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ANAND PRAVIN


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क्या हम लेखक हैं???

Posted On: 27 May, 2014  
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Others social issues कविता में

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“पतझर आया”

Posted On: 9 Feb, 2014  
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Others social issues कविता में

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मासिक विषय – भारत मित्र मंच

Posted On: 5 Dec, 2013  
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Others कविता में

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साहित्य विकास नहीं राष्ट्र चेतना के लिए

Posted On: 29 Nov, 2013  
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(1) 100 Others social issues में

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तुम जियो हजारों साल……….

Posted On: 1 Sep, 2013  
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Others Special Days कविता में

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नेता और अबला……………शर्म है की बस “आती नहीं”

Posted On: 31 Dec, 2012  
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Others लोकल टिकेट में

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“देश की यही पुकार है”

Posted On: 8 Dec, 2012  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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“बंजर भूमि पर फूल खिला”

Posted On: 25 Oct, 2012  
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Others मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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“बस दोष ज़रा कलयुग का है”

Posted On: 18 Oct, 2012  
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Others में

31 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वारि जैसा मेरा जीवन, कहीं बंधी, कहीं पर बहती हूँ! ना जाने क्यों अपने घर ही, सहमी – सहमी सी रहती हूँ!! ................................................................................ युग बदल रहा, हम बदल रहें, है बदल रही अपनी राहें! खुल कर अब पटल पे दिखती हैं, दबी हुई अपनी चाहें!! ........................................................................... उन्नयित सूर्य के आगे तम कहाँ कभी टिक पाया है! प्रयास अनेकों हुए मगर अस्तित्व कहाँ मिट पाया है!! … मिटने वाली हम चीज नहीं, जननी हैं हम, आधार हमीं! हम नहीं अगर शीतल रहते, तपने लगती बन अनल जमीं!! … तपने ना दें हम मिलजुल कर, नर हो चाहे वह नारी हो! इस सृष्टि के हैं देन सभी, एक दूजे के आभारी हों!! … चले इस मिथ्या को अब त्यागे, नारी का जग में नाम नहीं! साबित कर हमसब दिखला दें, इस प्रश्न को दे विराम यहीं!! ..............................................इसके अलावा जो भी पक्तियां है पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि जबरदस्ती लिखे हो............................................महा बकवास ...............परन्तु यह पक्तियां लाजवाब है अतः तुम्हें मिलते हैं........................५ में ५ अंक ................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: cpsingh cpsingh

परम स्नेही मेरे नाती श्री जी , आपने अपने कार्य और व्यवहार से अपने साथ साथ कुल का मान बढाया , मेरे लिए गर्व की बात है, की मेरा नाती बड़ा हो गया. . दीर्घायु एवं यशश्वी भव. ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ परम आदरणीया निशा जी, अलका जी , हमरे छुटके भैया जी स्नेही आदरनीय शशि भूषण जी को जन्म दिन पर हार्दिक शुभ कामनाएं. . मंच पर भले ही मुलाकात न हो पर दिल में होती रहती है. . जितने हमारे मित्र शुभ कामनाएं दे चुके हैं उनका भी आभार आगे का अग्रिम आभार. . नेत्र विकार होने के कारण मंच पर समय नहीं दे पा रहा हूँ. मेरे ही पाठक अपनी रचनाओं पर मेरी टिप्पणी न पाकर मुझे भी इनकार कर रहे हैं. .इसको ही समय कहते हैं. वन्दे मातरम् जय भारत

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

आदरणीय सरिता दीदी, सादर प्रणाम सबसे पहले तो बधाई के लिए आभार.......फिर आपके पदचिन्हों पर कुछ बढ़ा ख़ुशी हुई वीर रश ही नहीं मुझे और भी कविता कहनी आती है......कुछ तो आपसे ही सिखा है बस शिल्प से अनजान हूँ आप सहयोग देंगी तो अवश्य सिख जाऊँगा कसाब या अफजल या कोई और फांसी व्यक्ति नहीं अभिवक्ति को दी जानी चाहिए और त्वरित दी जानी चाहिए ताकि अपनों के बिच एक असंतोष ना फैले अतएव इतनी देर से फांसी दे भी दी तो कोई फायदा नहीं .......दूसरी बात यह भी है की दंडविधान तो दंडविधान ही है फिर चाहे किसी के लिए भी हो..........फांसी तो उन्हें भी देनी चाहिए जो देश के अन्दर के दरिन्दे हैं जैसे बलात्कारी और समाजिक हत्यारे जो भी हो आपकी लेख का इन्तजार है........इसबार महिलाओं के लिए कुछ लाइए बड़ी विकट स्थिति में है वो

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

राजनीति में पिसा हुआ, ये कैसा मुद्दा बना हुआ, शर्म करो नेताओं अब, माहोल है कैसा तना हुआ, इच्छाशक्ति होती तुममें, तो दिख जाती इक बार भी, नहीं “शहीदों” की बेवा, रोती रहती हर बार ही, वो पुण्य “शहीदों” के मजार भी, बोल रहे “धिक्कार” है, चढ़ा दो उनको फाँसी अब की “देश की यही पुकार है” एक आध नेता टपक जाना चाहिए था तभी शायद अफज़ल को फंसी हो पाती ? अब तो हमारा "महामूर्ख " मंत्री कहता है की उसे मौत की सजा नहीं उम्रकैद दे दो ! मुझे लगता है बेकार में ही कोर्ट वोर्ट का झंझट पाल रखा है भारतीय न्यायव्यवस्था में ! हमारा ये मंत्री ही सब कुछ कर सकता है , सारे फैसले ले सकता है , दे सकता है फिर न्यायधीश क्यूँ बिठा रखे हैं ? इसे साले को अपनी टट्टी धोनी नहीं आती होगी और साला मंत्री बना बैठा है ! आपके शब्दों को सही सम्मान दिया है जागरण ने ! बहुत बहुत बधाई आनंद प्रवीण जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Jaynit Kumar Jaynit Kumar

