ही पडेगा ! लेकिन यह आदत अच्छी नहीं है !)

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    निश्चय ही सर यह आदत नहीं बनेगी………….बस जल्दबाजी में यह सब हो जाता था…….आगे नहीं होगा आपने क्षमा किया बस यही बहुत है

चन्दन राय के द्वारा
May 5, 2012

मित्र आनंद जी…., हमने कलम उठाया था, कुछ नैतिकता को बल देने को, प्यार मुहब्बत के संग में, कुछ आग में केवल जल देने को, ऐसे ही सद्भाव की जरुरत है मित्रवर बहुत ही सद्गुणी इंसान है आप

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    पर आपसे थोड़ा कम मित्रवर ………..बस मिलजुल कर आगे बदना हैं ……जो समझ सकें वो सही जो ना समझे उन्को कौन समझा सकता है

vikramjitsingh के द्वारा
May 5, 2012

प्रिय आनंद जी….. आपके सदविचार को……नमन….कुछ इस तरह से….. ”फ़िराक-ऐ-प्यार में जो गम मिलेंगे… वो मेरे हौंसलों से कम मिलेंगे.. जहाँ दुनिया निगाहें फेर लेगी… वहां ऐ दोस्त….तुझको हम मिलेंगे….”

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    साड़ी बातें अपनी जगह सही हैं विक्रम भाई…………..बस गुस्सा छोडिये और आइये सब मिल कर फिर से लिखें और पढ़ें………….परिवार में यह सब होता ही रहता है

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 5, 2012

आप के विचार उत्तम हैं और मैं आप से पूर्ण सहमत हूँ | हम पक्षी एक dal के हैं और रहेंगे | सद्विचारों के लिए आभारी हूँ | आप झंडा थामे रहें !!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 13, 2012

    जी सर झंडा तो मैं थामने को तैयार ही हूँ………….किन्तु उसकी मर्यादा तो हम सभी को ra

div81 के द्वारा
May 5, 2012

आपस मे ही उलझे रहेंगे तो लेखन प्रभावित होगा और यहाँ सब का उदेश्य स्वस्थ लेखन से ही होना चाहिए विवाद मे विराम लगा कर आपने समझ का परिचय दिया है | मगर आपको अपनी पोस्ट डिलीट नहीं करनी चाहिए थी उसमे कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे किसी कि भी भावना आहात होती |

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 5, 2012

    निश्चय ही दिव्या दीदी………….यदि कुछ सार्थक लेखनी करनी है तो इन सब कुतर्कों से बाहर निकलना ही होगा…………पोस्ट डिलीट करना एक पहल भर मानना चाहिए ………………हमें अब कुंठाओं को छोड़ना ही होगा

nishamittal के द्वारा
May 5, 2012

आनन्द जी ,त्रुटी वाली कोई बात थी नहीं खैर बस आवश्यकता है,परिवार का स्नेह और सौहार्द बनाये रखने की.आपके ब्लॉग पर कमेन्ट से भी यही अपील है,और पृथक भी कर दी है.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 5, 2012

    निश्चय ही निशा मैम…………किन्तु आपके मुझे समझ नहीं आ रहा की आप क्या कह रहीं है…….. और पृथक भी कर दी है……….यह किसके लिए है….

    nishamittal के द्वारा
    May 5, 2012

    अर्थात एक पोस्ट और इसी आशय की डाल दी है.सोरी मैंने अस्पष्ट लिखा

May 5, 2012

स्वागत योग्य पहल, परन्तु राजीव जी की बात से सहमत हूँ, ब्लॉग पोस्ट क्यों मिटाया?

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 5, 2012

    बस मित्र अपने उद्देश्य पर वापस आना है………..

