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ANAND PRAVIN


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बुजुर्ग (“वो चल रहा”)

Posted On: 13 Feb, 2012  
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Junction Forum कविता जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

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“जनसंख्या वृद्धि” —- तीन विषय

Posted On: 15 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा सोशल इश्यू में

9 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Rajkamal Sharma

मान्यवर प्रवीन जी, सादर ! "जब कोई बातों को सुनता-गुनता है, निश्चित जीवन में वह आगे बढ़ता है ! कभी परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता है कोई, श्रम करनेवाला ही आगे बढ़ता है !!"" . चिंता की क्या बात है ? मन में निराशा नहीं आनी चाहिए. किसी भी कार्य में दक्षता धीरे-धीरे होती है. याद करिए.. "जीत उसी को मिलती है जो गिरा, उठा, फिर दौड़ पडा !" उठिए, जागिये ........ पुनः एक लक्ष्य विन्दु...... हिम्मत मेरी ....... प्रयास आपका ! . "जननी के स्नेही आँचल की बात निराली होती है, पुत्रों को देती ही केवल, कभी नहीं कुछ लेती है ! क्या ममता का मोल चुका पाया है कोई जीवन में, जो उनके सारे संकट अपने हिस्से कर लेती है !!" आगे अब आप ............................................... शुभकामनाएं !!!

के द्वारा: shashibhushan1959

मान्यवर प्रवीन जी, सादर ! आपके बचपने की धूल आपके तेज को धूमिल कर रही है. उत्साह अच्छी चीज है, पर अति-उत्साह अच्छी चीज नहीं है. और अति सर्वत्र वर्जयेत ! आशा है, ध्यान देंगे ! काव्य-रचना के पूर्व रचित किये जाने वाले भावों का पहले अपने अंतर्मन में मनन कीजिये, दिक्कत हो तो गद्य में लिख लीजिये, तब उसे छंदोबद्ध कीजिये ! मैंने जो आपको चार पंक्तिया दी थी, उनमें प्रत्येक पंक्ति में सोलह मात्राएँ हैं. प्रत्येक अक्षर और दीर्घ स्वर एक मात्रा गिनी जाती है. ह्रस्व स्वर शून्य होता है. कु छ तु म ब द लो, कु छ ह म ब द लें. १ १ १ १ १ १ २ १ १ १ १ १ १ २ = १६ इन बातों का ध्यान रखने से काव्य पुष्ट और प्रवाहमय होगा. काव्य का प्रवाहमय होना उसके सौन्दर्य में चार चाँद लगा देता है. "ये याद रहे हम मानव हैं, जो मानवता का मूलक है. क्षण में रूठे, क्षण में माने, जो बालकपन का सूचक है. . नर में ही राम निवास करें, नर में ही रावन भी होता, सज्जन भी होता मानव ही, मानव भी दुर्जन भी होता. . मन निर्मल है, मन चंचल है, हम मन में कुंठा क्यों पालें. कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदले, ये दुनिया चलो बदल डालें ! अभ्यास और परिश्रम - जगत में सर्वोत्तम !! इश्वर आपका मार्ग प्रशस्त करें !

के द्वारा: shashibhushan1959

मान्यवर प्रवीन जी, आज प्रातः कुछ पंक्तियाँ सृजित हुईं. इन पंक्तियों पर मैं स्वयं लिखना चाहता था, पर आपको प्रेषित कर रहा हूँ. आगे बढ़ें .... . "कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलें, ये दुनिया चलो बदल डालें ! सुर मिले सभी का एक साथ, संगीत नया हम रच डालें !!" . रचना में कठिन शब्दों का होना, उसकी उत्कृष्टता की पहचान नहीं होती, बल्कि रचना की मांग होती है ! अतएव कठिन या क्लिष्ट शब्दों की चिंता नहीं करनी चाहिए ! रचना की भावना और प्रवाह, साफ़ पानी के सोते की तरह होनी चाहिए. छल...छल... कल... कल..... ! रुकावट नहीं, विरोधाभास नहीं, ताज़ी शीतल हवा के झोंके की अनुभूति कराने वाला ! छंदोबद्ध तुकान्त रचनाएं ज्यादा प्रभावित करती हैं. टाइप करने के बाद एक बार पूरा पढ़कर भूलों को सुधार लेना चाहिए ! इश्वर आपका मार्ग प्रशस्त करें !!

के द्वारा: shashibhushan1959

तमन्ना जी, नमस्कार सबसे पहले तो आपके द्वारा मेरे मंच पर आने का स्वागत करना चाहूँगा आपकी संकाय निराधार नहीं है और आपकी साड़ी बातों पर हमारी भी दृष्टी बनी हुई है असल में हमारे कहने का अर्थ ये था की हम जो मंच बनाने की हम बाते कर रहें है वो ऐसा नहीं है की सिर्फ एक ही प्रकार की प्रतिभा के लिए होगा जैसा की मैंने लिखा था की इसका नाम "मुरख मंच" नाम होगा सायद आप इसी लिए यह कह रही है तो हम ये नाम बदलने के बारे में सोच चुके है - जो सही होगा सिर्फ वो ही किया जाएगा दूसरी बात हमारा मकसद है की योग्य लेख और कविता को योग्य सम्मान मिले और हमारी कोशिश होगी की हम आगे बढ़ कर अपनी पत्रिका बना सकें ये अभी बहुत दूर की सोच है जिसपर में और ज्यादा नहीं बोलूंगा बस इतना समझ लीजिये की हम एक वेबसाइट बनायेंगे जहां कुछ अच्छे लेख आये इसका ये मतलब नहीं होगा की हम जे जे को छोर दे या इससे ऊपर होने के दावे करने लगे बाकी अभी सभी कुछ करना बाकी है अगर आपके भी दिल में कोई सुझाव हो तो मुझे मेल कर सकतीं है आपके मत अनमोल है कृपया देते रहें धन्यवाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN

नमस्कार भाई आनंदप्रवीण जी, सबसे पहले तो मैं हार्दिक शुभकामनाये देना चाहूँगा आपको जो आपने इस मंच पर अपनी सक्रियता को सार्थकता देने की प्रशंसनीय पहल की और नीचे हमारे मंच के साथियों ने अपने - अपने विचार और सुझाव रखे जिससे आपको अपनी इस अभिनव पहल की दिशा तय करने मैं सहायता मिलेगी ! अब बात करता हूँ अपने विचारों की आपका लेख पढ़कर मैं थोडा सा भ्रमित सा हूँ, की आखिर क्या लिखूं मैं ? मुझे ये लगता है कि सबसे पहले हमें यहाँ ये जानना जरुरी है की इस मंच पर कौन कैसे जुड़ता है और किस उद्देश्य से लिखता है, इस पर मैं अपना खुद का ही उद्देश्य आपको बताता हूँ, मैं यहाँ लगभग डेढ़ - दो वर्ष से लिख रहा हूँ, और इस दौरान मैं कई बार अपनी व्यस्तताओं की वजह से यहाँ से गायब हो जाता हूँ, और मैंने इस मंच से पहले कभी भी कहीं भी कुछ नहीं लिखा था और आज भी लेखन मेरा उद्देश्य नहीं है, फिर मैं क्यूँ लिखता हूँ ? बिना उद्देश्य के ही मैंने इस मंच पर अपना ब्लौग बनाया इसलिए मेरा ब्लौग ALLROUNDER नाम से है मेरे असली नाम से नहीं क्यूंकि जब मैंने यहाँ कुछ पढ़ा तो मेरे मन के अन्दर के दबे हुए लेखक मैं कुछ लिखने की इच्छा जागृत हुई और मैंने यों ही एक कविता लिखकर पोस्ट कर दी जो की सानिया मिर्जा पर थी, उस पर एक कमेन्ट आया जिसने मुझे इतना प्रोत्साहित किया की यार मेरी कविता भी किसी ने पढ़ी बस फिर मैंने इसी विषय पर लगातार २ और कवितायेँ लिख दीं, और लिखता चला गया इस बीच धीरे धीरे मंच के अन्य साथियों से जुड़ाव होता चला गया और उन्ही के प्रोत्साहन से ही आज भी लिखता हूँ क्यूंकि लिखने से मेरे मन को एक अजीब सा सुकून मिलता है, इससे ज्यादा मेरा उद्देश्य लेखन क्षेत्र मैं फिलहाल नहीं है, और मेरे अपने विचार से अपने आप मैं ये अपूर्ण उद्देश्य है, किन्तु इस मंच पर ऐसे बहुत से लेखक हैं जो की लेखन के क्षेत्र मैं अपनी लेखनी से समाज मैं क्रांति लाने का उद्देश्य रखते हैं, और उनमे माद्दा भी है और ऐसे लेखक बेशक आपकी इस मुहिम मैं सक्रियता से भाग ले सकते हैं और अपना यथा संभव योगदान दे सकते हैं, चूँकि आप भी हमारे मंच के साथी हैं और भविष्य मैं कभी आपकी योजना ने साकार रूप लिया और आपने हमें मौका दिया तो हम वहां भी लिखेंगे लेकिन सिर्फ अपने मन के सुकून के लिए ! हमारी हार्दिक शुभकामनाये आपके साथ हैं आपकी पहल को नमन करते हैं !