प्रिय आनंद भाई ,..सादर अभिवादन कविश्रेष्ठ की कमी खल रही, शिष्य रहा ललकार है! चढ़ा दो उनको फाँसी अब की “देश की यही पुकार है”.........बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन ,..वो तभी सुनेंगे जब कोई फायदा होगा और यहाँ तो वोट बैंक खिसकेगा भाई ,..तेरह जनवरी से पहले क्या ये बत्तीस जनवरी तक नहीं सुनने वाले हैं ,....शेष मूरख क्या कहे ,... विकार मिटाना होगा भाई ,..आप जैसे जोशीले युवाओं के होते हुए आशा बलवती है ,..देश जागकर एकजुट होगा !....हमारा विश्वास न मचले !...यही तो धैर्य की परीक्षा है ,...पीड़ा तपाकर मजबूत बनाती है ,.... ..भगवान का न्याय कभी आधा नहीं होगा ,..वो हमारे साथ पूर्ण न्याय करेंगे ,.इन देशद्रोहियों से न्याय की बात कहना न्याय का अपमान है ... बहुत सुन्दर रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन वन्देमातरम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

मान्यवर आनंद जी, सादर ! रचनात्मक सामाजिक चिंता से ओत-प्रोत आपकी इस रचना के भाव सराहनीय हैं ! कृषि, जो सम्पूर्ण जीवन का प्रथम आधार है, उसकी दुर्गति पर आपकी चिंता और उससे निकलने के उपायों पर मनन की व्याकुलता काबिलेतारीफ है ! हार्दिक शुभकामनाएं ! ईश्वर प्रदत्त आधार-भूमि को खून दिया जल से सींचा, हरियाली फिर भी आ न सकी, जाने क्या है प्रभु की इच्छा ! टूटा ये ह्रदय, हाँ तो भी सही, दिल में अपने उम्मीद जगा, इस संबल को आधार बना, बंजर धरती पर फूल खिला !! क्या नहीं यहाँ कोई ऐसा माली जो यह उपकार करे, सूत्रों को करके और सरल, मानवता का उद्धार करे ! अद्भुत रहस्य वह चीज नहीं, जिसे सोच रहें सब एक बला, दिल खोज उन्हें जो जाने कला, “बंजर धरती पर फूल खिला ! अध्ययन करें उन बातों का , आगे को कैसे बढ़ना है, उत्साहजनक परिणाम दिखे, यह दावा कैसे गढ़ना है! आगे बढ़कर उजियारे को, पाने हित दें मन-प्राण गला, अंधियारे में एक दीप जला, बंजर धरती पर फूल खिला !! हम करें किसानी उस हल से, बलराम का जिसपर हाथ पडा, वह बीज धरा में हम बोयें, जो हो सर्वोत्तम और खरा ! अब देर नहीं, अवसेर नहीं, दें उम्मीदों का दीप जला, ऐसा कोई अब तीर चला, बंजर धरती पर फूल खिला !! (कोई भी रचना प्रारंभ करें तो ध्यान रखें कि प्रथम ३-४ पंक्तियों में ही उस रचना का उद्देश्य स्पष्ट हो जाय ! हर पंक्ति के भाव एक दूसरे से सम्बद्ध हों ! शब्दों का पर्याय रखकर देखें, जैसे “बंजर भूमि पर फूल खिला” कि जगह "बंजर धरती पर फूल खिला" भूमि ३ मात्रा का शब्द है, जबकि धरती ४ मात्रा का ! “बंजर भूमि पर फूल खिला” में कुल १५ मात्राएँ हो रही हैं, जबकि चाहिए १६ मात्रा ! ज्योंही आप भूमि को धरती में बदलते हैं, मात्रा कि कमी पूरी हो जाती है, और पंक्ति सुदृढ़ हो जाती है ! )

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

मान्यवर आनंद जी, सादर ! मुझे गर्व होता है आप जैसे युवकों पर, जो समाज के प्रति चिंतित रहते हैं ! आप की यह चिंता आपकी रचनाओं में स्पष्ट झलकती है ! "जब जन्म लिए तब मानव थे, लेकिन अब शंका होती है ! आ जाए मन में अहंकार, मौलिकता क्षण-क्षण खोती है !! अपनी निज की अभिलाषा को संयमित नहीं रख पाते हैं ! क्यों समझ द्रव्य को सोम-सुधा, हम गरल निगलते जाते हैं ! तम में भटके-भटके से हैं, अपने ही विश्वासों से डर ! इसलिए झूठ पर, मिथ्या पर, बल डाल रहे यूं बढ़-बढ़ कर !! कृत्रिम आभा पर मुग्ध, उसे पाने को हम ललचाते हैं ! क्यों सत्य मार्ग को छोड़ पतन के पथ पर बढ़ते जाते हैं ! है आज मनुज में होड़ बड़ी, तन भूषण कौन सजायेगा ! हो रहे निरादृत मात-पिता, सर विपदा कौन उठायेगा !!"" आप के द्वारा किया जा रहा परिश्रम अब आपकी रचनाओं में झलकने लगा है ! हार्दिक शुभकामनाएं !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: aman kumar aman kumar