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
May 5, 2012

सुन्दर विचार,आनंद जी.लेकिन पोस्ट क्यों डिलीट करते हैं.पोस्ट में कोई भी ऎसी बात नहीं,जिसे डिलीट किया जाय.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 5, 2012

    निश्चय ही सर…………किन्तु सार्थक पहल के लिए कुछ ऐसा करना ही होता है जिससे आपकी बाते थोथी ना लगे………….यदि अब भी समझने वाले न समझे तो हम कुछ नहीं कर सकते…………आपका सहयोग अनिवार्य है सर

dineshaastik के द्वारा
May 5, 2012

भाई प्रवीन जी आपकी सोच  एवं पहल का स्वागत है। लेकिन  निवेदन है कि हमें परिस्थितयों से समझौता नहीं  करना है। यह लड़ाई  विचरों की है, और  हमें इसे विचारों तक  ही सीमित  रखना है। इसे व्यक्तियों की लड़ाई में नहीं  बदलने देना है। मानवीय  सभ्यता के विकास  के लिये विचारों की लड़ाई या  विरोध  बहुत ही आवश्यक  है। तभी नये नये विचरों का उदभव होगा। क्या  बिना लड़े ही लड़ाई हार जाओगे? क्या विपरीत  परिस्थितियों से समझौता कर लोगे?  लड़ाई लम्बी है सोचा था चलोगे दूर तक  साथ  मेरे। तुम  तो दो कदम  चले, थके और बैठ  गये।

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 5, 2012

    आदरणीय दिनेश सर, सादर प्रणाम ना मैं परिस्तिथियों के आगे झुकता हूँ और ना ही समझौता करता हूँ…………व्यर्थ की बातों से अवश्य बचने की कोशिश करता हूँ…………….निश्चय ही इसे व्यक्तिगत लड़ाई नहीं बनाई जानी चाहिए मानवीय सभ्यता के लिए वाद अवश्य जरुरी है किन्तु वाद करने वालों को भी पहचाना जाना चाहिए…………..मुझे लगता है की अन्यथा लोगों से वाद नहीं करना चाहिए जो ना समाज को कोई सन्देश दे पाए और ना किसी को सम्मान दे सके उनको भला हम क्या समझायेंगे………….किचर में पत्थर मारने का मतलब ही है खुद को गंदा करना…………….मैं इसे हार नहीं मानता ………………क्यूंकि मैं लड़ने नहीं आया था……………हाँ यदि अभद्रता बंद नही हुई तो अवस्य इसकी शिकायत करूंगा ………….विपरीत परिस्तिथियों से ही निकाल रहा हूँ सब को……..सभी ऐसे लोगों का बहिष्कार कर दें बस यह बंद हो जायगा………..और यदि विरोध भी करना है तो जे जे पर कोम्प्ल्लें कर दें………… लड़ाई अपनी बड़ी नहीं हो सकती ना ही कदम पीछे लेने का सवाल है…………….अपनी ही एक कविता सुनाता हूँ…………………….. “जितना तो मूल है, मेरे लिए तो धुल है, मैं चाहता हूँ जीतना पर सर नहीं झुकाउंगा, कदम यदि बढाउंगा तो पीछे फिर ना आउंगा”…………..समझना है तो मित्र अनिल को समझाइये ……………………..मर्यादा को भूल रहें है थोड़ा ………..मुझे किसी से कोई खेद नहीं …….मेरा उद्देश्य यह सब नहीं………..

chaatak के द्वारा
May 4, 2012

सार्थक सोच के साथ सार्थक पहल| एक स्वर मेरा मिला लो!

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 5, 2012

    स्वर ही मिलाने होंगे चातक भाई…………….आपकी सोच को सलाम

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 4, 2012

सही और सार्थक पहल . यही एक अच्छे विचारक का गुण है अब इसे चाहें जो समझे.यहाँ न जय है न ही पराजय है. यहाँ पर कोई त्रुटी नहीं है. हम आपके अत्यंत ही आभारी हैं. दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की करें, उन्नति करें, आगे बढ़ें. लेखन और विचारों में उत्कृष्टता आती रहे.

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 5, 2012

    निश्चय ही अजय भाई……………आपका साथ है तो ख़ुशी अपने आप आएगी……………यहाँ ना झुकने की बात है ना उठने की जो खुद को हम समझ सकें उनका स्वाकत होना चाहिए अन्यथा बहिष्कार करना ही उचित है…………………आपके सफल सन्देश के लिए धन्यवाद


topic of the week



latest from jagran