के द्वारा: allrounder

आनंद जी विचार तो आपका बहुत अच्छा है. लेकिन मेरी व्यक्तिगत सोच आपसे थोड़ी भिन्न है. मेरे लिए इसकी सफलता एरे लिए संदेहजनक है. क्योंकि जागरण का मंच निष्पक्ष है इसीलिए यहां हम बिना किसी समस्या के पक्ष या विपक्ष किसी पर भी अपनी बात रख सकते हैं. जो आगे चलकर एक बहस का मुद्दा बनता है और ब्लॉगिंग का तो अर्थ भी तो अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाना है. बहस के बाद सही चीजें निकलकर आती है. यहां किसी विचारधारा को विशेष या कम महत्व नहीं दिया जाता. लेकिन अगर समान विचारधारा वाले लोग मिलकर अपना एक निजी मंच तैयार करेंगे तो वहां अन्य किसी सोच या विचार को सम्मानजनक स्थान मिल ही नहीं पाएगा. ऐसे में किसी मुद्दे पर ना तो बहस हो पाएगी और ना ही कुछ नया निकलकर आ पाएगा.

के द्वारा: Tamanna

टिम्सी जी, नमस्कार आप ब्लॉग पर आयी अपने कीमती सुझाव दिए इसके लिए हार्दिक आभार आपकी बातें बिलकुल सुलझी हुई है और मैं इसी प्रकार की वार्ता में विस्वास करता हूँ मेरे इस लेख को सभी ने पढ़ा किन्तु मुझे बरे ही अफ्शोश के साथ कहना पड़ रहा है की अर्थ कोई नहीं समझ सका, मेरे लेख का गलत मतलब निकाला जा रहा है सायद लोग मुझे एक बागी के तौर पर ले रहें है जो जे जे से हटना चाहता है और जे जे से खुश नहीं है पर मैं ये स्पष्ट कर दूँ की जे जे ने जो मुझे दिया वो मेरे लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है आप या कोई सायद विश्वास ना करे किन्तु यहाँ आने के बाद लेखनी में एक क्रांतिकारी बदलाव मह्सुश कर रहां हूँ आपने सही कहा की और भी काफी मंच पहले से मौजूद है यहाँ पर, लेकिन मैं एक बात बता दूँ की आगे बढने से पहले अगर पर्तियोगियों से डर लग जाए या उनकी सफलता से पथ डोलने लगे तो फिर बढने का अर्थ ही ख़तम हो जाता है, मैंने पहले ही लिखा है की हम लेखक है और हम कभी निराशावादी नहीं हो सकते मैं एक बदलाव की बात कह रहा हूँ, क्यूंकि हम जो यहाँ लिख रहें है वो अपने आप में बड़ा है किन्तु हम स्वय में संगठित नहीं है मैं अपनों का संगठन बनाना चाहता हूँ जो की अपने मंच पर लिखे और हम उस मंच को तोड़ा पोपुलर बना कर अपना एक साप्ताहिक पत्रिका निकाल सकें आप सोचिये की क्या हमारे पास लेखकों की कोई कमी है या उस पत्रिका के बारे में सोचिये जिसमें हमारे प्रख्यात लेखक गन अपना लेख लिखंगे यदी एक आम आदमी वो पत्रिका पढ़ ले तो क्या वो उसे इग्नोर कर सकेगा मेरे ख्याल से नहीं इससे हम जो आज यहाँ सिर्फ अपनों के बिच लिख रहें है वो आम जन के बिच भी आयेंगे यही मेरा सपना कहिये या सोच कहिये है आपने बिलकुल सही कहा की किसी चीज को बनाने के लिए दो चीजें होनी चाहिए वो है योजना और संगठन योजना का प्रारूप मेरे दिमाग में है किन्तु संगटन नहीं बन पा रहा क्यूंकि मैं सायद यहाँ अपनी बातों को रखने में विफल रहा हूँ मुझे सहयोग की आव्य्सक्ता थी और है किन्तु यहाँ सभी लोग आयें सहयोग का वादा कर चले गएँ उन्होंने मुझसे मेरी योगना के बारे में भी नहीं पूछा इस बात का मुझे दुःख है, मैंने अपना मेल इस लिए नहीं दिया था की लोग उसे पढ़े बल्कि इस लिए दिया था की वो जो भी जानते है इस सम्बन्ध में उसे मुझसे बांटे पर अभी तक कोई खुल कर नहीं आया पर फिर भी योजना है तो उसे पूरा करने की कोशश भी अवस्य करूंगा अंत में एक निरासा भरी लाइन कहना चाहूँगा की "मैं चला अकेला, मैं ही गुरु मैं ही चेला"

के द्वारा: ANAND PRAVIN

आनंद भाई, मै संतोष जी की बात से सहमत हू. यहाँ और किसी चीज़ की कमी नहीं है, न अच्छे लेख की और न ही जागरण के 'Presentation' की. सिर्फ कमी है पढको की, जितने हिट्स मेरी कविताओ पर होते हिं, उनका रिपोर्ट जागरण पर दीखता है, उससे ज्यादा हिट्स मेरी 'stand alone' ब्लॉग पर होते हैं. हो सकता है face बुक के कारन. तो निश्चित तौर पर पढको की कमी है. मैंने देखा की नवभारत times के ब्लॉग की कोई दूसरी साईट नहीं है, आप सीधे वहां जाइए और वाही पर ब्लोग्स की लिस्ट रहती है. इस प्रकार वहां पर ज्यादा लोग ब्लोग्स देख पते हैं. इसलिए जब मै वहां पोस्ट करता हू, तो यहाँ से बहुत जादा हिट्स आते हैं, तो मेरी एक सविनय माग है, जागरण से की वि भी एक छोटा सा लिंक दे अपनी मैं वेब साईट पर. बाकि तो ये उनकी मर्जी है की कितना कर पाएंगे. एक बात और है, अगर जागरण जैसे प्रसिद्द मंच पर लोग नहीं आ rahe हैं पढ़ने के लिए, तो फिर हमारी साईट पर कितन लोग आएंगे. भूल चूक माफ़ करें. आभार.