आदनीय सर, सादर प्रणाम रचना में मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार सर........... कुछ पन्तियों को सुधार लिया है जो की वास्तव में अब अच्छे बन पड़े लग रहे हैं .........किन्तु एक पांति जिसे आपने दर्शाया था उसका मूल स्वरुप बदलने के कारण मैं उसे नहीं बदल रहा ........... “”मत तरसाओ गोविन्द कि अब, यह पाप सहन न होता है, यह देख दशा इस धरती का, मन भीतर – भीतर रोता है”"...........इस पांति में आपके द्वारा जो बतलाया गया की एक ही शब्द की पुनरावृति हुई है कहीं आपका आशय ............."पाप सहन न होता है'".........और "मन भीतर - भीतर रोता है"" से तो नहीं है...........समझ नहीं पा रहा हूँ बाकी मात्राओं को व्यवस्थित करने की कला के बारे में सीखना चाहता हूँ और अध्यन भी करना चाहता हूँ सर........यदि आपके नजर में कोई ऐसी पुस्तक हो जिसमें इसकी विस्तृत जानकारी दी गई हो तो मुझे बतलाएं सर..............आपका पुनः आभार ...... आवयश्यकता पड़ने पर गुरुजनों को अवस्य याद करूंगा

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

मान्यवर आनंद जी, शुभकामनाये ! खेद है कि आपकी पिछली पोस्ट पर मेरा ध्यान नहीं गया ! इस रचना को और सुगठित किया जा सकता है......... हे केशव, माधव, हे मोहन, कुछ दया – अनुग्रह बरसाओ, खल – दुर्जन का उत्पात बढ़ा, न मानवजन को तरसाओ, -------- निचली पंक्ति में ""न मानवजन को तरसाओ,"" के स्थान पर "मत मानवजन को तरसाओ" कर दिया जाय तो मात्रा की कमी पूरी होकर प्रवाह बढ़ जाएगा ! ""मत तरसाओ गोविन्द कि अब, यह पाप सहन न होता है, यह देख दशा इस धरती का, मन भीतर – भीतर रोता है"" दो पंक्तियों के मध्य एक ही शब्द की पुनरावृति से बचना चाहिए ! "यह देख दशा इस धरती का"" की जगह अगर "अवलोक दशा इस धरती की" करने पर यह और अच्छा हो जायेगा ! ""मानव ने मानवता छोड़ी, हाँ छोड़ दिया कब का ही शरम, यह बीते युग की बात हुई, जब मिलता था कर्मो में धरम,"" "मानव ने मानवता छोड़ी, हाँ, त्याग दिया है लाज-शरम, यह बीते युग की बात हुई, जब मिलता था कर्मो में धरम," आनंद जी, केवल कुछ शब्दों के सामंजस्य से रचना और सुन्दर, सुगठित और प्रवाहमान हो जायेगी ! मैंने अपने सुझाव दिए हैं ! वैसे इस रचना में आपका परिश्रम स्पष्ट परिलक्षित है ! पूर्व की रचनाओं की तुलना में यह रचना बहुत अच्छी है ! आपको जहां भी कोई दिक्कत हो, आप निःसंकोच मुझे मेल करें, आपके किसी काम आकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जग – व्यथा दिखाते है जब – जब, फटने लगती हैं भूमि-अचल, जब वार कलम का करते हैं, कुछ अतुल-शब्द बन पड़ते हैं, मित्र आनंद प्रवीण जी , आपने इन मूर्धन्य लोगों को जन्मदिन की जो शुभकामनाएं दी हैं , बड़ा ही नया रूप दीखता है ! मेरी तरफ से भी इन सभी सम्मानित और आदरणीय सज्जनों को बहुत बहुत बधाई और बधाई आपको भी , की आपने इनके जन्मदिन में हमें शामिल किया ! असल में ये सज्जन , इस मंच की न केवल शोभा हैं बल्कि हम जैसे नव लेखको ( मान लेता हूँ अपने आप को भी ) को मार्गदर्शन कर रहे हैं ! ये वास्तव में हमारे गुरु भी हैं जिनके आशीर्वाद से ही हमें प्रेरणा मिल जाती है ! मैं सौभाग्यशाली हूँकि मुझे इन महान लोगों के साथ विचार साझा करने का अवसर प्राप्त है ! आदरणीय निशा जी मित्तल को इस मंच का हर ब्लोग्गर , माँ के जैसा आदर देता है , आदरणीय अलका गुप्ता जी अपनी लेखनी से और अपनी प्रतिक्रियाओं से इस मंच को हमेशा जीवंत रखती हैं ! आदरणीय श्री शशि भूषण जी , जिनसे मैं हर रूप में प्रभावित हूँ ! मैंने कहा भी है , अगर प्रेम चाँद भी आज होते तो श्री शःसी भूषण जी की तारीफ करते और अगर बात करें , इस मंच को सजाने की तो आदरणीय श्री प्रदीप कुशवाहा जी को कोई कैसे भूल सकता है ? श्री कुशवाहा जी की रचनायें , बड़े बूढ़े से लेकर बच्चों तक को अपनी ओर आकर्षित करती हैं ! बहुत बहुत धन्यवाद ऐसी पोस्ट के लिए