के द्वारा: Rakesh

आदरणीय ब्लागरों को सादर प्रणाम ,... मेरी एक बात से भाई आनंदप्रवीण जी के दिमाग में इस विचार का जन्म हुआ है ,.मेरी(और शायद उनकी भी ) शिकायत सिर्फ इतनी थी कि यहाँ पाठक कम हैं और तमाम अच्छे लेखों को हम खुद भी नहीं पढ़ पाते हैं .. आ रही समस्याओं के सम्बन्ध में कई ब्लागर आवाज उठाते रहे हैं,...स्टारों का महत्वहीन होना और सार्थक आलोचना की कमी भी खलती है ! ..जागरण का यह मंच एक विश्वविद्यालय जैसा है ,..जहाँ से जीवन भर सार्थक शिक्षा ग्रहण की जा सकती है !!....हम सौभाग्यशाली हैं कि इस मंच पर सभी का अपार स्नेह मिलता है और विश्वास है कि सदैव मिलता रहेगा ..इसे छोड़ने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है ,. .वेबसाईट बनाने के लिए मेरी हामी सिर्फ इसलिए है कि जिन अच्छे लेखकों को यहाँ पाठक कम मिलते हैं ..उनके लिए पाठक जुटाना ,..हालांकि पाठक तो समाज से ही आयेंगे और वहीं पर कमी है ,.लेकिन हम उसके लिए अन्य विकल्पं(प्रचार) को आजमा सकते हैं ... .काल्पनिक मंच को मैं पूरक के तौर पर देखता हूँ ,.अभी सिर्फ विचार है ,.सबकुछ किया जाना शेष है ! ,..जो आप सभी के सहयोग और आशीर्वाद के संभव नहीं है ,.सबसे मिली सकारात्मक प्रतिक्रियाओं से निश्चित ही उत्साह बढ़ा है,..यदि सबकुछ सही रफ़्तार से हो तो भी इस काम में छह महीने तक लग सकते हैं !... अभी मैं अपना सारा ध्यान सिर्फ लिखने पर लगाना चाहता हूँ ,. आप सभी की शुभकामनाओ और समर्थन के लिए ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ ,.

के द्वारा: Santosh Kumar

आपके ये जोशीले शब्द पढ़े. पढकर बहुत प्रसन्नता हुई. क्योंकि डगमग भविष्य को लेकर सशंकित हो कमोबेश हर एक ही होता है. पर उस भय-उथल-पुथल को दूर करने का उपाय सोचना हर-एक के बस की बात नहीं होती है. जितनी दुनिया मैंने देखी है, उसने यही सिखाया है, की कोई भी बड़ा कार्य करने में दो बातें अहम हैं.. १. योजना २.संगठन दोनों में से किसी भी एक की कमी पूर्णता नहीं आने देगी. इसलिए, कोई भी कठिन कदम उठाने से पहले पूरी तरह योजनाबद्ध हों. वैसे तो आप जानते ही होंगे. पर फिर भी, बता दूं, की जिस प्रकार की वेबसाईट का ज़िक्र आपके द्वारा हुआ है, उस प्रकार की कुछ-एक साइट्स पहले भी कार्य कर रही हैं. उन्हें जाँचकर आप अपनी दिशा तय कर सकते हैं. पुन:, इस मंच को भी बहुत सारा सम्मान देना चाहिए. क्योंकि बड़ी ही विचित्र बात है, की यहाँ इतना समय बिताने के बाद, आज तक मुझे कोई विरोधाभास नहीं दिखा. यहाँ उपस्थित सब लोग एक ही दिशा में बढना चाहते हैं. पर किसी ने दूसरे को कभी कमतर नहीं आँका. पूरे मन से सराहना की, बढ़ावा दिया. इस एक मंच पर इन सब प्रतिभासम्पन्न लोगों से मिलने का जो गौरव प्राप्त हुआ है, वह शायद कहीं और सम्भव न होता. इसलिए, इस मंच हेतु मन में सदा ही बहुत सम्मान है. अंत में, फिर से आपके इस क्रांतिकारी कदम को सराहने की तीव्र इच्छा है. प्रयास कीजिये. सफलता तो परितोष-भर होता है. मनुष्य का अधिकार-क्षेत्र तो केवल कर्म पर ही होता है. मेरी ओर से सदा ही शुभ-कामनाएँ. और किसी प्रकार सहयोगी हो सकूँ, तो प्रसन्नता होगी. सादर.
दिनेश जी,प्रणाम सबसे पहले आपको बधाई देना चाहूँगा की अंततः आपका फोटो अपलोड हो गया अपने जे जे से जो काव्य अंदाज में अपनी सिकायत दर्ज की थी वो काफी मजेदार लगी थी मुझे दूसरी बात सच कहूंगा सर, की आपके पोस्ट पढने से पता नहीं चलता था की आप की उम्र इतनी होगी क्यूंकि जैसे आपके मजेदार लेख होते है लगता था की कोई हमारे उम्र का ही व्यक्ति मजे में कविते लिख रहा है जैसे की "दोहे" और अभी का "बहस" किन्तु अब से आपको भी सर ही कहना पडेगा वरना में मित्र बना लेने वाला था इसके लिए माफ़ी चाहूँगा अब जहाँ तक बात है मेरे पोस्ट की तो आपकी सलाह स्वभाविक है पर यकीं मानिए सर की मेरा किसी को भी ठेस पहुंचाने की नियत नहीं रहती मैंने कुछ शब्द तोड़े करे चुने है पर में स्वभाव में नम्र व्यक्ति हूँ आप इसे मेरी बाल उम्र जान क्षमा कर दीजिएगा आप मेरे साथ है फिर डरने की क्या बात है, मेरी नाराजगी का तो प्रश्न ही नहीं उठता है, नाराज होने का आपको अधिकार है मैं तो रूठ सकता हूँ पर आप जैसे यसस्वी लोगों से भला मैं क्यूँ रूठने लगा ये मेरी अल्प बुद्धिमता ही कहलाएगी आपके बोल अनमोल है उसे हमारे लक्ष्य में योगदान देने की आशा रखूंगा

के द्वारा: ANAND PRAVIN

जवाहर सर, सादर प्रणाम आपकी कामना की कामना तो हम भी करेंगे और आपसे सहयोग की अपेक्षा भी है संतोष भाई ने अपने विचारों को रखा है और मैं उसे सिर्फ दिशा देने में लगा हुआ हूँ सर, जे जे की किसी भी प्रकार से मैंने अवहेलना करने की कोशिश नहीं की है और मैं इसे निचे भी दर्शा चुका हूँ जे जे एक स्वभाविक स्थल है जहां हम टिके हुए है इसलिए उनका विरोध करने का तो सवाल ही नहीं उठता है मैं जानता हूँ की आप कभी हमारे उत्साह को नहीं गिरने देंगे, बहुत लोगों को लग रहा होगा की सायद में जोश में आ कर ये कर रहां हूँ किन्तु मैं आपको बताना चाहता हूँ एक अभिभावक होने के नाते की मैं इस क्षेत्र में आगे बढ़ चुका हूँ और हमें कामयाबी भी मिल रही है पर आगे देखना है की हम अपने सोच को कितना दिशा दे पातें है आपकी सोच और राय बहुमूल्य है हमारे लिए उसे देते रहिये आपका आभारी रहूंगा

के द्वारा: ANAND PRAVIN

आदरणीय गुरु जी, प्रणाम सबसे पहले तो आपकी और से में सभी से जिन्होंने आपका यह कमेन्ट पढ़ा है माफ़ी मांगना चाहूँगा क्यूंकि आप यहाँ अपने को कुएं का मेंडक बता रहें है - सर यदि आप कुएं में है तो हम तो है ही नहीं, फिर कुएं में ही सही आप जल के साथ तो है, और हम अभी तक जल के लिए ही भटक रहें है ......................भगवान् मुझे भी उसी कुएं में गिराए जिसमें आप है...........हा हा हा दूसरी बात आपने निश्चित तौर पर उन प्रश्नों को उठाया है जो उठने चाहियें थे, किन्तु मैं इनका जबाब देने में असमर्थ हूँ ये आपको अनुभवी लोग ही बता सकेंगे उनमें से आप भी एक है इनका उतार तो आपको देना है हमें ताकि हम भी जान सकें, किन्तु मेरी राय है की आज जो सुभिदायें जे जे हमें के रही है वो अपने आप में ना सिर्फ प्रसंसा के योग्य है बल्कि आजीवन हमें उनका अहसानमंद होना चाहिए किन्तु वो हमारी प्रथम पाठशाला है और अब हम जो बात कर रहें है वो है नए मुकाम बनाने की कोशिश करने से ही कुछ हो सकता है सायद हम कामयाब हो

के द्वारा: ANAND PRAVIN

प्रिय आनंद जी, मैने आपके आलेख और इस मंच के सम्मानित सदस्यों की राय पढ़ी.बहुत ही अच्छे और नेक इरादें हैं आपके.मेरा सहयोग हमेशा आपके साथ रहेगा.मैं कुछ और बातों को स्पष्ट करना चाहता हूँ. मैं तकरीबन दो महीने पहले इस मंच से जुड़ा हूँ. ब्लॉग पढ़ने और लिखने में मेरी दिलचस्पी दैनिक हिंदुस्तान में रवीश कुमार के नियमित रूप से प्रकाशित लेख 'ब्लॉग की दुनियां' पढ़ने से हुई. अब दैनिक हिंदुस्तान में नियमित रूप से 'साइबर संसार' कौलम के अंतर्गत विभिन्न लेखकों का ब्लॉग प्रकाशित होता है,चाहे वे किसी भी साईट पर क्यों न हों.यह कौलम कम से कम 25 -30 पंक्तियों का जरूर होता है.इसकी तुलना में दैनिक जागरण कें 'जागरण जंक्शन' में 5 -6 पंक्तियाँ होती हैं.इतने छोटे स्वरूप में प्रकाशित होने से अक्सर पाठकों का ध्यान नहीं जाता.फिर अपने देश में इंटरनेट उपयोगकर्ता ही कितने हैं जो अख़बार में संक्षिप्त ब्लॉग पढ़ने के बाद नेट पर पूरा ब्लॉग पढ़ें.सिर्फ ब्लॉग लिखने और पढ़ने वालों को ही इसके बारे में पता होता है. इसलिए 'जागरण जंक्शन' का आकर बढ़ाया जाना चाहिए. आभार सहित, .......राजीव

के द्वारा: RAJEEV KUMAR JHA

आगे बढ़ने वाले के साथ तो भगवान भी हो लेता है अभिमन्यु ! इस मनुष्य की तो प्रवृत्ति ही है कि वह हर काम के लिये एक अदद अगुआ की तलाश में रहता है, जिसके पीछे-पीछे वह चल सके । अगुआ अर्थात नेतृत्व के बिना तो शादियाँ तक सम्पन्न नहीं हो पातीं । शुरुआती आलोचनाओं से ही घबरा जाओगे, तो आगे का मार्ग तो वैसे भी कंटकाकीर्ण दिखाई देगा, जैसा कि हर शुरुआत के समय दिखाई देता है । अर्जुन हो या पुत्र अभिमन्यु, कुछ कर गुजरने का माद्दा रखने वाले योद्धा को सिर्फ़ मत्स्य के चक्षु नज़र आने चाहिये, शेष अंग नहीं -- वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो । सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो, तुम निडर हटो नहीं, तुम निडर डटो वहीं, वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो ॥ … समझे कि नहीं ?

के द्वारा: आर. एन. शाही

आदरणीय शाही जी, सादर प्रणाम सर्व प्रथम मेरे ब्लॉग पर आपका आगमन हुआ जिससे एक ऊर्जा मिली है आपने आगे बढ़ने का आशीर्वाद दे दिया तो हम तो बढ़ेंगे ही, और पूरी सकारात्मक ऊर्जा के साथ बढेंगे पर मैं यहाँ एक बात रखना चाहूँगा की मेरी व्यक्तिगत राय है की मैंने सर जे जे पर किसी प्रकार का आरोप नहीं लगाया है, जे जे ने हमें मंच दिया और हम अहसान फरामोश नहीं हो सकते मेरे कहने का अर्थ सिर्फ इतना था की अब जे जे जो की मने लिखा हमें ढो नहीं पा रहा है, इसका मतलब है की ज्यादा संख्या होने के कारण उनका आच्छी चीजों पर ध्यान कम जा रहा है मैं अच्छी लिखों का पछधर हूँ ना की बेकार की लेखों का हो सकता है मेरे लेख में भी दम नजर ना आये तो उससे भी आगे जाने का अधिकार नहीं, दूसरी बात युवा हूँ थोड़ा गलती नहीं करूंगा तो फिर आपसे माफ़ी कैसे मांगूंगा आखिर है तो हम इन्शान ही अपने आसिर्वादों को बनाय रखियेगा हम बढ़ रहें है

के द्वारा: ANAND PRAVIN

आनन्द जी नमस्कार,   आपके विचार निश्चित ही उच्चस्तरीय हैं, किन्तु नम्रता इन विचारों का सम्माननीय सिंहासन पर आसीन कर देगी।   इसमें कोई संदेह ही आपमें प्रकृति प्रदत लेखन कला है। इसमें यदि सहन शक्ति का समावेश करें, तो इसकी महक अधिक समय रहेगी एवं अधिक दूर तक जायेगी।     सराहना हमारी प्रगति का मार्ग निर्माण करती है, किन्तु आलोचना उस मार्ग को सशक्त बनाती है।   प्रतिभा में सही निखार सार्थक आलोचना से आती है। जहाँ तक मेरी सोच एवं मेरा अल्प ज्ञान है कि मित्र से अधिक सहायक शत्रु होते हैं। यदि आपको मेरी कोई बात अनचित लगे, तो उसके लिये बिना देरी किये माफी माँग रहा हूँ। मैं सलाह देने के रोग से ग्रसित होकर यह सब लिख रहा हूँ। मुझे यह असाध्य बीमारी विगत कई वर्षों से है। मैं आपसे उम्र में बड़ा हो सकता हूँ किन्तु अक्ल में अभी बच्चा ही हूँ और बच्चा ही बनकर रहना चाहता हूँ।    आपके विचारों से सहमति होने के कारण आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि आपनी आलोचना को हृदय से स्वीकार किया करें। क्योंकि मेरा मानना है कि इस संसार में कुछ भी पूर्ण नहीं है। फिर हमारा लिखा हुआ परिपूर्ण कैसे हो सकता है।    मैं देश हित के हर कदम में आपके साथ हूँ। किन्तु मेरा दृष्टिकोण समालोचक है। अतः आपकी नाराजगी से डर लगता है।

के द्वारा: dineshaastik

आनंद प्रवीन जी, सादर अभिवादन! आपका और संतोष जी का प्रयास सफल हो यही कामना करता हूँ. मैंने भी सभी आदरणीय श्रेष्ठजनों की सम्मति पढी है. आपको सबका सहयोग और आशीर्वाद प्राप्त है. संतोष जी भी मंजे हुए मिहनती ब्यक्ति हैं. हमसबका भी सहयोग आपको मिलता रहेगा....... वैसे यह जागरण मंच भी काफी लोगों को जोड़े रखने में सफलतापूर्वक काम कर रहा है. इस मंच के ज्यादातर (लगभग सभी) लोग एक दुसरे की इज्जत करते हैं और अगर किसी विचार से असहमत भी होते हैं तो असहमति जताने में भी शालीनता का ख्याल रखते हैं. यह मेरा विचार है. प्रतिक्रिया नहीं देने का मतलब यह नहीं होता है कि वह ब्लॉग किसी के द्वारा पढ़ा नहीं गया. अगर शीर्षक रोचक(पसंदीदा) हो तो लोग अवश्य पढ़ते हैं. अंत में आपके उत्साह में मैं कहीं से भी अवरोध नहीं लगा रहा हूँ वरन सहयोग का पूरा पूरा भरोसा दिलाता हूँ. सादर साभार! - जवाहर.