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

प्रिय आनंद भाई ,..सादर नमस्कार यहाँ पहले प्रतिक्रिया लिखी थी लेकिन पोस्ट नहीं कर पाया था ,.देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ,..गुरुजनों और साथिओं के अनमोल आशीर्वाद, समर्थन के लिए हम कृतग्य हैं हम लड़ने के लिए तैयार बैठे हैं ,..लड़ाई लम्बी और कठिन है जिसे हम जीतकर ही रहेंगे भारतमित्र एक विचार है ,जो मजबूत और सक्षम सामजिक, राजनैतिक और आध्यात्मिक विचारभूमि बना सकता है ,...विचार ही कर्म का बीज होते हैं अतः एक दिन यहाँ से भी कर्म का पौधा उगेगा जो कालांतर में फल भी देगा ,.. अभी की परिस्थितिओं में हमें आन्दोलन को अधिकतम शक्ति देना है ,..मूरखों की पहल जरूर आनंद लाएगी.... हार्दिक शुभकामनाओ सहित बहुत आभार जयहिंद ,..वन्देमातरम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आनंद नमस्कार भाई पहले तो तुम्हारा ये फोटो ब्राईट कर के दोबारा रख्खो तो चहेरा साफ दिखे । आपने उपर गोल गोल बनाया है वो आज तीन कोनेवाला त्रिकोण हो गया है । हम यदी त्रिकोण बनाते हैं तो उपर के कोने में १% जनता जो दबंग है, चोर है, जो दुसरे लोगो को प्राणी ही समजते है ऐसे लोग बैठ गये हैं । जीस का कलर हम काला दे सकते हैं । हर बुराई का प्रतिक । उस के निचे टोटल ४% हो जाए ईस हिसाब से लाईन बनाते हैं तो ईस मे हर खून पीनेवाला आदमी समा जाता है । ईस भाग का कलर लाल समजीए । हर धनवान, हर धर्म या उद्योग के नेता, बडे बडे सरकारी नौकर, सरकारी चमचे, मिडिया ईत्यादी। बादमें नीचे जो भाग बचता है उसे पिला कलर देते हैं । उस में हम सब आ जाते हैं । मजदुर, कारीगर, छोटे छोटे सरकारी बिन सरकारी नौकर । याने सब गधे, गधे की तरह काम ढोना है, कमाना है खूद के लिये और पूरे त्रिकोण के लिये । त्रिकोण में नीचे का आदमी अब उपर के कोनेमें नही जा सकता । आप के सर्कल में जाता है । काले और लाल मिल के ४% लोग बाकी ९६ % पिले को नियंत्रित करते हैं , और पिले कुछ नही कर पाते हैं, गुलाम बन गते हैं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

प्रिय प्रवीन जी ( संतोष जी ) जय श्री राधे सब कुछ सिक्कों के दोनों पहलु तो आपने दिखाया कहा ही संतोष जी भी इतने दिन से वही कर रहें हैं लेकिन काश सब एक मुद्दे पर आ जाएँ ...अन्ना जी बाबा जी का सब समर्थन किये हैं कम से कम इन दोनों को एक जुट होना था जब ८ या ९ अगस्त की बात थी थोडा देर कर अनशन शुरू होंगा था कुछ हो सकता था एक चूक तो हो गयी न जाने क्या सोच ...अब एक इच्छा हो भ्रष्टाचार हटाना भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाना जहां भी उनका मुंह खुले जबाब देना जब ये क्रान्ति के बोल , अवसर शुरू हो जाएंगे भीड़ साथ देने लगेगी एक जगह से आग दूसरी जगह फैलेगी लोग सब एक मुद्दे बनायें मिलें तो कुछ बात बने बहुत झेलना होगा इक्के दुक्के लोग पक्के ईमानदार ही आगे बढ़ पाते हैं बाकी तो कुचले ही जाते हैं हौंसले बुलंद करना होगा आपके आन्दोलन को हमारा पूरा समर्थन है प्रभु ऐसे सब लोगों को जोड़े जय हिंद ….जय भारत…… भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