के द्वारा: jlsingh

प्रिय आनंद प्रवीन जी ..... सप्रेम नमस्कारम ! सबसे पहले तो मैं अपने खुद के बारे में कहना चाहूँगा की मैं एक कुएं का मेंढक हूँ हालात का मारा हुआ अगर आप सभी से कुछ हंस बोल लेता हूँ तो इसका ,तलब यह नहीं की मैं वास्तव में ही आपसे अलग हूँ .... हो सकता है की मैं एक आम आदमी से भी कमतर होऊं ...... मैंने जब से इस मंच को ज्वाइन किया है तभी से मेरे मन में दो बाते रह रह कर उठती रहती है :- *हमारे लेख को चाहे कितना भी समर्थन क्यों ना मिल जाए क्या कभी वोह कुछ बदलाव लाने + उसका धरातल बनाने में सहायक और कारगर भूमिका निभा सकता है ?..... *यहाँ पर लिखे हुए का सरकार या किसी भी स्तम्भ पर कुछ असर होता है ? *अगर नहीं तो फिर हम यहाँ पर किस लिए अपना वक्त और उर्जा जाया कर रहे है ?.... *अगर हम अपना समय यहाँ पर नहीं देते तो क्या हम कुछ सकारात्मक रच सकते थे - कदापि नहीं ?..... *जागरण किस लिए वेतन पर हमारे ब्लागों की जांच के लिए सम्पादकों का पूरा बेड़ा रखे हुए है ...... वोह दिन रात किस आशा में किसके लिए इतनी मेहनत कर रहे है ..... फिर भी हम य्फा कदा उनसे और उनकी नीतियो से नाराज रहते है .....क्या उनको नहीं दिखाई पड़ रहा की अढ़ाई साल की इस बेहद खर्चीली और मेहनत भरी कवायद से उन्होंने आज तक कुछ भी हांसिल नहीं किया ?... मैंने निचे सभी के कमेन्ट और आप के तथा संतोष जी के जवाब भी पढ़े है और इस नतीजे पर पहुंचा हूँ की अब जब ठान ही लिया है और निकल ही पड़े हो इस "अग्निपथ" पर तो बाकि लोगों की तरह मुझको भी बेहद उत्सुकता के साथ इंतज़ार है आपके "जन चेतना मंच" का मैं इसकी अभी से सफलता की उम्मीद करता हूँ और यह आशा करता हूँ की आप निष्पक्षता से बिना किसी से लगाव रखते हुए सभी के प्रति एक समान भाव रखते हुए अपने पथ पर बढ़ते हुए सामूहिक उद्धेश्यों को सम्मिलित प्रयासों से प्राप्त कर ही लेंगे ...... निष्पक्षता ही एकमात्र इसकी सफलता की कसौटी और गारंटी है इसको हमेशा ही याद रखना कभी भी किसी को भी आपकी किसी बात और कार्य से आप पर कोई शक नहीं होना चाहिए आप सभी के सभी के लिए एक समान बन कर रहे तो सफलता निरंतर आपके कदम चूमेगी ही चूमेगी विजयी भाव बाबा रामकमल देव शर्मा का आशीर्वाद है आपके साथ

के द्वारा: Rajkamal Sharma

आज़ादहिन्द फ़ौज़ के सरगना महापुरुष सुभाष चन्द्र बोस ने कभी कहा था कि, दुनिया में बात-चीत से किसी समस्या का आजतक कोई समाधान नहीं निकल पाया है । अर्थात, जो करना है, कर गुज़रो, बातें बनाने से कोई फ़ायदा नहीं । व्यवहार जगत काल्पनिक दुनिया से बिल्कुल भिन्न होता है । 'मैं चला था अकेला ज़ानिबे मंज़िल मगर, लोग आते गए और कारवाँ बनता गया' के सिद्धान्त को अपनाते हुए जब भी कोई अच्छी और अनुकरणीय योजना बनाकर धरातल पर लाओगे, तो तुम्हारी अपनी ही उक्ति 'मैं भीख नहीं मांगूंगा, मुझे आवश्यकता नहीं है इसकी' स्वत: उसके साथ चिपक जाएगी, और आगे का मार्ग युवा बुलन्द हौसले खुद ब खुद प्रशस्त करेंगे । युवाओं की खासियत ही यही होती है कि वे बातें कम, और क्रियाशीलता पर अधिक भरोसा करते हैं । जागरण-जंक्शन ने पहले साइट बनाकर मुहैया कराया, तभी तो सभी लोग पूरे ठाठ से इसे मूरख मंच बनाए हुए हैं ? यदि आप युवाओं के बनाए हुए साइट-मंच की नीतियों और सुविधाओं में दम होगा, तो फ़्री के लेखक खोजने नहीं पड़ते । एक ढूंढो, तो हज़ार मिलते हैं । मुझ बुढ़ऊ की भी शुभकामनाएँ हमेशा आपके साथ रहेंगी । साधुवाद !

के द्वारा: आर. एन. शाही

संतोष भाई,नमस्कार आपने कहा मैंने सूना और लोगों को सुनाया बस उम्मीद है की लोग हमसे जुड़े और अब हमें ये देखना है की कैसे जुड़े हमारी पहली पहल तो वेबसाइट लौंच करने की ही होगी और वो भी बंधिया ना की साधारण थोड़ा वक़्त अवस्य लगेगा किन्तु मैं लोगो की संपर्क में हूँ इस मंच से भी यही आवाहन है की लोग इस विषय मैं जितना अधिक जानते हो बांटे किन्तु अभी लोग ठीक से नहीं जुरें है उम्मीद है की आगे अवस्य जुड़ेंगे मंजिल तो दूर ही है, पर हमारे हौसले बुलंद है आप बार - बार नाम को बदलने की बात क्यूँ करते है क्या मुरख मंच हमारा नहीं है फिर वो एक योग्य नाम है जो काफी जंचता भी है बस इन्तजार तोड़ा आपका प्रिय अनुज