बधाई आदरणीय निशा जी के विचारों से सहमत. वैसे सबसे बड़ी पहल हम यह कर सकते हैं की अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी इमानदारी से निभाएं.अगर अन्ना की भीड़ का हिस्सा बनने वालों ने ही स्वयं को जीवन भर एक इमानदार व्यक्ति बनाने का फैसला ले लिया होता तो कुछ तो आसानी हो जाती. हम जिस स्थान पर कार्य करते हैं अगर वहीँ सुधार का बिगुल बजाएं तो सोचिये इसी मंच से जुड़े लोग अपने-अपने स्थान को सुन्दर बना देंगे,अपनी सोच से और हम सब वो कर रहे हैं बगैर संगठन बनाए. एक व्यक्ति जिसने अभी विवाह नहीं किया है और उसकी विवाह की बात चल रही हो वह निर्णय ले की मैं बिना दहेज़ विवाह करूँगा,डॉक्टर यह निर्णय ले की वह कुछ गरीबों की बगैर फीस सेवा करेगा,घर पर बाल मजदूर ना लगाए जाएं,लोगों में आपस में झगड़ा ना हो,लड़कियों को बगैर भेद-भाव के अच्छी शिक्षा दें,ऐसे कितने छोटे-छोटे पहल हैं जो किसी संगठन का हिस्सा बने बगैर हम सब अपनी रोजी रोटी जुगाड़ करने के साथ कर के समाज और व्यवस्था में सुधार ला सकते हैं. जहां पर हम अपनी सेवा दे रहे हैं वहीं पूर्ण सजग इमानदार और कर्त्तव्य निष्ठां बन कर अपनी पारी खेल सकते हैं बाकी भीड़ का हिस्सा बनना कोई सही दिशा नहीं. अरविन्द केजरीवाल जी ने कुछ गरीब बच्चे को आई.ए एस की मुफ्त तैयारी कराई होती तो हमें खुशी होती,किरण जी ने महिलाओं को स्वयं की तरह बनाने का ज़ज्बा भर कर कुछ गरीब लड़कियों को आई.पी.एस की ओरे कदम बढाने में मदद किया होता तो यह कितनी अच्छी बात होती ................. अब बस................. मैं दरअसल राजनीति विषय पर लिखना ही नहीं चाहती. आपका अतिशय धन्यवाद

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आनंद जी बहुत सुन्दर कविता आज इसे अखबार में भी पढ़ा बधाई आपकी नयी सोच ने फिर se मुझे अपने प्रिय मंच पर उपस्थित लेखन शक्ति और सकारात्मक सोच पर गर्व करने की राह दिखा दी. बहुत अच्छा लगा.बस एक पंक्ति से इतेफाक नहीं रख पा रही.आशा है आप मेरे इस व्यक्तिगत सोच से आहत नहीं होंगे और इस प्रतिक्रिया को महज़ एक सोच मानेंगे."इंसान जो बने यहाँ तूफ़ान में बह गए" ऐसा नहीं है इंसानी शक्ति की वज़ह से ही आज भी दुनिया कायम है.ये बात और है कि उन्हें किसी का साथ नहीं मिल पता पर itihas गवाह है कि परिवर्तन का बिगुल इंसानों ने ही बजाया है शैतानों ने नहीं.ve तूफ़ान में bahate नहीं balki apnee shahaadat से itihas rach kar sadaa ke लिए अमर हो जाते हैं. शेष पुरी कविता ज़ज्बों से भरपूर है. बहुत-बहुत बधाई.

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

सर्वप्रथम आपदोनो युगल जोड़ी को हार्दिक आशीर्वाद! कुशवाहा जी के अनुसार एक साहित्यिक बहु आयी है तो हमें आपदोनो के या दोनों के सम्मिलित प्रयास के ब्लॉग पढने को मिलेंगे! दिनेश जी बहुत जल्दी कविता बना लेते हैं और आप भी तो अपनी बात कविता में ही कहते हैं .... पड़ गए झूले सावन ऋतू आयी रे! अरे हाँ, ये प्रश्न पूछता बादल किसने ये छवि बनाई.... क्या ये हमसे नहीं पूछ रहा हम क्यों बरसें ? तुम यों ही तरसते रहो सरिता दीदी से मिन्नतें करते रहो .... जब उनकी मर्जी होगी ... सूखी नदियाँ, सूखे खेत जब आंसू बहायेंगे तभी वे शायद थोड़ी करुणा बरसाएंगे! ..... अभी आइस्कोन और पानी के बोतल से काम चलाइए आपके खेतों में जब धान नहीं होंगे ... संभावित वित्त मंत्री (वर्तमान गृह मंत्री) धान के दाम में एक रुपये की बृद्धि कर देंगे ... किसान खुशी में डूब जायेंगे ... और कर देंगे वोटों की बरसात फिर कैसा सावन और कैसी बरसात!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी,  'अपनी डफली अपना राग' ...........मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ   रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है.......... अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा......अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा.......आत्मवान व्यक्ति respond करता है.....तीन दिन बाद react नहीं........और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो....मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको......चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का..... इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है.....आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है..... इस सब के आलवे......न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है........स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है......हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है.......और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो...... "इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…" जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है......ये किसी और लोक की बात नहीं है........... आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें....की बिना रावण के राम का होना असंभव है.......आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं......ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए.......जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा.......... " इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ" क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा.....अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल..........और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है...........तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है...........क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा........मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है.........ये भिखमंगापन त्यागिए.........!  और अंत मे यही कहूँगा....कि , 'जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा..... और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है............मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा........." (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो.......मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है.........) एक और बात ज़रा मुझे बताइए....जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी......? व्यक्ति का अस्तित्व होता है...समाज का नहीं.....मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे......????