के द्वारा: ANAND PRAVIN

आदरणीय सर शशिभूषण जी, प्रणाम मैंने आपकी बातों को पढ़ा और काफी दुख हुआ की मैंने अनजाने में ही सही पर आपजैसे आदरनिये लोगों का निरादर किया, ये क्षमा यौग्य बात तो नहीं है किन्तु आप बड़े है क्षमा मांगते हुए उम्मीद करता हूँ की आप इसे बाल-अल्प विकाश जान कर भुला देंगे, मैंने अपने ब्लॉग को सुधार लिया है स्वीकार करने वाली बात बस दिल की बात है मेरे कहने का अर्थ यह था की एक लेखक क्या चाहता है इसका ये अर्थ कतई नहीं की लोग उसे स्वीकार ही करें जे जे अपने आप में महान है क्यूंकि उन्होंने हमें मंच दिया है ................................................................................................................................................. आदरणीय सर आपकी बातों को ना माने जाने का सवाल ही नहीं है आप वरिष्ट है अनुभव में हमारा कर्तव्य है की हम आपसे कुछ सीखें तथा आपका कर्तव्य है की आप हमें सिखाये तभी तो इक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में विचारों का आगमन होगा और आप हमारे साथ है ये ही अपने आप में एक सार्थक शुरुआत है बड़ों को आदेश दिया नहीं लिया जाता है आपके सहयोग के बिना कुछ भी मुमकिन नहीं बस आशीर्वाद बनाय रखें आपका प्रिय

के द्वारा: ANAND PRAVIN

आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम सर उधाहरण मैंने कुछ लोगों का दिया था क्यूंकि ज्यादा देना नीरस लगता पर मैंने उनकी तुलना नहीं की है आपने भी कुछ लोगों का नाम लिखा है पर मैंने अपने लेख में साफ़ - साफ़ लिख दिया है की “अभी और है प्रकाश के स्तंभ इस क्षेत्र में, जो दिख रहें है वो तो इसके सूद के सामान है” आप को मैं किसी से कम नहीं आंक सकता क्यूंकि आप सभी मेरे आदर्श है सच पूछिए तो मैं उदाहरण नहीं लिखना चाह रहा था पर बस लिख दिया खैर जो भी हो यहाँ प्रकासमय लोगों की कोई कमी नहीं है आगे मैं लिखना चाहूँगा की हम कुछ कर सकें या नहीं कोशिश अवस्य करेंगे, क्यूंकि कोशिश से ही हम कुछ कर सकतें है पीछे कुछ लोगों ने क्या किया मैं उस पर नहीं जाना चाहूँगा, पर इतना तो तय है की यदि कोशिश सकारात्मक होगी तभी मंजिल आएगी पर सर मैंने ये लेख बस लिखने के लिए नहीं लिखा है मुझे आप लोगों का मार्गदर्शन चाहिए जिसके बारे में आपने कुछ नहीं लिखा इसका मुझे खेद है आप इस मंच के प्रतिष्ठित जनों में से है तो आप आशीर्वाद देने से नहीं बच सकते

के द्वारा: ANAND PRAVIN

प्रिय आनंदप्रवीण भाई ,.सस्नेह नमस्कार आपकी सजग आधुनिक सोच और जज्बे को मेरा सलाम है ,..कुछ भी असंभव नहीं है ,.लेखकों का दयित्व है जनचेतना लाना जो शायद इस मंच के माध्यम से पूरी नहीं हो रही है ,..कम कमेन्ट अच्छे लेखकों को निरुत्साहित तो करते ही हैं ,.असल बात है कमेन्ट के द्वारा पाठकों का बढ़ना ,.क्योंकि जो ज्यादा चर्चित में जाता है उसे पाठक आसानी से मिलते हैं ,...जे जे को हम सलाम करते हैं कि उन्होंने हमें एक व्यापक मंच प्रदान किया लेकिन इसकी सीमित पहुँच हमें कमजोर कर रही है ,.. ..हमसब मिलकर एक व्यापक मंच बनायेंगे ,....मुझे पूरा यकीन है कि हम सब मिलकर एकसाथ लड़ेंगे तो कोई कारण नहीं कि जनचेतना ना ला सकें ..इसके लिए हम सबकुछ करने को तैयार हूँ ,..आप जल्दी वेबसाईट बनाये और मेरा मानना है कि उसका नाम जनमंच होना चाहिए ,..मूरखमंच को जनमंच का अंग होना चाहिए ,..शेष आपकी और सभी लेखकों की इच्छा पर है !....पत्रिका छापने के लिए हमें अपने सबका सहयोग अवश्य चाहिए और निश्चित ही मिलेगा ,..मैं खुद पत्रिका के लिए पूरा समय दूंगा ,.आवश्यकता हुई तो हम यात्राएं करेंगे ,..पूरे देश में घूमेंगे और वैचारिक क्रान्ति को कम्पूटर की स्क्रीन से निकालकर जनमानस में भर देंगे !..... मंजिल मिल ही जायेगी ..भटककर ही सही| गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं || बहुत बहुत शुभकामनाओ के साथ ,..वंदेमातरम!...भारतमाता की जय !!

के द्वारा: Santosh Kumar

अलीन जी,नमस्कार जी कवी तो हम भी नहीं और है भी ये आपकी ऊँची सोच है जो अपने बारे मैं कहने से आपको रोक रही है अन्यथा आप में कौन से गुण नहीं है कमेन्ट युद्ध की बात को ज्यादा तुल नहीं देना चाहता क्यूंकि ये अच्छा भी है और बुरा भी जहां तक आपकी मंच में साझेदारी की बात है तो आपकी भाषा मुझे अच्छी नहीं लगी आप क्या बोल रहें है की मैं आपको इस मंच के लायक समझूँ ............................. मैं कौन होता हूँ ............अभी मंच की बात ही चल रही है और आप इस मंच को मेरा बता रहें है .............याद रखिये ये हमारा मंच है और यहाँ सब एक है .......हो सकता है की सोच मेरी हो पर इसे आगे हम सब को ले जाना होगा ...................हो सकता है की मैं वो गुण ना दिखा पाऊं पर आपमें वो गुण है और लोगों में भी है ........हम मिलकर बढ़ेंगे हमें बढना होगा ........मैंने पहले भी कहाँ है की ज़रा सोचिये ........नए विचारों को लाइए .............मेरे इस बात को कितना लोग सम्झ्पायेंगे इस बात की मुझे परवाह नहीं क्यूंकि हम जितने भी होंगे सकारात्मक होंगे...........आगे भी अपनी राय देते रहिएगा अभी से आपका मित्र आनंद

के द्वारा: ANAND PRAVIN

आदरणीय भ्रमर जी, प्रणाम सबसे पहले तो माफ़ी मांगना चाहूँगा आप से और समस्त लोगों से जिनका नाम मैंने इसमें बिना आदरसूचक शब्द के ही डाल दिया...........................हो सके तो छमा कर दीजिएगा फिर अपनी बातों को आगे बढाते हुए मैं ये कहना चाहूँगा की मैं कुछ करने की और ध्यान देना चाहता हूँ, और संतोष भाई ने मुझे एक सुझाव दिया था जिसे मैं आगे ले जा रहा हूँ मैंने ये लेख सिर्फ इस लिए लिखा है की हमारी प्रतिभा जो सायद हममें है को हम खुल कर बाहर निकाल सकें और इसकी पहली कड़ी के तौर पर मैंने अपने लेख को लिखा है, मुझे हर उन व्यक्ति की तलाश है जो मेरी मदत इस कार्य में कर सकें चाहे किसी भी प्रकार से ना भी करे पर मौखिक सहयोग दे बाकी हम मंच अवस्य बनायेंगे वक़्त तो लगेगा पर यह संभव है बस सही टीम का गठन हो जाए आप लोगों का आशीर्वाद जरुरी है जय हिंद