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

मैंने अपने इस आलेख में, कहीं भी नारी जाति को लेकर टिप्पड़ी नहीं की है यदि फिर भी इस पर स्त्री जाति द्वारा इसके विरुद्ध आवाज उठता है तो उनके भवनों का सम्मान करता हूँ और साथ में नारि जाति का भी. अतः इस आलेख के साथ अपना माफीनामा संलगन कर रहा हूँ और पूरी नारी-जाति से इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ. और यदि कोई सजा हो तो वो भी मंजूर परन्तु दूसरों की तरह पोस्ट को हटाकर अपने गुनाहों पर परदा नहीं डाल सकता और ना ही पोस्ट डिलेट करने के बाद , यह कह सकता हूँ कि मुझे किसी बात का पछतावा नहीं है परन्तु दूसरों के कहने पर यह डिलेट कर रहा हूँ. क्योंकि ऐसी महानता मैं नहीं दिखा सकता जिससे गुनाह भी करूँ और खुद को सही साबित करके लोगो की तालिया बिटोरू. साथ ही यह विश्वास दिलाता हूँ कि फिर कभी नारी जाति पर मेरी कोई ऐसी टिप्पड़ी नहीं होगी. हरेक गुनाह के साथ गुनाहगार का माफ़ीनामा होना चाहिए या फिर उसके गुनाहों की एक सजा जो इस बात का उसे याद कराये की उसने गुनाह किया है और साथ ही लोगो को भी पता चले कि वह गुनाह क्या है? अतः मैं अपने गुनाहों पर पर्दा डालकर, इस आलेख को डिलेट नहीं कर सकता. यदि आप सभी के मान-सम्मान और मर्यादा को मुझसे ठेस पहुँच रहा है तो मैं पहिले बोल चूका हूँ कि इस मंच को छोड़कर जाने के लिए तैयार हूँ क्योंकि यदि किसी का मान-सम्मान और मर्यादा खुले आसमान में लटका है तो हवा ( अनिल ) के प्रवाह से उसका हिलना स्वाभाविक सी बात है और वह हमेशा हिलाता ही रहेगा मैं रहूँ या ना रहूँ क्योंकि और भी करक है इस दुनिया में उसे हिलाने के लिए. नोट- कृपया जिस मान-सम्मान और मर्यादा की बात निचे की पंक्तियों में रखा हूँ नारी जाति अपने ऊपर न ले. वह इस मंच के मान-सम्मान और मर्यादा के ऊपर सवाल उठाया हूँ.........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

आनंद जी आपने बहुत सुंदर सन्देश दिया अपनी कविता के माध्यम से .... बस अब बहुत हुआ लेखनी लिखो लेकिन किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं ..क्यूंकि ये वाद विवाद को बढ़ावा देता है .... ये सभी ब्लोग्गर से अनुरोध है कृपया कोई भी व्यक्तिगत रूप में ना ले इसे ... विचारो की लड़ाई तो ठीक है लेकिन जब वो व्यक्ति विशेष पर आ जाये तो फिर विवाद बढ़ते हैं एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगते हैं अभद्र भाषा का प्रयोग भी दिखाई दे जाता है कहीं कहीं पर जो किसी भी व्यक्ति को शोभा नहीं देता है .... इस कविता में भी सिर्फ एक सन्देश दिया गया है तो कृपया इसे सिर्फ एक रचना समझ कर ही ले न की २ दोस्तों की झड़प चाहे वो विचारों की ही क्यूँ ना हो ... धन्यवाद..

के द्वारा: mparveen mparveen

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

pawansrivastava के द्वारा May 15, 2012 I am taken aback seeing people of extraordinary wits & dignity bestowing respect to a man who is not sparing even girl of his daughter’s age from his debolious and mean act . Such a dilemma that a man ravage the modesty of a woman openly in JJ forum and all mere be the spectator. Who will call spade a spade ? मुझे हैरानी भी हो रही है और क्षोभ भी की एक आदमी ओछेपन की हर हदें पार कर रहा है,अपने बेटी के उम्र की लड़की की स्मिता पे चोट दर चोट कर रहा है और तो और मेरा नाम भी जोड़ रहा है एक ऐसी लड़की के साथ जो मेरी छोटी बहन सरीखी है …. और लोग चुप हैं …..ऐसे इन्सान को इज्ज़त नवाज रहे हैं …अब बताइए अपने आलेख और कविताओं के ज़रिये कोई अगर नारी के हक और हुकुक की बात करता है तो उसपे कैसे यकीं किया जाये ..कैसे यकीन किया जाये उसकी कथनी और करनी में भेद नहीं है संभवतः मेरे इस coment को यह महाशय डिलीट कर देंगे ….अगर यह साहब ऐसा करें तो मेरे दोस्तों से मेरी अपील है कि कृपया मेरे इस कमेन्ट को कट पेस्ट कर पुनः यहाँ छाप दें ताकि सच दबाया न जा सके … मैं यह भी देखना चाहूँगा की इस पोस्ट पे कौन क्या कमेन्ट करता है …और फिर उन लोगों से मुत्तालिक अपनी एक राय बनाऊंगा ….जो पत्थर पे लिखे इबारत की तरह हमेशा मेरे साथ रहेगी . Go through following site at related blog.... http://rajkamal.jagranjunction.com/2012/05/15/%E2%80%9C%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%8B/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