के द्वारा: ANAND PRAVIN

मान्यवर आनंद जी, सादर ! बात आपकी विचारणीय है, पर कोई भी बात जब आप सार्वजनिक रूप से कह रहें हों तो नम्रता के अनुशासन में रहकर करनी चाहिए. ""हम चाह रखते है कि हम जो लिखें उसे लोग समझे स्वीकार करें, "" समझें तो ठीक है पर स्वीकार करें, यह कहना आपका उचित नहीं. """"ज़रा पढो , “वाहिद काशिवाशी” और “भ्रमर” कि कविताओं को ज़रा पढो “निशा मित्तल”, “जवाहर सिंह” और “कृष्णश्री” के लेखों को और देखो फिर सोचो कि क्या अखबारों या पत्रिकाओं में आने वाले लेखों से कमतर भी है ये """ आप ऐसा भी लिख सकते थे................ "ज़रा पढ़िये, "ज़रा सोचिये" ...... हमेशा आदरसूचक शब्दों का प्रयोग ही बेहतर होता है. सभी पाठक हमसे बड़े हैं, बुद्धिमान हैं, समझदार हैं, ऐसा सोच कर लिखना चाहिए. ""जे जे ने हमें एक मंच दिया पर वो हमें ढो नहीं पा रहा"" ऐसा कहने के हम आधिकारी नहीं हैं. न इसपर कोई दावा है. प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती. पीढ़ा रखकर ऊंचा वक्ती तौर पर हुआ जा सकता है, वह हमेशा आपके काम नहीं आयेगा. प्रेम, भरोसा और मन की प्रफुल्लता हमारे सबसे बड़े सहयोगी हैं. बिना वेतन चौबीस घंटे हमारे साथ रह सकते हैं. . अंत में, मेरा सुझाव मानना न मानना आपके बुद्धि-विवेक पर निर्भर करता है. मुझे आपका सुझाव पसंद आया. जो भी सहयोग, जैसा भी सहयोग मुझसे वांक्षित हो, जो मैं कर सकता होऊं, आप निःसंकोच आदेश करें, पालन होगा !

के द्वारा: shashibhushan1959

प्रवीण जी नमस्कार, बहुत अच्छी सोच है आपकी और भाई संतोष की.अवश्य ही यहाँ कई बहुत ही उम्दा लेखकगण यहाँ पर हैं कुछ नाम तो आपने लिख ही दिए हैं कुछ मै और अपने अनुभव के आधार पर लिख देता हूँ जैसे डॉ. सुर्याबाली जी, डॉ. अमिता नीरव जी, टिम्सी जी. पारिक जी, सत्यशील जी और पियूष पन्त जी सबके लेखन का विषय जुदा हो सकता है किन्तु शैली किसी की भी कमतर नहीं है. आपने सिर्फ हरिहर नाथ जी का जिक्र किया है जबकि मै देख रहा हूँ की म.प्र. से अब्दुल राशिद जी भी अब कोई ब्लॉग पोस्ट नहीं कर रहे हैं. प्रतिक्रया की होड़ की जहां तक बात है सभी चाहते हैं उनके लिखे को कोई पढ़े,तभी उनका लिखना भी सार्थक होगा. किन्तु क्या ये ठीक होगा की वे दूसरों को पढने से परहेज करें? बस इतनी सी बात है होड़ अपने आप समाप्त हो जाती है. आपके पहले भी एक ब्लोगेर पार्थ जो अभी अपनी पढ़ाई में व्यस्त है उन्होंने भी एक अलग ब्लॉग बनाया था किन्तु मुझे आज नहीं पता उसका क्या हुआ.तो कृपया ब्लॉग बनाए किन्तु उसे जीवित भी रखें ताकि उम्र के साथ वह फुले फले.मेरी शुभकामनाए.

के द्वारा: akraktale

गुस्ताखी माफ़.....आपकीं पंक्तियों के आगे दो पंक्तियाँ जोड़ना चाहूँगा, आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी. “हो विश्वाश का साथ तो, विश्वाश संग आगे बढ़ो, अपने लिए ही नहीं, औरों के लिए भी आगे बढों, और भी हैं आने वाली तेरे राह में मुश्किलें, हैं अगर पुरुषार्थ तो इन्हें चिरकर आगे बढ़ो, आने वाली मुश्किलों से भाग गए जो हारकर, फिर भला कैसे कहोंगे, विश्वास संग आगे बढों. यह हार नहीं 'अलीन' की, पर जीत है 'प्रवीण' की, ये विचार हैं जो मरते नहीं, यूँही तुम आगे बढों. गुस्ताखी के लिए माफ़ी चाहता हूँ मित्र परन्तु राह में पड़ने वाली मुश्किलों से भागा नहीं करते. कम से कम आप से यह उम्मीद नहीं थी क्योंकि आप उन इंसानों में से हो जो अलीन का हौसला बढ़ाएं ताकि वो अपने आवाज को आगे ले जा सके. अब जब कि आप जैसे दोस्तों का साथ है जिनपे मैं गर्व करता हूँ. यदि वो ऐसी बात करेंगे तो मुझे निराशा होगी. शायद अब आप समझ गए होंगे कि मेरी उम्र क्या होगी. तुम्हारा मित्र, अलीन

के द्वारा: अलीन

आनंद जी, सादर नमस्कार! जब मैं पहली बार आपकी रचना पढ़ा, आपकी सकारात्मक सोच का कायल हो गया था. मैं यहाँ कोई कविया लेखक नहीं बनाने आया हूँ और न ही बनाना चाहता हूँ. बस मैं अपनी बात आप लोगो के सम्मुख रखना चाहता हूँ. जिसका आप लोगो द्वारा भरपूर समर्थन मिला हैं और मिलता रहेगा. जो अच्छा लिखता हैं, सचमुच वो कमेन्ट का मोहताज नहीं. आपका मैं खुले तौर समर्थन करता हूँ, आगे बढ़ने के लिए नहीं बल्कि आप जैसे लोगों के साथ रहने के लिए. जिनसे खट्टे और मीठे दोनों अनुभव मिलतें हैं और साथ ही इसलिए ताकि हम सभी की सार्थक सोच से ओत- प्रोत रचनाएँ विचारों की क्रांति ला सके. यदि हमें अपने मंच लायक समझते हो तो विशेष आभार...

के द्वारा: अलीन

याद रखिये हम लेखक है, और एक लेखक कभी निराशावादी नहीं हो सकता इ “हो विश्वाश का साथ तो, विश्वाश संग आगे बढ़ो, घबराओ मत किसी बात पे, अपने लिए आगे बढ़ो”... बहुत अच्छी सोच है प्रवीण जी आज कल समय बहुत कम है लोगों के पास ..ब्लागिंग में भी बड़ी प्रतिस्पर्धा है -खींचतान है - ये बड़े मीडिया ग्रुप वाले -अखबार वाले सहज कर लेते हैं ये सब - सब के कमेन्ट को संभालना एडिट करना उसे देखते सुनते रहना विवाद से बचना ..हिंदी को अभी मोल अधिक नहीं उस के लिए संघर्ष करते रहना अपना दायित्व तो है ही अपनी कोशिश चल रही या यत्र तत्र ...फिर भी उम्मीद रख आगे बढ़ना अपनी सोच को अंजाम देना लोगों को जोड़ना ...बहुत कुछ .. पंख फैलाईये उड़िए ..एक ब्लॉग खोलिए अपना या सामूहिक ..शुभ कामनाएं भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

आनंद जी, आप के नवीनतम लेख पर भी मैंने आपके अपने लिए विचार पढ़े हैं. आपके कटु शब्द पढ़कर मुझे जरा भी हर्ष नहीं हुआ. खैर वो आपके व्यक्तिगत विचार है. लेकिन जहां तक अन्ना जी की बात है तो मैं उनके साहस और उनकी निष्ठा का सम्मान करती हूं. लेकिन दूसरी बात यह भी है कि अन्ना टीम को अपने संदेह से परे भी नहीं पा रही हूं. लेकिन  वह निश्चित तौर पर मेरी अपनी समस्या है. आपके दूसरे लेख पर (जिसपर आपने अपने क्रोध का गुबार निकाला है) के संदर्भ में यह कहना चाहती हूं कि मैंने उस मुद्दे पर बस आपकी राय मांगी थी. कमेंट का शौक मुझे नहीं है. आप जवाब नहीं देना चाहतें, मेरे ब्लॉग पर नहीं आना चाहतें यह आपकी मर्जी हैं मैं इस मसले पर कुछ भी कहने का अधिकार नहीं रखतीं.