म आसान सुविधा होने के कारण जल को पुरे प्रकार से बर्बाद कर रहें है ………भले ही हमें इसका इल्म ना हो और हम अनजाने में ही करते हों पर यह दुखद कार्य हमारे द्वारा ही हो रहा है …….इसके दोषी हम सब हैं ……..और हमें ही जागरूक होना होगा………याद रहे फिर से ‘जल ही जीवन है”……..और आने वाली पीढ़ी के लिए हमें इसे बचाना होगा अन्यथा निश्चय ही जल कोई महायुद्ध करवाएगा …आज मनुज के जज्बातों में, कोई वेदना नहीं है दिखती, अपने हित के आगे उनको, मौलिक संवेदना नहीं है दिखती, खोद – खोद जल की खातिर, पाताल के निचे पहुँच गए हैं, भले गरीबों के बच्चे, आकाल के मुंह तक पहुँच गए है, माना जल ही जीवन है, और उसी लिए तो हम मरते हैं, किंतु इसके संरक्षण की खातिर, कहाँ कभी आहें भरते हैं, हमें भला आजू – बाजू के, दर्द से कोई क्या है लेना, खोदो जितना खोद सको, माल तो केवल हमको देना, उनमें उबाल आ रहा है देखो, ऐसे कृत्य अब क्यों करते हो, लेख तो विषय के साथ पूरा पूरा न्याय करता है किन्तु एक बात मैं समझ नहीं पाया , आप इतने दिनों से कहाँ हैं ! ऐसे लेखों की आवश्यकता आज बहुत ज्यादा है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

दुश्मन प्रवीन जी, आज तक आपकी लगभग ८० प्रतिशत पोस्टिंग आपके ब्लॉग के नाम के विपरीत ही रही है. जिसको ध्यान में रखते हुए आपसे विनम्र निवेदन है कि या तो आप अपना ब्लाग का नाम बदल दीजिये या फिर उसके अनुसार पोस्टिंग किया करिए वरना मुझे आपको समझाने के दुसरे रास्ते उपयोग करना पड़ेगा...... तो आपकी इस पोस्टिंग से सोचा कि थोड़ी बहुत जल की हकीकत की जानकारी लोगो को दुश्मनों के साथ मिलकर हम भी दे दे.... विश्व में उपलब्ध पानी का ९७ % भाग खरा है अर्थात समुद्र का पानी जो उपयोग करने योग्य नहीं है. २ % भाग बर्फ के रूप में ग्लेसियार्स पर जमा हुआ है . १% भाग नदी, कुआ, तलब, और भूमिगत जल है जिसका उपयोग हम पिने के लिए करते है. हमारी लापरवाही की वजह से यह १% भाग धीरे-धीरे कम होता जा रहा है और साथ ही २% हिमखंडों के रूप में जमा हुआ जल भी धीरे वातावरण में गर्मी बढ़ने के कारण दिन पर दिन पिघलकर , समुद्र के खरे पानी में मिलता जा रहा जिससे समुद्र का जा स्टार बढ़ता जा रहा और समुद्र के किनारे बसे शहर धीरे-धीरे इसमें डूबते जा रहे है......आशा करता हूँ क़ि हम सभी अपनी इस बड़ी उपलब्धि से खुद को गौरान्वित महशुस कर रहे होंगे................तो तैयार हो जाइये ख़ुशी के मारे कपडे फार के नंगा नाचने के लिए....अरे सर के ऊपर तो काली माई विराजमान है, इनका तो ध्यान ही नहीं रहा.......भाई कोई नाचेगा नहीं, हम तो मजाक कर रहे थे....अच्छा तो हम चलते हैं .....इ काली मियाँ ख़ुशी भी नहीं मनाने देती है.......!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

स्नेही आनंद जी, नमस्कार, सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया... लेकिन अभी सब कुछ लुट नहीं गया है. आप ने बहुत उचित समय पर बहुत समसामयिक लेख लिखा . वाटर लेवेल अगर नीचे जा रहा है तो ये हमारी जागरूकता की कमी है..मेट्रो सिटीज़ में तो अब बरसाती पानी के रिसाइकिल का उपकरण लगाये बिना मकान बनाने की अनुमति भी नही दी जा रही है.बिहार में सरकारी इंतजाम शायद देर से हो लेकिन व्यक्तिगत रूप से चेतना तो फैलाई ही जा सकती है. हम में से कम ही लोग ये जानते होंगे कि युक्लिप्टस के पेड़ ज़मीन का पानी सोख लेते हैं.विश्वयुद्ध के समय यूरोपियन सैनिक इन पेड़ों को दलदली ज़मीन पर लगाते थे ताकि वो चलने लायक हो जाये.एक साजिश के तहत ये पेड़ अंग्रेजों द्वारा भारतीय धरती पर रोपे गये . देखा गया है कि जहाँ ये पेड़ होते हैं वहाँ कुओं का पानी नीचे जाने लगता है. हमें इन पेड़ों को रोपने से बचना चाहिए... यदि हम अच्छे पर्यावरण के लिए जागरूक रहे, बादलों को आकर्षित करने के लिए अच्छी किस्म के पेड़ लगायें , बरसात के पानी को ठीक से रिसाइकिल करें तो न सरिताएं कभी सूखें और न कभी मुंह मोडें...