के द्वारा: Tamanna

तमन्ना जी,नमस्कार आप किसी घोर भटकाव में बह रहीं है, आँखें खोलिए और ठीक से पढ़िए सायद आपको समझ में आ जाए की मैंने किसे देश की शान बताया है, अब बेटियों को दरसाने के लिए मैं अपने को तो बेटी नहीं मानने लगूंगा और जहां तक आपका यह प्रश्न है की मुझे क्या लगता है की बेटे ही देश की शान है तो एक बात मैं आपको bataa dun की मुझे kuch नहीं लगता है इन मुद्दों पर meri najar में सब baraabar है और muje आपको sfaai देने की आवश्यकता नहीं समझ में आती और एक बात कहना चाहूंगा की यूँ चूहे बिल्ली का खेल ना खेलें समर्थन करना है समर्थन कीजिये ना करना है ना कीजिये मुद्दों से मत भटकिये मेरे पिछले लेख में भी आपने ऐसा ही किया था और मैंने तो आपके प्रश्न का उत्तर दे दिया था पर आप देने में असमर्थ लगीं लिखना आपका स्वाभाविक शौक हो सकता है पर मेरे लिए ये एक सार्थक कदम है और मैं इस के लिए किसी भी प्रकार से अनुपयोगी कार्य नहीं करना चाहता हूँ. आप भले ही इस मंच को फेसबुक की तरह सिर्फ कमेन्ट पाने का अड्डा समझती हो पर मेरे लिए इन सब से ऊपर है यह ........................................... खुले दिल से समर्थन करना है तो कीजिये वरना ..........जहाँ में और भी काम है आपके कमेन्ट के सिवा..........धन्यवाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN

तमन्ना जी,नमस्कार सबसे पहले प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद क्यूंकि आप उन लोंगों में से है जिन्होंने हमेसा मुझें यहाँ कुछ अच्छा करने की प्रेरणा दी दूसरी बात मैं यह कहना चाहूँगा की बड़ा कठिन हो जाता है जब एक व्यक्ति दुसरे की बात से सहमत नहीं होता जब दो व्यक्ति आपस में बात करतें है तो वो एक दूसरों को अपनी बात नहीं समझा पाते फिर हम तो एक विरल माध्यम में है, मैंने आपके ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रया दी थी पर आपने उसका जवाब नहीं दिया जब की आप खुद ही अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की बात करती है, मुझे इस बात का दुःख नहीं है पर अफसोश अवश्य है की आप उच्चता की बात करते हुए भी सोच को निम्न बनाये हुए है, इसका मतलब तो यही समझना चाहिए की आप जो कहती है उसका हम या तो समर्थन करे या फिर कमेन्ट ना करे तो आप एक नोटिस भी डाल दीजिये अछा होगा. ................................................................................................................................................ अब जहाँ तक मेरे कविता का सवाल है, मैं कोई बहुत बड़ी बातों को लिखने की कोशिश नहीं करता ना ही मैं इस बात का कोई दावा करता हूँ, आपको मेरे लेख से इसलिए आपत्ति है क्यूंकि मैंने उसमें अन्ना की फोटो लगाईं है, पर मैं एक बात बता दूँ आपको की ये कविता मैंने लगभग तीन महीने पहले लिखी थी और मैंने ये अपने बारे में लिखी थी इस्सका उद्देश्य सिर्फ इतना है की "आगे बढ़ो" और मैंने इसमें आम आदमी को ही दरसाया है अन्ना भी एक आम आदमी है, अब सवाल ये है की आप किस नजरिये से उसे देखती है, आपने जो लिखा है की अन्ना जिन मुद्दों को सामने लाये है यानी की लोकपाल उसी के बारे में लिखें तो मैं एक बात बता दूँ की मैं लोकपाल के लिए उनकी इज्जत नहीं करता उनकी साहस के लिए करता हूँ धन्यवाद ...........................अभिवादन ........................शुक्रिया

के द्वारा: ANAND PRAVIN

आनंद जी, अभिवादन. इस समय जो युवाओ को सबसे ज्यादा जरूरी है, उसके बारे में आपने लिखा. बधाई हो. खासकर निम्न पंक्तियाँ, बहुत अच्छी बन पड़ी है "पेड़ों की छाह, अब यहाँ, क्या काम तेरे आयगें, आराम देकर वो तुम्हें, पथ से ही तो हटायेंगे," ऐसे ही पोजिटिव और उर्जा युक्त रचनाये करते रहिये. हमें बहुत आवश्यकता है. और हाँ, मै भी 'अन्ना' तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना. अन्ना जी का ही प्रभाव है की मै पहली बार किसी मोर्चे पर, गाँधी टोपी लगा के गया. बहुत फक्र महसूस हुआ. और मै दावा करता हूँ, की ये भीड़ किसी लालच में नहीं आई थी बल्कि भ्रष्टाचार के विरोध में शांत प्रदर्शन करने आई थी. जिसका वंशवाद पर फल फूल रहे राजनेताओ की तीखी टिप्पणिया आयीं. अन्नाजी ऐसे व्यक्ति नहीं है की किसी बरिब के घर जा कर एक दिन खाएं और नेता बन जाये. ७५ साल तिल तिल कर सेवा किया है. जय हिंद.

के द्वारा: Rakesh

सरिता जी, नमस्कार ‘common man’ तो बस ‘common man’ की ही आवाज़ उठा सकता है, कुछ कोशिश करता रहता हूँ की अच्छा लिखूं ताकि लोगों को पसंद आये या ना आये एक सन्देश जरुर दे सकूँ.....................बस आप यूँ ही उत्त्साह देते रहिये................ और क्षमा चाहूँगा की आपके कहने के बाद भी मैंने आप को नहीं बतलाया आप जब कुछ पोस्ट कर रहीं होती है तो ऊपर में ही कलर का आप्शन दिया होता है विसुअल बोर्ड में और ऊपर में फोटो भी या वेदिओ भी जोरने का आप्शन होता है प्रयास करिएगा जरुर होगा और पोस्ट करने से पहले एक बार प्रिविऊ जरुर देख ले.............................यदि मैं समझाने में विफल रहा तो बोलिएगा पुनः प्रयाश करूंगा तब तक के लिए आपका विशेष रूप से धन्यवाद

के द्वारा: ANAND PRAVIN

प्रिय आनंद जी ..... सप्रेम नमस्कारम ! यह जान कर अपार हर्ष हुआ की आप बुद्धिमान नहीं बल्कि मूर्ख है लेकिन बहुत ही दुःख की बात है की आजकल के समय में मूर्ख बहुत ही कम गिनती में रह गए है – अल्पसंख्यक हो गए है ..... जरा इनके लिए भी आरक्षण की कोई व्यवस्था करवाइए ना प्रभु ! अगर कोई महामुरख मिल जाए तो जरूर बतलाना संतोष भाई के मूर्ख मंच का मुखिया बनवा देंगे उसको वंदे मातरम हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा सरस्वती माता जी के पूजन की हार्दिक मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma




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