के द्वारा: sinsera sinsera

आनंद जी, थोडा सा जल पी लेने के बाद चेतना लौटी है तो मैं आपकी पूरी रचना पढ़ गया! आपकी रचना आगे मेरा भी सर झुक गया! अब मैं जमशेदपुर की बात बताता हूँ! जहाँ जहाँ बने हैं बहुमंजिला फ्लैट. पानी उनके घर में आता है उतना ही लेट! जमीन में वर्षाजल नहीं जा रही है, पक्के सतह से वह बह जा रही है. नदी सरिता को भी हमने कहाँ छोड़ा है, कचड़े कूड़े को डाल उसे भी बार दिया है. अब पानी बहकर चला जाता है या किनारे के घरों में उत्पात मचाता है टाटा प्रबंध ने किया जल का प्रबंधन भी, पर हम वहां करते हैं स्वयम कुप्रबंधन! नल की टोटी को तोड़ देते हैं या उसे खुला ही छोड़ देते हैं लोग पानी ले जाने के लिए कारों में आते हैं, और पानी के लिए पेट्रोल ही जलाते हैं! हम सब है बराबर के दोषी! हमें चाहिए भरपेट से भी ज्यादा, भूखे भले ही रह जाय हमारा ही पड़ोसी! बहुत सुन्दर रचना समयानुकूल! ...... थोडा अपने अन्दर भी झांकना होगा, माँ के गोद में सर रखकर सोचना होगा! संतोष जी और बहुत सारे लोग ऐसा कर रहे है! हमें भी वही करना होगा! बधाई और आभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

.हमें संगठित रहना होगा …….. ‘याद रहे सिर्फ संग रहने वाले ही परिवार के सदस्य नहीं होते”………………’जहाँ प्यार मिले वहीँ जीवन है” हम एक थे एक रहे यही कल्पना होनी चाहिए…सच कथन आइये इस का ध्यान रखें ... सुन्दर विचार आप के आनंद जी ..पोस्ट नहीं हटानी चाहिए हाँ कोई अभद्र फ़ालतू प्रतिक्रिया हो तो हटा सकते हैं विचार तो बहुरंगी आयेंगे तर्क वितर्क होता रहेगा .... त्रुटियाँ होती रहती हैं आइये सुधारते भी रहे थोडा व्याकरण पर ध्यान देंगे तो हिंदी और समृद्ध होगी ... जैसे शीर्षक में थोड़ी दूरी या अर्धविराम ... जे जे हमारा परिवार ——–अब और नहीं-------- हमें आगे बढ़ना है मेरा नैसर्गिक गुण बनता जा रहा है ... विवेक ज़रा रखना ही पड़ेगा ...या होगा ...होता है प्रवीण जी आप के अन्दर भावों का खजाना है आओ इसे निखारते रहें.. भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

आनंद जी,नमस्कार,आपने जो बातें यहाँ की हैं,वो आपके सहृदय होने का परिचायक है,आप हर अड़चन को भूल कर आगे बढ़ने में विश्वास करते हैं,लेकिन मेरा सोचना यह है कि अगर आपका कोई आलेख किसी को आपत्तिजनक लगता हो या उसकी घनघोर आलोचना हुयी हो तो आपको वह रचना हटा नहीं देनी चाहिए,आपका,हमारा काम लेखन करना है,और लेखन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह कि समीक्षाएं होती हैं,लेकिन लेख लेखक के अपने विचार होते हैं,पाठक प्रतिक्रिया देने के लिए स्वतंत्र होते हैं,आलेख मिटा देने से सोच नहीं मिटती है,प्रतिक्रियाओं की वजह से विचलित नहीं होना चाहिए,यह बात आपने बहुत उत्तम कही है की इस मंच पर तमाम लेखकों को एकजुट होकर रहना चाहिए,इस मंच पर कौन क्या कर रहा है,इसको लेकर किसी प्रकार का विद्वेष नहीं रखना चाहिए,हाँ किसी में कुछ सकारात्मक मिले तो अवश्य ग्रहण कर लेना चाहिए,आपका यह आलेख सार्थक लगा.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

आदरणीय दिनेश सर, सादर प्रणाम ना मैं परिस्तिथियों के आगे झुकता हूँ और ना ही समझौता करता हूँ............व्यर्थ की बातों से अवश्य बचने की कोशिश करता हूँ................निश्चय ही इसे व्यक्तिगत लड़ाई नहीं बनाई जानी चाहिए मानवीय सभ्यता के लिए वाद अवश्य जरुरी है किन्तु वाद करने वालों को भी पहचाना जाना चाहिए..............मुझे लगता है की अन्यथा लोगों से वाद नहीं करना चाहिए जो ना समाज को कोई सन्देश दे पाए और ना किसी को सम्मान दे सके उनको भला हम क्या समझायेंगे.............किचर में पत्थर मारने का मतलब ही है खुद को गंदा करना................मैं इसे हार नहीं मानता ..................क्यूंकि मैं लड़ने नहीं आया था...............हाँ यदि अभद्रता बंद नही हुई तो अवस्य इसकी शिकायत करूंगा .............विपरीत परिस्तिथियों से ही निकाल रहा हूँ सब को........सभी ऐसे लोगों का बहिष्कार कर दें बस यह बंद हो जायगा...........और यदि विरोध भी करना है तो जे जे पर कोम्प्ल्लें कर दें............ लड़ाई अपनी बड़ी नहीं हो सकती ना ही कदम पीछे लेने का सवाल है................अपनी ही एक कविता सुनाता हूँ.......................... "जितना तो मूल है, मेरे लिए तो धुल है, मैं चाहता हूँ जीतना पर सर नहीं झुकाउंगा, कदम यदि बढाउंगा तो पीछे फिर ना आउंगा"..............समझना है तो मित्र अनिल को समझाइये ..........................मर्यादा को भूल रहें है थोड़ा ...........मुझे किसी से कोई खेद नहीं .......मेरा उद्देश्य यह सब नहीं...........

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN